Delhi: वाहन बेकाबू, बल सीमित... 4200 ट्रैफिक कर्मी बेबस; 10 किलोमीटर का सफर तय करने में लगते हैं 30 मिनट तक
अंतरराष्ट्रीय सूचकांकों से लेकर राष्ट्रीय शोध संस्थानों तक की रिपोर्टें बताती हैं कि दिल्ली का ट्रैफिक संकट बहुस्तरीय है। वैश्विक संस्था टॉमटॉम ट्रैफिक इंडेक्स के आकलनों में दिल्ली लगातार भीड़भाड़ वाले शहरों में गिनी जाती है। पीक ऑवर में यात्रा समय 50 से 80 फीसदी तक बढ़ जाना और 10 किलोमीटर की दूरी तय करने में 25–35 मिनट लगना आम बात है।
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राजधानी की सड़कों पर आज रफ्तार नहीं, बेबसी दौड़ रही है। 78 लाख वाहनों के सैलाब के सामने सिर्फ 4,200 ट्रैफिक कर्मी जाम को थामे खड़े हैं, लेकिन पीक ऑवर में 10 किलोमीटर का सफर 30 मिनट में सिमट कर नहीं, खींचकर पूरा हो रहा है। नतीजतन यात्रा का समय 80 फीसदी तक बढ़ चुका है और राजधानी धीरे-धीरे रुकने लगी है।
अंतरराष्ट्रीय सूचकांकों से लेकर राष्ट्रीय शोध संस्थानों तक की रिपोर्टें बताती हैं कि दिल्ली का ट्रैफिक संकट बहुस्तरीय है। वैश्विक संस्था टॉमटॉम ट्रैफिक इंडेक्स के आकलनों में दिल्ली लगातार भीड़भाड़ वाले शहरों में गिनी जाती है। पीक ऑवर में यात्रा समय 50 से 80 फीसदी तक बढ़ जाना और 10 किलोमीटर की दूरी तय करने में 25–35 मिनट लगना आम बात है। केंद्रीय सड़क अनुसंधान संस्थान (सीआरआरआई) के ट्रैफिक इंजीनियरिंग अध्ययनों में पाया गया है कि कई इंटरसेक्शन पर असंतुलित सिग्नल टाइमिंग, अनियोजित कट, यू-टर्न, सर्विस रोड, मर्जिंग लेन की कमी, बस स्टॉप की गलत लोकेशन आदि ट्रैफिक फ्लो तोड़ देती है। विशेषज्ञों का कहना है कि डिजाइन में खराबी के कारण बनने वाले बॉटलनेक सड़क चौड़ी होने के बावजूद जाम पैदा करते हैं, यानी समस्या सिर्फ वाहन संख्या नहीं, इंजीनियरिंग की भी है।
जाम काम की गुणवत्ता पर डाल रहा असर...
आईआईटी दिल्ली के शोध बताते हैं कि औसतन 1–2 घंटे रोज जाम में फंसने से काम की गुणवत्ता पर असर पड़ता है और तनाव, चिड़चिड़ापन व रोड रेज बढ़ाता है। ट्रांजिट प्लानिंग एजेंसी दिल्ली इंटीग्रेटेड मल्टी मोडल ट्रांजिट सिस्टम (डीआईएमटीएस) के विश्लेषणों में बस रूट ओवरलैप और लास्ट-माइल गैप प्रमुख समस्या बताए गए हैं। जरूरत 11 से 12 हजार बसों की, परिचालन लगभग पांच से छह हजार के आसपास का हैं। दूसरी ओर मेट्रो रोजाना औसतन 55–65 लाख यात्रियों को ढोती है, पर स्टेशन के बाहर ऑटो, ई-रिक्शा अराजकता और फीडर की कमी निजी वाहन की ओर धकेलती है। नतीजा मेट्रो के बावजूद सड़कें खाली नहीं हो रहीं। पीक ऑवर में जाम के कारण एम्बुलेंस और फायर ब्रिगेड को अतिरिक्त 5 से 15 मिनट तक की देरी झेलनी पड़ती है। चिकित्सा विशेषज्ञों के मुताबिक गंभीर मरीजों के लिए इलाज का पहला घंटा, जिसे गोल्डन ऑवर कहा जाता है, बेहद अहम होता है। इस दौरान समय पर अस्पताल पहुंचना जीवन और मृत्यु के बीच फर्क तय कर सकता है। वहीं आग लगने जैसी घटनाओं में भी देरी नुकसान को कई गुना बढ़ा सकती है।
साल 2025 में राजधानी में निजी वाहनों के पंजीकरण का रिकॉर्ड तोड़ दिया है। 2025 में 8.16 लाख वाहन पंजीकृत हुए हैं। यह आंकड़ा साल 2018 में सबसे अधिक 7.26 लाख वाहनों का था। जानकारों का कहना है कि जो नए निजी वाहनों के पंजीकरण हुए हैं उससे यह पता चलता है कि खरीददारों ने सार्वजनिक परिवहन के बजाय निजी वाहन से चलने को प्राथमिकता दे रहे हैं। कुल पंजीकरण में 75 फीसदी वाहन पेट्रोल से चालित हैं। दिल्ली में डीजल से चलने वाले निजी वाहनों का पंजीकरण कम रहा है लेकिन ई-वाहनों का पंजीकरण पेट्रोल से चलने वाले निजी वाहनों की तुलना में बेहद कम है। ऐसे में दिल्ली की सड़कों पर वाहनों की बढ़ती संख्या से प्रदूषण और जाम दो तरह की समस्याओं से निपटना मुश्किलों भरा हो सकता है। वर्तमान में राजधानी में निजी वाहनों की कुल संख्या 78 लाख से अधिक हो चुकी है। सीपीसीबी की रिपोर्टों में वाहनों से निकलने वाला धुंआ दिल्ली के कुल प्रदूषण का लगभग 30 फीसद है।
लाखों चालान के बावजूद रेड लाइट जंप, लेन ड्राइविंग की अनदेखी, गलत पार्किंग और फुटपाथ-बस स्टॉप पर अतिक्रमण पर प्रभावी अंकुश नहीं लग पा रहा है। ट्रैफिक नियमों के पालन की जिम्मेदारी दिल्ली पुलिस पर है, अतिक्रमण हटाने का दायित्व दिल्ली नगर निगम (एमसीडी) के पास है, जबकि सड़क, कट और यू-टर्न डिजाइन की जिम्मेदारी लोक निर्माण विभाग दिल्ली (पीडब्ल्यूडी) के हिस्से में आती है। कई एजेंसियों में बंटी जवाबदेही के कारण कार्रवाई का असर जमीन पर कम दिखता है और जाम स्थायी रूप ले लेता है। दूसरी ओर राजधानी में लाखों वाहन सड़कों पर उतरते हैं। इसके मुकाबले महज 4,200 ट्रैफिक पुलिसकर्मी पूरे नेटवर्क को संभाल रहे हैं। ऐसे में नियमों का सख्ती से पालन और सुचारू यातायात सुनिश्चित करना बड़ी चुनौती बना हुआ है। कई प्रमुख मार्गों पर सड़कें चलने की बजाय पार्किंग स्थल अधिक नजर आती हैं, जिससे दबाव और बढ़ जाता है।