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साहिष्णुता और समन्वयता से ही चलना चाहिए समाज : मोहन भागवत

Gorakhpur Bureau गोरखपुर ब्यूरो
Updated Mon, 16 Feb 2026 02:30 AM IST
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The Sarsanghchalak of the Rashtriya Swayamsevak Sangh spoke at a major public meeting.
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गोरखपुर। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने कहा कि विश्व के पास ऐसा कोई तरीका नहीं है जो समाज को सुख और शांति दे सके, इसलिए वह भी हमारी तरफ आशा भरी नजरों से देख रहा है। यही कारण है कि आज समाज में संघ से अपेक्षाएं बढ़ी हैं। उन्होंने कहा कि समाज सहिष्णुता और समन्वयता से ही चलना चाहिए। अपने स्वार्थ के लिए नहीं दूसरों के हित के लिए चलना ही भारतीय संस्कृति है। संघ की दृष्टि पूर्णतया भारतीय चिंतन पर आधारित है।
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संघ के सर संघचालक डॉ. मोहन भागवत, रविवार को आरएसएस, गोरक्षप्रांत की ओर से योगिराज बाबा गंभीरनाथ प्रेक्षागृह में आयोजित प्रमुख जन गोष्ठी को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि भारत में पाश्चात्य चिंतन का प्रभाव पड़ने लगा था, जिसने भारतीय ज्ञान परंपरा को खंडित करने का प्रयास किया। उनकी चिंतन पद्धति अधूरी थी। भारतीय ज्ञान परंपरा पर आधारित हमारी चिंतन पद्धति ही समाज में उत्पन्न शंकाओं का समाधान कर सकती हैं। इसलिए संघ शताब्दी वर्ष में हमने समाज तक जाने का निर्णय लिया, जिससे हम समाज को संगठित कर सकें। उन्होंने कहा कि संघ एक स्वायत्त, स्वतंत्र व स्वावलंबी संगठन है जो अपने लिए नहीं राष्ट्र के लिए समर्पित है। संघ प्रभाव, सत्ता, लोकप्रियता का भी आकांक्षी नहीं है बल्कि समाज के हित में सभी कार्यों को करने वाला ही संघ है। संघ प्रेम और संस्कार से चलेगा जिसका विचार सनातन होगा। जिसका उद्देश्य समाज पुनर्गठित करना होगा। समाज के कृतित्व से ही राष्ट्र बनते या बिगड़ते है इसलिए यदि समाज जागृत होगा तो कार्य ठीक होगा।
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कमियों को ठीक करने के लिए समाज को खड़ा करना जरूरी
संघ प्रमुख ने संघ की स्थापना और कार्य पद्धति पर चर्चा करते हुए कहा कि केशव बलिराम हेडगेवार ने यह सुनिश्चित करना चाहा कि भारत को स्वतंत्रता तो मिलेगी ही लेकिन यह पुनः नहीं जाएगी। इसलिए हमें अपनी कमियों को ठीक करना आवश्यक है। समाज को इसके लिए खड़ा करना होगा। हमें अपने स्वार्थ को छोड़कर स्वस्थ समाज के निर्माण के लिए संगठित होना होगा। इसके लिए उन्होंने सन् 1925 ई. में विजयादशमी के दिन संघ के काम को शुरू किया। संघ स्थापना के 14 वर्ष बाद संघ की कार्य पद्धति स्पष्ट हुई, जिसका नाम राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ है।



देश में रहने वाला प्रत्येक व्यक्ति हिंदू
गोरखपुर। संघ प्रमुख ने अपने चिंतन व्यक्तव्य में संघ हिंदू समाज की बात क्यों करता है, इसे स्पष्ट किया। कहा इस देश में रहने वाला प्रत्येक व्यक्ति हिंदू है। हिंदू समाज मानता है कि हमारा रास्ता भी ठीक है और तुम्हारा भी। इस समाज में रुचि के अनुसार अन्य-अन्य पंथ संप्रदाय है। रास्ते अलग अलग हो सकते है लेकिन लक्ष्य एक ही है। इस धारणा को मानने वाला ही हिंदू समाज है। उन्होंने कहा कि वास्तव में हिंदू शब्द एक संज्ञा नहीं, बल्कि व्याकरण की दृष्टि से एक विशेषण है जो गुणधर्म बताता है जो सबको एक साथ चलाता है। मोक्ष की तरफ ले जाता है। यही हिंदू धर्म है। यह हिंदू नाम भारत के साथ रूढ़ हो गया है इसलिए हिंदू नाम से ही सनातन जगेगा। जो भूल गए है कि हम हिंदू है, उन्हें याद दिलाना है। जिससे हिंदू समाज खड़ा हो सके। हमें अपना ध्येय पूर्ण करना है।

धर्म हमारे आचरण का हिस्सा
गोरखपुर। संघ प्रमुख ने कहा कि हमारा राष्ट्र धर्मप्राण राष्ट्र है। धर्म हमारे आचरण का हिस्सा है। इसके लिए संस्कार की आवश्यकता थी। पीढ़ी दर पीढ़ी मानवीय आदतें बनाई गई, यही संस्कार है और इससे ही संस्कृति बनी। इसी संस्कृति के आधार पर राष्ट्र का निर्माण हुआ। हम एक हैं इस सत्य को हमने जाना। विविधता के होते हुए हमारे राष्ट्र को जोड़ने का वाला आधार भारत स्वरूप मातृ शक्ति है। मंच पर सरसंघचालक के साथ प्रांत संघचालक डॉ. महेंद्र अग्रवाल व कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे पूर्व कुलपति प्रो. चंद्रशेखर उपस्थित रहे। कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्ज्वलन और समापन वंदे मातरम के साथ हुआ। प्रांत कार्यवाह विनय ने अतिथि परिचय करवाया और प्रांत बौद्धिक प्रमुख डॉ. अरविंद सिंह ने प्रस्ताविकी रखी।
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