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Digital Review:नेटफ्लिक्स के दागों पर साबुन की बट्टी है इवान की सोनी
Mon, 21 Jan 2019 01:39 PM IST
विजय जैन
एंटरटेनमेंट डेस्क/ अमर उजाला डॉट कॉम
एंटरटेनमेंट डेस्क/ अमर उजाला डॉट कॉम
Published by: विजय जैन
Updated Mon, 21 Jan 2019 01:39 PM IST
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हिंदी सिनेमा में क्वेंटिन टैरिंटिनो घोलने वाले अनुराग कश्यप ने जब फिल्म उड़ान बनाई थी तो ये उनकी तरफ से दामन पर दाग छुड़ाने की कोशिश बनी थी, अब नेटफ्लिक्स ने ऐसी ही एक कोशिश की है फिल्म सोनी को अपने प्लेटफॉर्म पर रिलीज करके। फिल्म का कहीं कोई होर्डिंग तक मुंबई में नही दिखता जैसा सैक्रेड गेम्स या घूल के लिए नेटफ्लिक्स ने किया था, पर ये फिल्म अपने आप में अपना प्रचार है।
इवान अय्यर का नाम उनके अमेरिका से हिंदुस्तान आने से पहले उनकी पहली शॉर्ट फिल्म के जरिए पहुंचा था। सोनी भी वैसी ही फिल्म है जिसका नाम इसके नेटफ्लिक्स पर पहुंचने से पहले अच्छी फिल्मों के शौकीनों तक पहुंचता रहा है। कहानी में किरदारों का दम कैसे कैमरे के फ्रेम में उनके बैठने की जगह से भी दिखाया जा सकता है, कैसे बिना एडटिंग के तामझाम के एक सीन को एक ही बार में शूट करने के बावजूद इसका दम बनाए रखा जा सकता है और कैसे सिर्फ एक महिला टॉयलेट में एक पुरुष की मौजूदगी दिखाकर समाज की चौधराहट को तमाचा मारा जा सकता है, ये फिल्म सोनी बताती है।
एक गुस्सैल पुलिसवाली, उसकी सीनियर। दोनों की निजी जिंदगी में पुरुषों के अहं की रेत से बनते बिगड़ते टीले और इन टीलों के साथ दोनों को बहा ले जाने की कोशिश करते हालात। सोनी की कहानी सिर्फ लिंग आधारित भेदभाव की ही बात नहीं करती, ये समाज की उस अंतर्धारा को बेनकाब करती है जिसके बारे में बातें तो बड़ी बड़ी होती हैं, पर अमल रत्ती भर भी नहीं। फिल्म भले गीतिका विद्या के किरदार के नाम पर हो लेकिन फिल्म के हर कलाकार ने इसका नाम बनाए रखने में बराबर की जिम्मेदारी उठाई है। इवान अय्यर का निर्देशन और संपादन दोनों नंबर वन है।
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इवान अय्यर का नाम उनके अमेरिका से हिंदुस्तान आने से पहले उनकी पहली शॉर्ट फिल्म के जरिए पहुंचा था। सोनी भी वैसी ही फिल्म है जिसका नाम इसके नेटफ्लिक्स पर पहुंचने से पहले अच्छी फिल्मों के शौकीनों तक पहुंचता रहा है। कहानी में किरदारों का दम कैसे कैमरे के फ्रेम में उनके बैठने की जगह से भी दिखाया जा सकता है, कैसे बिना एडटिंग के तामझाम के एक सीन को एक ही बार में शूट करने के बावजूद इसका दम बनाए रखा जा सकता है और कैसे सिर्फ एक महिला टॉयलेट में एक पुरुष की मौजूदगी दिखाकर समाज की चौधराहट को तमाचा मारा जा सकता है, ये फिल्म सोनी बताती है।
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एक गुस्सैल पुलिसवाली, उसकी सीनियर। दोनों की निजी जिंदगी में पुरुषों के अहं की रेत से बनते बिगड़ते टीले और इन टीलों के साथ दोनों को बहा ले जाने की कोशिश करते हालात। सोनी की कहानी सिर्फ लिंग आधारित भेदभाव की ही बात नहीं करती, ये समाज की उस अंतर्धारा को बेनकाब करती है जिसके बारे में बातें तो बड़ी बड़ी होती हैं, पर अमल रत्ती भर भी नहीं। फिल्म भले गीतिका विद्या के किरदार के नाम पर हो लेकिन फिल्म के हर कलाकार ने इसका नाम बनाए रखने में बराबर की जिम्मेदारी उठाई है। इवान अय्यर का निर्देशन और संपादन दोनों नंबर वन है।
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