Sarfira Review: अक्षय के डूबते करियर पर फिर विक्रम ने लगाया दांव, बंद हो चुकी एयरलाइंस के श्रीगणेश की कहानी
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तमिल में ‘सूररै पोट्रू’ को सुधा कोंगारा हिंदी में ‘सरफिरा’ क्यों कह रही हैं, ये तो वही जाने लेकिन तमिल में जो कहानी शूरवीर की जय कही जा रही है, उसे हिंदी में अक्षय के साथ सरफिरा नाम से बनाने की उनकी भी कुछ तो मजबूरी रही ही होगी। देश में सस्ती टिकटों वाली पहली एयरलाइन एयर डेक्कन स्थापित करने वाले भारतीय सेना के पूर्व कैप्टन गोपीनाथ की जिद की जीत पर बनी तमिल फिल्म ‘सूररै पोट्रू’ की हिंदी रीमेक ‘सरफिरा’ में शीर्षक भूमिका निभा रहे अक्षय कुमार को इससे काफी उम्मीदें भी हैं। असल जिंदगी में कैप्टन गोपीनाथ सरकारी सैनिक स्कूल में पढ़े, एनडीए की परीक्षा पासकर देहरादून की इंडियन मिलिट्री अकादमी में पढ़े और भारत-बांग्लादेश की लड़ाई के समय भारतीय फौज में रहे। नौकरी छोड़ने के बाद उन्होंने दुनिया भर के काम किए और वियतनाम युद्ध के बाद वहां एक युवती के कम पैसों वाली हेलीकॉप्टर सेवा शुरू करने की कहानी से प्रेरित होकर एयर डेक्कन शुरू करने में कामयाब रहे। ये एयरलाइंस अब बंद हो चुकी है। फिल्म बताती है कि कैप्टन गोपीनाथ अब सस्ते टिकटों वाली हवाई यात्राओं की सरकारी योजना उड़ान का हिस्सा हैं।
‘गजनी’, ‘सिंघम’, ‘फोर्स’ के बाद ‘सरफिरा’
तमिल अभिनेता सूर्या को चार साल पहले रिलीज फिल्म ‘सूररै पोट्रू’ के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला। सूर्या की ही फिल्मों पर हिंदी में ‘गजनी’, ‘सिंघम’ और ‘फोर्स’ जैसी चर्चित फिल्में बन चुकी हैं। अब बारी ‘सरफिरा’ की है। इसके हीरो अक्षय कुमार हैं जो 56 साल की उम्र में फोटोशॉप किए चेहरे से एक ऐसे युवा का किरदार करने की कोशिश कर रहे हैं जो अपने पिता की अंतिम यात्रा में इसलिए शामिल नहीं हो पाता है क्योंकि उसके पास हवाई यात्रा के लिए पैसे नहीं है। इसे ही फिल्म में सस्ती टिकटों वाली एयरलाइंस शुरू करने के लिए उत्प्रेरक बनने की वजह बताया गया है। कैप्टन गोपीनाथ की पुस्तक ‘सिंपली फ्लाई’ में उल्लिखित घटनाओं को फिल्म में सिनेमाई छूट का सहारा लेकर एक मनोरंजक कहानी बनाने के लिए जोड़ा घटाया गया है। और, अक्षय कुमार ने पूरी कोशिश की है कि किसी तरह वह इस फिल्म की कहानी के नायक की आयु के हिसाब से इसमें फिट हो सकें।
बायोपिक के खिलाड़ी का नया खेल
अक्षय कुमार काबिल अभिनेता हैं, इसमें संदेह नहीं है। इसके पहले भी वह असल जिंदगी से प्रेरित फिल्मों में अभिनय कर चुके हैं। ‘पैडमैन’, ‘सम्राट पृथ्वीराज’, ‘मिशन रानीगंज’, ‘केसरी’ और ‘एयरलिफ्ट’ जैसी उनकी फिल्में असल जिंदगी की कहानियों को ही परदे पर मनोरंजन का जरिया बनाने की कोशिशें रही हैं और इनके नतीजों से स्पष्ट होता है कि अक्षय कुमार बायोपिक फिल्मों के लिए फिट कलाकार नहीं है। सिनेमा में अपना खास तरह का मैनरिज्म स्थापित कर अपनी आभा विकसित करने वाले कलाकारों के सामने यही मैनरिज्म उनकी सबसे बडी बाधा भी बन जाता है। अक्षय कुमार का एक खास अंदाज में चलना, उनके हाथों की हरकतें और रोते समय का उनका अभिनय, एक फरमे में फंस चुका है। अक्षय को इससे बाहर निकालने का दुस्साहस अब कोई बिल्कुल नया निर्देशक ही कर सकता है, जिसे उनके आभामंडल से कोई लेना देना न हो।
फिल्म ‘सरफिरा’ की कहानी को चूंकि महाराष्ट्र की पृष्ठभूमि में रख गया है तो अक्षय कुमार, उनके दोस्त और उनकी पत्नी बनी राधिका मदान सब मराठी मिश्रित हिंदी बोलते हैं। मराठी बोलने का जो खास काव्यात्मक लहजा है, उसे वे आपस में बातें करते समय खूब याद रखते हैं लेकिन आसपास के लोग बदलते ही उनको बोली बदल जाती है। फिल्म की मराठी बार बार बाबूराव की याद दिलाती है और फिल्म ‘हेराफेरी’ में बाबूराव बने परेश रावल यहां वीर म्हात्रे की हर योजना को धरातल पर उतरने से पहले ही नाकाम करते रहने की कोशिश करने वाले बड़े कारोबारी परेश गोस्वामी बने हैं। ‘हेराफेरी’ में जो जो गालियां बाबूराव ने राजू को दीं, वे सब यहां वीर म्हात्रे को परेश को देते दिखाया गया है। असर हालांकि इनमें से एक का भी कहानी पर नहीं दिखाई देता। फिल्म की कहानी वाकई एक प्रेरक कहानी है लेकिन इस कहानी का उनवान ये है कि एयर डेक्कन की देखा देखी देश में शुरू हुई तमाम एयरलाइंस बंद हो चुकी हैं। खुद एयर डेक्कन भी अब सेवा में नहीं है।
फिल्म ‘सरफिरा’ एक तरह से यूपीए शासनकाल में नागरिक उड्डयन मंत्रालय और उसके सरकारी दफ्तरों में व्याप्त रहे कथित भ्रष्टाचार की कहानी कहती है और इस बात का उल्लेख बार बार करती है कि रतन टाटा को भी अपनी हवाई सेवा शुरू करने से पहले इस लाल फीताशाही का सामना करना पड़ा। फिल्म बनाने का असल उद्देश्य मूल में और हिंदी में भी यही दिखता है कि पिछली सरकार के समय कारोबारियों को होने वाली दिक्कतों को जनता के सामने लाया जाए। एयर डेक्कन की पहली उड़ान 25 अगस्त 2003 की है, तब केंद्र में यूपीए सरकार थी। लेकिन, ये एयरलाइंस जब बंद हुई, उसके कारणों की पड़ताल न मूल तमिल फिल्म ‘सूररै पोट्रू’ करती है और न ही ‘सरफिरा’। दोनों में फर्क बस इतना है कि ‘सरफिरा’ सिनेमाघरों में रिलीज हो रही है और ‘सूररै पोट्रू’ को सीधे ओटीटी पर रिलीज किया गया। फिल्म ‘सरफिरा’ में तारीफ के काबिल काम अक्षय कुमार के दोस्त बने दोनों कलाकारों ने किया है। प्रकाश बेलवाडी भी अपने हिस्से की चमक बनाए रखते हैं। सीमा बिस्वास को परदे पर देखना सबको अच्छा ही लगता है। फिल्म के गीत-संगीत और बाकी तकनीकी पहलुओं में ऐसा कुछ खास नहीं है जिसका अलग से उल्लेख करना फिल्म देखने के बाद याद रह पाए। रही बात परेश रावल की तो वह अब अभिनय नहीं करते हैं, वह फिल्म का हिस्सा बनने की हामी देकर फिल्म निर्माताओं पर इन दिनों ‘एहसान’ सा करते हैं।