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Noida News: अभियोजन अधिकारियों की कमी से अपराधियों को मिल रहा राहत का रास्ता

Wed, 01 Jul 2026 01:44 AM IST
Noida Bureau नोएडा ब्यूरो
Updated Wed, 01 Jul 2026 01:44 AM IST
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Shortage of prosecuting officers offers criminals a way out
एक अधिकारी पर दो अदालतों का भार, आठ हजार से अधिक मामले प्रभावी पैरवी के अभाव में लंबित
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13 सेशन कोर्ट में डीजीसी समेत केवल सात अभियोजन अधिकारी, समय पर नहीं मिल पा रहा न्याय
मोहम्मद बिलाल
ग्रेटर नोएडा। जिले में अभियोजन अधिकारियों की भारी कमी से अदालतों में लंबित मुकदमों की संख्या लगातार बढ़ रही है। गंभीर आपराधिक मामलों में प्रभावी पैरवी नहीं हो पाने से सुनवाई प्रभावित हो रही है। स्थिति यह है कि 13 सेशन कोर्ट के मुकाबले वर्तमान में केवल सात अभियोजन अधिकारी ही कार्यरत हैं। ऐसे में प्रत्येक अधिकारी को एक साथ दो-दो अदालतों की जिम्मेदारी निभानी पड़ रही है। इसका सीधा असर गवाही, जमानत, बहस और मुकदमों के समयबद्ध निस्तारण पर पड़ रहा है।
जिले में वर्तमान में डीजीसी (क्राइम) ब्रह्मजीत भाटी के साथ एडीजीसी धर्मेंद्र जैंत, रोहतास शर्मा, नितिन त्यागी, शिल्पी भदौरिया, मीनू सिंह और चवनपाल भाटी कार्यरत हैं। इनमें मीनू सिंह सिर्फ आवश्यक वस्तु अधिनियम (ईसी) एक्ट कोर्ट का काम देखती हैं।
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अमित और बबलू चंदेला करीब पांच माह पहले कार्य छोड़ चुके हैं। रतन सिंह भाटी और भाग सिंह भाटी का अनुबंध नवीनीकृत नहीं हुआ, जबकि सुखबीर सिंह के सेवानिवृत्त होने के बाद अब तक नई नियुक्ति नहीं की गई। परिणामस्वरूप अभियोजन तंत्र पर दबाव बढ़ गया है।
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अभियोजन अधिकारियों का कहना है कि यदि सभी पांच रिक्त पद भर दिए जाएं तो प्रत्येक अदालत को समर्पित अभियोजन अधिकारी उपलब्ध हो सकेंगे, जिससे मुकदमों की सुनवाई, बहस और अन्य न्यायिक कार्यवाही में तेजी आएगी।


पीड़ितों को उठानी पड़ती है समस्या
जिले में वर्तमान में 13 सेशन स्तर की अदालतें संचालित हैं, लेकिन पर्याप्त अभियोजन अधिकारियों के अभाव में प्रभावी पैरवी संभव नहीं हो पा रही है। जिले में 8.90 लाख से अधिक आपराधिक मामले विभिन्न अदालतों में लंबित हैं। इनमें से 25 हजार से अधिक मामले सेशन स्तर पर विचाराधीन हैं। इनमें करीब आठ हजार मामलों में प्रभावी पैरवी प्रभावित होने का प्रमुख कारण अभियोजन अधिकारियों की कमी है।
संवेदनशील मामलों में देरी से पीड़ितों और गवाहों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। इसी तरह स्थगन से न केवल मुकदमे की अवधि बढ़ती है। बल्कि पीड़ित परिवार को भी लंबे समय तक न्याय का इंतजार करना पड़ता है। वर्षों तक मुकदमे लंबित रहने से उन्हें मानसिक, सामाजिक और आर्थिक परेशानियों का सामना करना पड़ता है। दूसरी ओर, लंबी न्यायिक प्रक्रिया का लाभ कई बार आरोपी पक्ष को भी मिल जाता है।

अभियोजन अधिकारियों की कमी से होने वाली समस्याएं
गंभीर मामलों में प्रभावी और समयबद्ध पैरवी प्रभावित होती है।
गवाही और बहस बार-बार टलने से मुकदमे लंबे खींचते हैं।
जमानत प्रार्थना पत्रों पर प्रभावी विरोध करने में कठिनाई आती है।
गवाहों को बार-बार अदालत आना पड़ता है, जिससे वे निराश होते हैं।
पीड़ित परिवारों का न्याय व्यवस्था पर विश्वास कमजोर पड़ सकता है।
अदालतों में लंबित मामलों का बोझ लगातार बढ़ता है।
केस स्टडी-1 : हत्या का मुकदमा, बार-बार टलती बहस
चर्चित हत्या के मुकदमे में अभियोजन अधिकारी को उसी दिन दूसरी अदालत में भी उपस्थित होना पड़ा। परिणामस्वरूप अंतिम बहस निर्धारित तिथि पर नहीं हो सकी और मामला अगली तारीख पर चला गया।
केस स्टडी-2 : पॉक्सो मामले में सुनवाई प्रभावित
एक पॉक्सो प्रकरण में गवाहों की उपस्थिति के बावजूद अभियोजन पक्ष की पूर्ण तैयारी नहीं हो सकी क्योंकि संबंधित अधिकारी समानांतर दूसरी अदालत में व्यस्त थे। नतीजतन गवाही स्थगित करनी पड़ी।

कोट
चार नए अधिवक्ताओं के नाम एडीजीसी पद पर नियुक्ति के लिए भेजे गए हैं। संतोषजनक प्रदर्शन नहीं होने के कारण रतन सिंह भाटी और भाग सिंह भाटी के अनुबंध का नवीनीकरण नहीं किया गया। नए अधिकारियों की नियुक्ति होने के बाद कार्य दबाव कुछ कम होने की उम्मीद है। -ब्रह्मजीत भाटी, डीजीसी (क्राइम), गौतमबुद्धनगर
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