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Uphaar Cinema: अग्निकांड के दोषी सुशील अंसल के खिलाफ आरोप तय करने का आदेश, पासपोर्ट से जुड़ा है मामला

पीटीआई, नई दिल्ली Published by: अनुज कुमार Updated Wed, 03 Dec 2025 12:40 PM IST
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सार

दिल्ली के सबसे भीषण अग्निकांड के दोषी सुशील अंसल को पासपोर्ट रिन्यूअल के लिए आपराधिक मामलों को छिपाने और झूठी घोषणा जारी करने पर कोर्ट ने कड़ा एक्शन लिया। कोर्ट ने आरोपी के खिलाफ आरोप तय करने के आदेश दे दिए हैं। 

Uphaar Cinema passport case Delhi court ordered framing of charges against convict Sushil Ansal
court room (file photo) - फोटो : ANI
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विस्तार

दिल्ली की एक अदालत ने उपहार सिनेमा अग्निकांड के दोषी सुशील अंसल को पासपोर्ट नवीनीकरण के लिए आपराधिक मामलों को छिपाने और झूठे घोषणापत्र दाखिल करने के आरोप में चार्जशीट दाखिल करने का आदेश दिया है। यह मामला सुशील अंसल के खिलाफ एक अलग से चल रहा है, जो उपहार अग्निकांड मामले में उनकी सजा के बाद सामने आया है।

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पटियाला हाउस कोर्ट की मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट श्रिया अग्रवाल ने 28 नवंबर के अपने आदेश में कहा कि अंसल के खिलाफ प्रथम दृष्टया आरोपों को आगे बढ़ाने के लिए पर्याप्त सामग्री है। उन पर भारतीय दंड संहिता की धारा 420 (धोखाधड़ी), 177 (लोक सेवक को झूठी जानकारी देना), 181 (शपथ पर झूठा बयान देना) और पासपोर्ट अधिनियम की धारा 12 (पासपोर्ट से संबंधित अपराध) के तहत आरोप तय किए जाएंगे। मामले की अगली सुनवाई 13 जनवरी, 2026 को होगी।
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कोर्ट ने पाया कि अंसल ने 2013 में अपने तत्काल पासपोर्ट आवेदन के साथ दिए गए शपथ-पत्र में अपने खिलाफ लंबित आपराधिक मामलों और सजा के विवरण को जानबूझकर छिपाया था। कोर्ट के अनुसार, यह छिपाव क्षेत्रीय पासपोर्ट कार्यालय को पासपोर्ट जारी करने के लिए प्रेरित करने हेतु किया गया था। न्यायाधीश ने यह भी नोट किया कि अंसल ने न केवल सजा और लंबित एफआईआर की जानकारी छिपाई, बल्कि पिछले पते का भी सही विवरण नहीं दिया, ताकि उनकी आपराधिक पृष्ठभूमि का पता न चल सके। ये कथित झूठे बयान 2013 और 2018 में दो अलग-अलग मौकों पर दिए गए थे।

अदालत ने अपने आदेश में आगे कहा कि आरोपी द्वारा बाद में 'अनजाने में हुई गलती' को स्वीकार करना, पिछली दोषिता को कम नहीं कर सकता, क्योंकि आरोपी ने भ्रामक घोषणाओं के आधार पर मूल्यवान दस्तावेज (पासपोर्ट) का उपयोग किया, जो वैधानिक आवश्यकताओं का उल्लंघन था।

अदालत ने बचाव पक्ष के इस दावे को खारिज कर दिया कि लिखित शिकायत के अभाव में मुकदमा चलाने पर रोक है। अदालत ने कहा कि दिल्ली उच्च न्यायालय के निर्देशों के परिणामस्वरूप मामला शुरू हुआ था, जो संज्ञान के उद्देश्यों के लिए एक प्रशासनिक वरिष्ठ लोक सेवक के निर्देश के बराबर है।

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