नोएडा की स्थापना के 50 वर्ष: हर मुश्किल को मात देकर निखरा शहर, आसान नहीं रही आगे बढ़ने की डगर; झेलीं ये बाधाएं
17 अप्रैल को नोएडा की स्थापना के 50 वर्ष पूरे हो रहे हैं। जिस पर अमर उजाला एक विशेष सीरीज प्रकाशित कर रहा है। दूसरी किस्त में पेश है शहर के विकास में सामने आई प्रमुख बाधाओं व उनके समाधान की कहानी।
विस्तार
औद्योगिक विकास और निवेश का केंद्र बन चुके नोएडा रियल एस्टेट और आईटी हब के रूप में अपनी पहचान बना रहा है। हालांकि इसके इस स्वरूप में आगे बढ़ने की कहानी इतनी सीधी भी नहीं है। 1976 में स्थापना के बाद से नोएडा के विकास की डगर में कई बाधाएं सामने आती रहीं। कभी शहर के अधिकारियों ने खुद समाधान किया तो कभी लखनऊ या दिल्ली जाकर हल निकाला। 17 अप्रैल को नोएडा की स्थापना के 50 वर्ष पूरे हो रहे हैं। जिस पर अमर उजाला एक विशेष सीरीज प्रकाशित कर रहा है। दूसरी किस्त में पेश है शहर के विकास में सामने आई प्रमुख बाधाओं व उनके समाधान की कहानी।
पहचान और बुनियादी ढांचे का संकट
स्थापना के समय नोएडा के सामने पहचान और बुनियादी ढांचे का संकट था। भौगोलिक स्थिति भी बड़ी चुनौती थी। हिंडन और यमुना के बीच के इस क्षेत्र में बारिश के समय जलभराव हो जाता था। उद्यमी शुरुआत में यहां आने के तैयार नहीं थे। बिजली, पानी, सड़कों का अभाव था। प्राधिकरण बन तो गया था उतनी सशक्त टीम नहीं थी। बजट कम था।
समाधान
नोएडा में उद्यमियों को बुलाने के लिए सरकार की तरफ से छूट के साथ जमीन दी गई। औद्योगिक प्लॉट के साथ आवासीय प्लॉट की भी व्यवस्था की गई। फेज-1 में छोटे-छोटे औद्योगिक प्लॉट निकाल कर छोटी इकाइयां शुरू करने के लिए उद्यमियों को बुलाया गया। इससे रोजगार के मौकों की शुरुआत हुई। 1978 में यमुना पुश्ता रोड बनने की शुरुआत हुई फिर बाद में हिंडन पुश्ता रोड बना। इससे जलभराव की समस्या दूर हुई। धीरे-धीरे बुनियादी सुविधाएं बेहतर होती चली गईं।
कानून व्यवस्था की बिगड़ती स्थिति
कानून व्यवस्था नोएडा के विकास के रास्ते में बड़ी बाधा थी। वर्ष 1990 और फिर 2000 के शुरुआत में लगातार वारदात हो रही थी। शहर में कई गिरोह सक्रिय थे। दिल्ली से नजदीकी होने के चलते वहां के भी अपराधी नोएडा में वारदात कर चले जाते थे। बिल्डरों, उद्यमियों से एक तरह से गुंडा टैक्स की वसूली होती थी। इससे यहां पर बड़े कॉरपोरेट समूह आने से बच रहे थे।
कमिश्नरेट से भयमुक्त बना नोएडा
वर्ष 2007 के बाद सरकारों ने यहां की कानून व्यवस्था पर ध्यान देना शुरू किया। हालांकि, सबसे बड़ा फैसला 2020 में योगी सरकार ने लिया। नोएडा में कमिश्नरेट प्रणाली लागू की गई। इसके बाद संगठित अपराध की जड़ पर प्रहार शुरू हुआ। एसटीएफ ने भी कई गिरोह का सफाया कर दिया। पुलिस को आधुनिक तकनीक और अलग बजट मिला। सेक्टर-62 और 125 जैसे क्षेत्रों को आईटी-बीपीओ हब के रूप में सुरक्षित जोन के रूप में विकसित हुए। रात की शिफ्ट में काम करने वाली महिलाओं और युवाओं का भरोसा बढ़ा।
औद्योगिक नगरी बनाम रिहायशी शहर का द्वंद
1976 में नोएडा की स्थापना के बाद 1980 में पहला मास्टर प्लान बना। शुरुआत में औद्योगिक फेज-1 प्राधिकरण लेकर आया। सेक्टर-19-27 तक आवासीय फ्लैट की योजनाएं भी थीं। लेकिन यहां आने वाले लोग बड़ी संख्या में काम कर रहने के लिए दिल्ली चले जाते थे। स्कूल, अस्पताल जैसी बुनियादी सुविधाएं बेहतर नहीं थीं। 1990 के दौर में शाम को यह शहर वीरान होना शुरू हो जाता था। बड़ी औद्योगिक इकाई भी नहीं आई थीं।
नियोजन का नजरिया बदलने से आया बदलाव
पहला मास्टर प्लान 1991 के लिए बना था। फिर इसके बाद आगे के सेक्टरों के नियोजन में तत्कालीन अधिकारियों ने नजरिया बदला। इसका असर धरातल पर वर्ष 2000 के बाद दिखना शुरू हुआ। इधर, ग्रुप हाउसिंग व सेक्टर में प्लॉट निकाले जाने लगे। बड़े निजी स्कूलों, अस्पतालों को जमीन दी गई। दिल्ली की तुलना में भीड़-भाड़ कम थी, नियोजन बेहतर होने, हरियाली की वजह से नोएडा की रिहायश ने यहां काम करने वालों को आकर्षित करना शुरू किया।
कनेक्टिविटी का संकट, नजदीक होकर भी दूर थी दिल्ली
वर्ष 1995-2000 के समय औद्योगिक इकाइयां तो बढ़ी लेकिन नोएडा की उतनी बेहतर कनेक्टिविटी नहीं थी। दिल्ली जाने के लिए सिर्फ ओखला बैराज का संकरा रास्ता था। दबाव बढ़ने से इस पर जाम की समस्या थी। इस तरह नजदीक होकर भी दिल्ली नोएडा के लिए दूर थी।
समाधान
वर्ष 2001 में दिल्ली-नोएडा-डायरेक्ट फ्लाई-वे (डीएनडी) बनकर तैयार हुई। दिल्ली का सीधा आवागमन हुआ। फिर कालिंदीकुंज बॉर्डर पर यमुना पर पुल बने। दूसरी तरफ दिल्ली का विकास मयूर विहार तक पहुंचा फिर चिल्ला बॉर्डर का रास्ता भी शुरू हुआ।
जमीन अधिग्रहण के विरोध में किसान आंदोलन
1990 से 2011 तक के दौर में नोएडा में जमीन अधिग्रहण में मनमानी के खिलाफ किसानों के कई आंदोलन हुए। जैसे-जैसे शहरीकरण बढ़ा किसानों ने कम मुआवजे और विकसित जमीन में हिस्सेदारी को लेकर आंदोलन शुरू कर दिए। ग्रेटर नोएडा में 2011 में हुए भट्टा-पारसौल कांड का व्यापक असर नोएडा पर भी पड़ा था। इस वजह से अधिग्रहण व नए सेक्टरों का विकास थम गया था।
नई भूमि अधिग्रहण नीति के बाद कम हुआ विरोध
यूपी सरकार ने नई भूमि अधिग्रहण नीति पेश की। किसानों को बढ़ा हुआ मुआवजा व विकसित प्लॉट 5 प्रतिशत देने की शुरुआत हुई। मुआवजा बढ़ने और प्लॉट मिलने से किसानों का विरोध कम हुआ।
रियल एस्टेट संकट गहराया, हजारों परिवारों की गाढ़ी कमाई फंसी
1990 से शुरू हुआ रियल एस्टेट वर्ष 2000 के बाद ऊंचाई पर चढ़ना शुरू हुआ। 2005-012 के बीच बड़े पैमाने पर ग्रुप हाउसिंग की परियोजनाएं आईं। बड़ी संख्या में लोगों ने अपना आशियाना बनाने के लिए बिल्डर परियोजनाओं में जीवन की गाढ़ी कमाई व बैंक लोन लेकर धनराशि लगाई। फिर 2014-015 में बिल्डर दिवालिया होने शुरू हुए। एकदम से रियल एस्टेट का संकट खड़ा हुआ।
रेरा लागू होने के बाद तय हुई जवाबदेही
2017 में रेरा लागू होने से आवासीय परियोजनाओं में जवाबदेही तय हुई। सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप से फंसे हुए प्रोजेक्ट्स को पूरा करने के लिए कई उपाय किए गए। उदाहरण के तौर पर आम्रपाली की परियोजनाओं को एनबीसीसी ने पूरा किया। वहीं यूनिटेक के लिए भी समिति बनी। अमिताभकांत समिति की सिफारिशों पर यूपी सरकार जीरो पीरियड पॉलिसी लेकर आई।
कोविड काल में पलायन
कोरोना की पहली लहर व लॉकडाउन में नोएडा से श्रमिकों, कामगारों व प्रवासी आबादी का बड़ा पलायन हुआ। 2022 तक कोरोना का कहर व रुक-रुक कर लॉकडाउन लगता रहा।
लॉकडाउन हटने के बाद लौटे श्रमिक
शहर की बड़ी संख्या में कॉरपोरेट कंपनियों ने वर्क फ्रॉम होम की सुविधा दी थी। इससे अपने गांव व कस्बों में गए श्रमिक नोएडा से जुड़े रहे। लॉकडाउन हटने के बाद नोएडा में रोजगार के मौकों ने फिर से श्रमिकों को आकर्षित किया।
ब्रांड ईमेज पर भ्रष्ट्राचार का दाग
प्राधिकरण अध्यक्ष नीरा यादव के समय अवैध प्लॉट आवंटन, लैंड यूज बदलाव समेत कई मुद्दों पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगे। फिर यहां के अधिकारियों की पावर पिछली कुछ सरकारों में मुख्यमंत्रियों की नजदीकी की वजह से इतनी ज्यादा थी कि उन्होंने नियम कानून की परवाह नहीं की। नोएडा प्राधिकरण से तीन प्राधिकरण के इंजीनियर इन चीफ बने यादव सिंह का नाम भूमिगत केबल घोटाले में आया। आयकर विभाग की कार्रवाई के बाद सीबीआई जांच हुई। बिल्डरों से सांठगांठ और उनकी करीबियों में कई सीईओ के नाम आए। प्रवर्तन निदेशालय ने पूर्व सीईओ मोहिंदर सिंह के ठिकानों पर छापा मारा। रमा रमण लंबे समय तक नोएडा, ग्रेटर नोएडा और यमुना एक्सप्रेस-वे प्राधिकरण के सीईओ और चेयरमैन के पद पर तैनात रहे थे। अगस्त 2016 में हाईकोर्ट के आदेश के बाद सपा सरकार ने उनको हटाया था।
साफ छवि के अधिकारियों की हुई तैनाती
योगी सरकार में साफ छवि के अधिकारियों की नोएडा में तैनाती देने की शुरुआत हुई। तीनों प्राधिकरण का सीईओ या चेयरमैन किसी एक को नहीं बनाया गया है। चेयरमैन व सीईओ अलग-अलग ही हैं। छोटी से छोटी शिकायत पर शासन स्तर से कार्रवाई हो जाती है। सभी टेंडर ऑनलाइन किए गए। निर्माण की बड़ी परियोजनाओं का परीक्षण आईआईटी से करवाया जाता है।