सुधीर मिश्रा करीब पांच साल बाद बॉक्सऑफिस पर लौटे हैं। राजनीति उनका प्रिय विषय रहा है और इस बार उन्होंने साहित्य की दुनिया के दो अमर किरदारों शरतचंद्र के देवदास और शेक्सपीयर के हैमलेट की कहानी को मिक्स किया है। प्यार और धोखा। उत्तर प्रदेश की राजनीति से वंशवाद और समाजवाद का तड़का लिया है। वफादार और गद्दार राजनीति में हमेशा होते हैं, वही कहानी के पहियों का काम करते हैं। दास देव में भी यही है। सुधीर मिश्रा ने थोड़े में ज्यादा कहने की कोशिश की है।
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Movie Review: देवदास कभी मरते नहीं, 'दास देव' को देखकर हो जाएगा यकीन
रवि बुले
Updated Sat, 28 Apr 2018 07:45 AM IST
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निर्माताः संजीव कुमार/गौरव शर्मा/मनोहर कानूनगो
सुधीर मिश्रा करीब पांच साल बाद बॉक्सऑफिस पर लौटे हैं। राजनीति उनका प्रिय विषय रहा है और इस बार उन्होंने साहित्य की दुनिया के दो अमर किरदारों शरतचंद्र के देवदास और शेक्सपीयर के हैमलेट की कहानी को मिक्स किया है। प्यार और धोखा। उत्तर प्रदेश की राजनीति से वंशवाद और समाजवाद का तड़का लिया है। वफादार और गद्दार राजनीति में हमेशा होते हैं, वही कहानी के पहियों का काम करते हैं। दास देव में भी यही है। सुधीर मिश्रा ने थोड़े में ज्यादा कहने की कोशिश की है।
सुधीर मिश्रा करीब पांच साल बाद बॉक्सऑफिस पर लौटे हैं। राजनीति उनका प्रिय विषय रहा है और इस बार उन्होंने साहित्य की दुनिया के दो अमर किरदारों शरतचंद्र के देवदास और शेक्सपीयर के हैमलेट की कहानी को मिक्स किया है। प्यार और धोखा। उत्तर प्रदेश की राजनीति से वंशवाद और समाजवाद का तड़का लिया है। वफादार और गद्दार राजनीति में हमेशा होते हैं, वही कहानी के पहियों का काम करते हैं। दास देव में भी यही है। सुधीर मिश्रा ने थोड़े में ज्यादा कहने की कोशिश की है।
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140 मिनट की यह तेज रफ्तार फिल्म है जिसमें आपको लग सकता है कि कहीं-कहीं कुछ-कुछ छूट रहा है। लेकिन लब्बोलुबाब यही है कि यहां हर किरदार सत्ता के घोड़े की सवारी करने के लिए आतुर हैं। सिवाय मुख्य किरदार, समाजवादी पिता के समाज-विमुख पुत्र देव प्रताप चौहान (राहुल भट्ट) के, जो शराब के नशे में गर्क और प्रेम की आत्मघाती रस्सी को अपने गले में डाले हुए है। राजनीति से विमुख देव पर दबाव है कि वह अपने दिवंगत पिता की राजनीतिक विरासत को संभाले।
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दास देव के कथानक में अगर आप दिलीप कुमार और शाहरुख खान वाली देवदास को ढूंढेंगे तो बुरी तरह निराश होंगे क्योंकि यह 1990 के आखिरी दशकों को दिखाती संपूर्ण राजनीतिक फिल्म है। इसका हर सिरा राजनीति और राजनीतिक मुद्दों से बंधा है। आधा दर्ज से ज्यादा राजनीतिक किरदार और भूमि अधिकार, किसानों का असंतोष तथा बाक्साइट खनन से जुड़े मुद्दे यहां चर्चा में हैं। देवदास की स्त्री पात्र पारो और चंद्रमुखी यहां पारो सिंह (ऋचा चड्ढा) और चांदनी मेहरा (अदिति राव हैदरी) हैं। दोनों प्रेम के बजाय राजनीति के लिए महत्वाकांक्षी हैं।
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सुधीर मिश्रा ने अपने किरदारों को रोचक ढंग से गढ़ा है। जयदीप सरकार ने उनके साथ मिलकर स्क्रीनप्ले लिखा है। फिल्म में कसावट है। संवाद भी रोचक और वर्तमान राजनीति के चेहरे से नकाब उठाने वाले हैं। चालाक चंद्रमुखी बनीं अदिति राव हैदरी, भ्रष्ट राजनेता बने सौरभ शुक्ला और पारो के असहाय पिता के रूप में अनिल जॉर्ज के किरदार निखर कर आते हैं। यहां देव का अंदाज वही देवदास वाला है जो आत्मघाती संवेदनाओं से लबरेज है।
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शायद देवदास के किरदार की यही खूबी सबको आकर्षित करती है कि उसके पास सबकुछ है मगर उसकी आत्मा में एक खालीपन है। वह प्यार और शराब से इसे भरना चाहता है और अंततः मर कर भी नहीं मरता। हालांकि बढ़े हुए राजनीतिक तापमान वाली किसी भी फिल्म में बदले की इतनी कहानियां, किस्से और कोण होते हैं कि अंत में आप यह परवाह नहीं करते कि कौन मरा और कौन जिया। यही दास देव में भी होता है। सुधीर मिश्रा की यह फिल्म राजनीतिक-थ्रिलर किस्म का सिनेमा पसंद करने वाले दर्शकों के लिए है।