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UP में बाढ़ की दुश्वारी: दादी नहीं, नानी के घर गूंजेगी किलकारी, गांवों से निकलना दुश्वार, खतरा नहीं लेना चाहते

Sun, 09 Aug 2026 01:00 PM IST
Sharukh Khan अमर उजाला नेटवर्क, महराजगंज
अमर उजाला नेटवर्क, महराजगंज Published by: Sharukh Khan Updated Sun, 09 Aug 2026 01:00 PM IST
सार

महाराजगंज में बाढ़ से दुश्वारियां भी उफान पर हैं। बाढ़ से घिरे गांवों से निकलना दूभर हो गया है। स्वास्थ्य विभाग के रिकॉर्ड में सोहगीबरवा इलाके के तीन गांवों में 84 गर्भवतियां हैं। इनमें से 34 ने मायके और रिश्तेदारों के घर शरण ले ली है। 

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UP Flood Crisis Pregnant Women Move to Maternal Homes Amid  Floodwaters  in Maharajganj
UP Flood Crisis - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

यूपी के महराजगंज के निचलौल में नदियों के बढ़ते जलस्तर के साथ तटवर्ती गांवों में दुश्वारियां भी उफान पर हैं। बाढ़ से घिर चुके सोहगीबरवा जंगल के बीच बसे लोगों के लिए गांव से निकलना मुश्किल होता जा रहा है। ऐसे हालात में समय पर इलाज मिल सके इस लिहाज से इन गांवों की गर्भवतियों ने मायके और अन्य रिश्तेदारों के घर में पनाह ली है। 
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अब इनके नवजात की किलकारी दादी से पहले नानी के घर में गूंजेगी। जंगल के बीच बसे सोहगीबरवा, शिकारपुर और भोतहा समेत अन्य गांवों के लोगों को सामान्य दिनों में भी इलाज के लिए मुश्किलें उठानी पड़ती हैं। 
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वजह यह है कि इन गांवों के लिए बने आरोग्य मंदिर बंद पड़े रहते हैं और गांव से खड्डा या निचलौल कस्बे तक जाने के लिए लोगों को 40 से 60 किलोमीटर तक का सफर करना पड़ता है। प्यास और चंदन नदी के साथ ही रोहुआ नाले में बाढ़ की वजह से क्षेत्र के सात गांवों का सड़क मार्ग से संपर्क पूरी तरह से कट गया है।

 

गांव की एक एएनएम ने नाम न प्रकाशित करने का अनुरोध करते हुए बताया कि बाढ़ से घिरे सोहगीबरवा, शिकारपुर व भोतहा में 84 गर्भवतियां चिह्नित हैं। इनमें से 34 घर छोड़कर सुरक्षित स्थानों पर चली गई हैं।
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11 गर्भवतियां मायके में रह रही हैं। सोहगीबरवा की महिला प्रधान सुनीता देवी ने बताया कि गांव में जिन महिलाओं का प्रसव अगस्त से अक्तूबर के बीच होना होता है उनको किसी सुरक्षित स्थान पर पहुंचाना ही पड़ता है।
 

प्रसव के बाद घर लाएंगे पत्नी और बच्चे को
भोतहा गांव के रहने वाले भोला की पत्नी पूजा छह माह की गर्भवती है। गांव बाढ़ से घिर जाने की वजह से भोला ने पत्नी को बिहार के बगहा स्थित उसके मायके भेज दिया है। भोला का कहना है कि इस स्थिति में किसी तरह का खतरा मोल नहीं लेना चाहते। प्रसव हो जाने के बाद अक्तूबर में पत्नी बच्चे को घर लाएंगे तब तक बाढ़ भी खत्म हो जाएगी। 

 

खतरा मोल नहीं लेना चाहते
भोतहा के ही दिलीप की पत्नी गुड़िया सात माह की गर्भवती है। दिलीप ने बताया कि बाढ़ का पानी गांव के बाहर आ गया है और संपर्क मार्ग डूब चुका है। ऐसे में इमरजेंसी में अस्पताल ले जाना मुश्किल होता इसलिए पत्नी को गोरखपुर स्थित मकान पर भेज दिया है। अब वह डिलीवरी के बाद ही घर आएगी।

 

बरसात के मौसम में हर साल मुश्किल बढ़ जाती है। बाढ़ में तो मुसीबत ही जाती है। गांव में कोई सुविधाजनक अस्पताल न होने के कारण और अगस्त से अक्टूबर तक गर्भवतियों को दिक्कतों का सामना करना पड़ता है लिहाजा परिवार के लोग उन्हें रिश्तेदारों के यहां भेज देते हैं। इस साल भी कई गर्भवतियां गांव से जा चुकी हैं।
- लल्लन यादव, ग्राम प्रधान/प्रशासक, शिकारपुर
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