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पड़ताल: समय-समय पर सिनेमा पर दिखती रही हैं वो फिल्में, जो देती हैं सामाजिक संदेश

Mon, 08 Oct 2018 01:37 PM IST
मनोरंजन डेस्क,अमर उजाला
मनोरंजन डेस्क,अमर उजाला Updated Mon, 08 Oct 2018 01:37 PM IST
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Sui Dhaga is a Yash Raj production directed by Sharat Kataraiya
Sui Dhaga

समाज को एक नई दिशा देने का काम भी सिनेमा का रहा है। भले ही हम दिल बहलाने के ख्याल से सिनेमा हॉल जाते रहे हों, एक संदेश तो लेकर लौटते ही हैं। हाल के दिनों में सिनेमा ने समाज के उन पहलुओं को छूने की कोशिश की है, जिन पर कभी हम ध्यान नहीं देते थे।

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महात्मा गांधी की 150 वीं जयंती पूरे वर्ष मनाई जा रही है। लेकिन यह भी सच है कि गांधी के विचारों को हमने अपनी अपनी जरूरतों के हिसाब से ग्रहण किया। बात-बात पर महात्मा गांधी को उद्धृत करने वाले हमलोगों ने कभी शौच पर गांधी के विचारों पर गौर करने की जरूरत नहीं समझी। गांधी को विश्व के एकमात्र महापुरुष के रूप में हम याद कर सकते हैं, जिन्होंने शौच और स्वच्छता को भी अपने आंदोलन में शामिल किया। उन्होंने कहा था, “स्वतंत्रता से ज्यादा जरूरी है स्वच्छता।” उन्होंने यह कहा भर नहीं, अपने आश्रम में शौच की सफाई उनकी दिनचर्या का हिस्सा भी रहा। लेकिन इस मुद्दे पर हम गांधी को कितना नजरअंदाज करते रहे, इसी से समझा जा सकता है कि 2011 की जनगणना के अनुसार यानी आजादी के 65 साल बाद तक भी खुले में शौच करने वाले लोगों की संख्या कुल आबादी का 49.8 प्रतिशत थी, जबकि स्वच्छ भारत मिशन के बेसलाइन सर्वे-2012 में शौचालय विहीन परिवारों की संख्या 61.2 प्रतिशत बताई गई थी। 

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वास्तव में शौच हमारे जीवन का अनिवार्य सत्य रहा है, फिर भी यह हमारे विचारों के दायरे से हमेशा बाहर रहा है। ऐसे में पूरी तरह खुले में शौच की समस्या पर केंद्रित अस्मिता शर्मा और प्रतीक शर्मा की फिल्म ‘गुटरू गुटरगूं’ विस्मित करती है। कई राष्ट्रीय फिल्म समारोहों में प्रदर्शित यह फिल्म बिहार और राजस्थान में टैक्स फ्री घोषित की गई थी। यह फिल्म केन्द्र सरकार द्वारा खुले में शौच से मुक्ति की बहुप्रचारित योजना से काफी पहले परिकल्पित की गई थी। वास्तव में यह फिल्म उस दर्द को बयान करती है, जिसे महसूस सब करते हैं, व्यक्त कोई नहीं कर पाता। निश्चित रूप से भारत में खुले में शौच की समस्या पर यह पहली फिल्म होगी। 
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यहां जब नायिका अपने पति से कहती है, तुम रख सकते हो अपनी ‘भावनाओं’ पर काबू, तो स्पष्ट तस्वीर उभर आती है कि सिर्फ स्वच्छता से जुड़ी दिखने वाली खुले मेंे शौच की समस्या कैसे महिला सशक्तिकरण की तमाम उपलब्धियों को झुठला रही है। किसी भी संवेदनशील व्यक्ति को यह स्थिति द्रवित कर सकती है कि अभी भी महिलाएं गांवों में अपने मनपसंद भोजन तक नहीं कर पाती, जरूरत के अनुसार पानी नहीं पीतीं कि दिन में कहीं शौच की जरूरत न पड़ जाए। यह फिल्म उस पुरुष मानसिकता को भी शिद्दत से रेखांकित करती है, जिसने महिलाओं की इस सबसे अनिवार्य आवश्यकता पर सोचने की कभी जरूरत ही नहीं समझी।

‘टायलेट : एक प्रेमकथा’ एक कदम आगे

‘गुटरु गुटरगूं’ भले ही राज्य या केन्द्र के किसी स्वच्छता अभियान का हिस्सा नहीं, लेकिन निश्चित रूप से समाज के प्रति अपनी जवाबदेही और चिंता को रेखांकित करने की कोशिश करते हुए सिनेमा माध्यम को एक नई सार्थकता तो देती ही है। यह सार्थकता इससे भी समझी जा सकती है कि इसी मुद्दे पर अक्षय कुमार भी ‘टायलेट : एक प्रेमकथा’ लेकर आते हैं। ‘टायलेट : एक प्रेमकथा’ एक कदम आगे बढ़कर इस संबंध में चल रही सरकारी योजनाओं और ब्यूरोक्रेसी की शिथिलता को भी अपनी कथावस्तु में समाहित करती है।

वास्तव में भारत जैसे देश में जहां साक्षरता की दर अपेक्षाकृत कम है। जहां सिनेमा का विकास आजादी के आंदोलन की जमीन पर हुआ। स्वभाविक रूप से सामाजिक संदेश सिनेमा के साथ अनिवार्य रूप से जुड़ गया। सिनेमा देखते हुए मनोरंजित होने से ज्यादा जरूरी आज भी हमारे लिए ‘टेक अवे’ है, कि हम संदेश क्या ले जा रहे हैं। सिनेमा पर अधिकांश विचार इसी ‘टेक अवे’ के आधार पर होते रहे हैं। जाहिर है कभी ‘भक्त विदुर’ जैसी स्वतंत्रता का संदेश देती फिल्म बनी, तो कभी दहेज और बाल विवाह जैसी कुरीतियां सिनेमा के प्रिय विषय रहे।

बाद के दिनों में महिला सशक्तिकरण जैसे मुद्दे भी रूप बदल बदल कर परदे पर आते रहे। ‘सत्यकाम’ जैसी फिल्म में सार्वजनिक जीवन में इमानदारी जैसे मुद्दे को काफी इमोशनल कहानी के साथ दिखाने की कोशिश की गई थी। नई सदी में आर्थिक उदारीकरण के साथ सिनेमा पर मनोरंजन का दबाव अवश्य बढ़ा, लेकिन उल्लेखनीय है कि विकास के बदलते उपक्रमों के साथ बदलती समस्याओं को भी सिनेमा ने गंभीरता से स्वीकार किया है और बदलते समय के साथ बदलते संदेशों को वे खासतौर पर रेखांकित कर रही हैं।

कहानी एक बहुत ही छोटे से शहर में होती है शुरू

शरत कटारिया की ‘सुई धागा’ इसी रूप में चकित करती है। इस फिल्म का संदेश स्पष्ट है कि युवाओं को अपने कौशल का उपयोग कर अपने बल पर सम्मानजनक जिंदगी जीने के लिए तैयार होना चाहिए। कहानी एक बहुत ही छोटे से शहर में शुरू होती है। मौजी लाल अपनी पत्नी, पिता और मां के साथ किसी तरह अपनी जिंदगी गुजार रहा है। उसके दादा कढ़ाई-सिलाई का काम करते थे, लेकिन समय के साथ पुश्तैनी रोजगार बंद होते चले गए। मजबूरी में मौजी भी एक सेठ की दुकान में काम करने लगता है।

एक पार्टी में मौजी का मजाक बनते देख, उसकी पत्नी उसे नौकरी छोड़कर अपने हुनर से रोजी कमाने के लिए तैयार करती है। वह उधार की सिलाई मशीन फुटपाथ पर लगा काम करने की शुरुआत करता है। तभी एक रेडिमेड कंपनी को उसकेे डिजाइन पसंद आते हैं और वह उस कंपनी में नौकरी करने लगता है। लेकिन अपने ही डिजाइन की चोरी से वहां भी विवाद हो जाता है और वह नौकरी छोड़ देता है। उसकी पत्नी उसे अपने पुश्तैनी काम को आगे बढ़ाने की सलाह देती है।

वह एक इंटरनेशनल फैशन शो के लिए अपनी एंट्री भेज देता है। वहां स्वीकृत होने के बाद वह पुश्तैनी काम से मुंह मोड़ चुके अपने परिवार ही नहीं, पड़ोसियों को भी तैयार करता है और अपने कौशल से बड़े डिजानरों को पछाड़ देता है। जाहिर है यह फिल्म रोजगार की तलाश में भटकते युवाओं को अपने अंदर का हुनर ढूंढने और उसे विकसित करने की सलाह देती है। आश्चर्य नहीं कि वरुण धवन और अनुष्का शर्मा को प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाले ‘कौशल भारत अभियान’ को प्रोत्साहन और समर्थन देने के लिए ब्रांड एम्बेसडर बनाया जाता है। 

वास्तव में 'सुई-धागा : मेड इन इंडिया' लघु उद्यमियों, विशेषकर घरेलू हथकरघा कारीगरों, दस्तकारों और बुनकरों को स्पष्ट रूप से प्रोत्साहित और सम्मानित करती है। यह फिल्म भारत के कोने-कोने में प्रतिभाशाली कारीगरों और कुशल कामगारों को अपने अंदर की छुपी हुई क्षमताओं को पहचानने के लिए तैयार करती है। अपने संदेश के प्रति कितनी स्पष्ट है यह फिल्म, यह इस बात से भी समझा जा सकता है कि इस फिल्म के प्रमोशन में भी इसने कुशल कारीगरों पर भरोसा किया। इन्होंने 15 अलग-अलग शैलियों में फिल्म के लोगो बनवाए, जिसमें काशीदा के हाथ सुई के रूपों और कश्मीर से सोजनी, पंजाब के फुलकरी, गुजरात से रबरी और मोची, उत्तर प्रदेश से फूल पट्टी और जॉर्डोजी लखनऊ से किया है। राजस्थान के प्रमुख शिल्प जैसे आरी, बंजारा और गोटा पट्टी, तमिलनाडु की लोकप्रिय टोडा शैली और कर्नाटक के कासुति डिजाइन में भी बनाया गया है। उड़ीसा से पिपली शैली में बनाया गया है। असम से हैंडलूम और पश्चिम बंगाल से कंध सिलाई का काम किया गया है।

परदे ने भी दूर किए हैं अपने संकोच

सुई-धागा आज के युवाओं के मन में भारत के पारंपरिक कौशल के प्रति सम्मान ही नहीं जगाती, यह भी संदेश देती है कि किस तरह इस तरह के छोटे उद्यमों ने समाज को एक कर रखा था। वास्तव में इस विषय पर बनी यह पहली फिल्म नहीं, 2016 में इसी विषय पर नितिन चन्द्रा ने मैथिली में ‘मिथिला मखान’ बनाई थी, जिसे सर्वश्रेष्ठ मैथिली फिल्म का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार भी मिला था। कई देशी विदेशी फिल्म समारोहों में यह प्रदर्शित प्रशंसित भी हुई। इस फिल्म में विदेश में अच्छी-खासी नौकरी कर रहा एक युवक अपने गांव आता है और अपने दादा के बंद पड़े मखाना उद्यम को पुनर्जीवित करने में लग जाता है। 

अंततः वह अपने दादा के पुश्तैनी व्यवसाय को खड़ा करने में सफल होता है। समाज में आमतौर पर वर्जित विषयों पर भी परदे ने अपने संकोच दूर किए हैं। जहां हिन्दी सिनेमा में शायद ही कभी महिलाओं की पीरिएड की बातें सुनी गई हो, अब पूरी की पूरी फिल्म हिन्दी में बन ही नहीं रही, हिट भी हो रही है। 

फिल्म ‘पैडमैन’ संदेश की दृष्टि से अपने आप में विशिष्ट है। यह बताती है कि आज भी भारत में सिर्फ 18 फीसदी महिलाएं सैनिटरी पैड का इस्तेमाल करती हैं। इस फिल्म के बहाने सिर्फ महिलाओं ही नहीं, पूरे समाज को पीरिएड्स की स्वभाविकता और उसकी स्वास्थय संबंधी जानकारियों के प्रति सचेत किया गया। 

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