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अपने शताब्दी वर्ष में बंद होने के कगार पर है गोरखपुर गांधी आश्रम, 250 रुपये से हुई थी इसकी शुरूआत

रोहित सिंह, गोरखपुर। Published by: vivek shukla Updated Sun, 13 Sep 2020 04:23 PM IST
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सार

  • प्रदेश सरकार की है करीब 1.79 करोड़ की बकाएदारी
  • कोरोना और लॉकडाउन में मांग हुई कम, 2.15 करोड़ का माल डंप
  • बुनकरों व कर्मचारियों को मजदूरी व वेतन तक देना हुआ मुश्किल

Gorakhpur Gandhi Ashram condition will closure in centenary year due to coronavirus impact
गोरखपुर गांधी आश्रम। - फोटो : अमर उजाला।
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विस्तार

अपने शताब्दी वर्ष में गोरखपुर का गांधी आश्रम बंदी के कगार पर खड़ा हो गया है। कोरोना काल में पहले लॉकडाउन और अब मांग कम होने से करीब 2.15 करोड़ का माल डंप पड़ा है। वहीं, प्रदेश सरकार की ओर से 1.79 करोड़ का भुगतान भी लंबित है, जिससे यहां के बुनकरों की मजदूरी, आश्रम के कर्मचारियों के वेतन आदि पर संकट खड़ा हो गया है। सचिव ने बताया कि अगर सरकार ने जल्द सहयोग नहीं किया तो 100 साल पुरानी इस कोऑपरेटिव संस्था को बंद करना पड़ेगा।

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सचिव विशेषर नाथ तिवारी ने बताया कि पिछले छह महीने से कोरोना के कारण गांधी आश्रम में ग्राहक नहीं आ रहे हैं। इससे कमाई नहीं हो रही है। मार्च में त्योहार से पहले स्टाक में सिल्क की साड़ियां, कांजीवरम साड़ियां, बंगाली साड़ियां, कोचमपल्ली, सिल्क, बंगलौरी सिल्क, बालूचरी कॉटन, कोली वूल समेत अन्य स्टाक पर्याप्त मात्रा में रखा गया था, लेकिन लॉकडाउन से व्यापार ठप पड़ गया। शुरूआत में बैंकों से लिए कर्ज से बुनकरों को मजदूरी दी, लेकिन अब उसका भी इंतजाम नहीं हो पा रहा है।
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सन 1920 में 250 रुपये से शुरू हुआ था गांधी आश्रम गोरखपुर
विशेषर नाथ ने बताया कि गोरखपुर गांधी आश्रम को 30 दिसंबर 1920 को आचार्य कृपलानी ने 250 रुपये से शुरू किया था। जम्मू-कश्मीर, पंजाब, दिल्ली, उत्तर प्रदेश/उत्तराखंड, मध्यप्रदेश, बंगाल में भी गांधी आश्रम शुरू कराए गए थे। उत्तर प्रदेश में 42 क्षेत्रीय कार्यालय बनाए गए थे। इनमें गोरखपुर भी एक था। शुरुआती दिनों में ग्रामीण क्षेत्रों में कतिन बुनकरों को रोजगार के माध्यम से गांधी आश्रम से जोड़ा गया। धीरे-धीरे 100 वर्ष पूरे होने की दिशा में है और अब गांधी जयंती पर संस्था अपनी आखिरी सांसें गिन रही है।

1965 से आ रहीं बनास की बालूचरी साड़ियां

बालुचेरी साड़ियां पश्चिम बंगाल के विष्णुपुर व मुर्शिदाबाद में बनती हैं। वर्ष 1965 से बनारस में भी बालुचेरी साड़ियों का निर्माण होने लगा। इन साड़ियों पर कढ़ाई के जरिये कई दृश्य उकेरे जाते हैं। फैशन को देखते हुए पिछले कुछ वर्षों से साड़ियों पर नई-नई डिजाइनें तैयार की जा रही हैं। सचिव ने बताया कि एक बालुचेरी साड़ी बनाने में एक महीने का समय लगता है।

इन मदों में है बकाया
सचिव ने बताया कि प्रदेश सरकार की ओर से 40 लाख रुपये मार्केटिंग डेवलपमेंट का बकाया है। जबकि 1.39 करोड़ रुपये का भुगतान सन 2015-16 से विभिन्न मदों में बकाया है। बजट खादी ग्रामोद्योग बोर्ड उत्तर प्रदेश से स्वीकृत होने के बाद ही मिलता है। इसे लेकर जिला ग्रामोद्योग अधिकारी अपने माध्यम से बिल भेजते हैं। सभी प्रक्रिया पूरी की जा चुकी है, लेकिन अभी तक भुगतान नहीं हो सका।

जिला ग्रामोद्योग अधिकारी एनपी मौर्या ने बताया कि पिछले वर्षों का वित्तीय मामला है। लंबे समय से भुगतान रुका है। वर्तमान में सरकार प्राथमिकता के आधार पर बजट आवंटित कर रही है। हिसाब बनाकर गांधी आश्रम की तरफ से दिया गया था। इसे बोर्ड में भेज दिया गया था। राज्य सरकार से बजट रुका है। सरकार की तरफ से जैसे ही बजट स्वीकृत होगा, भुगतान कर दिया जाएगा।

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