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Kaithal News: डॉक्टर ने दवा लिखी, कर्मचारी ने पर्ची उछाली...ये बाहर से मिलेगी
संवाद न्यूज एजेंसी, कैथल
Updated Tue, 24 Feb 2026 03:48 AM IST
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बाहर से मिलने वाली दवा की पर्ची दिखाता विकास। संवाद
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नरेंद्र पंडित
कैथल। नागरिक अस्पताल के दवा काउंटर पर सोमवार को समय करीब दोपहर 12.05 बजे। महिला मरीज दवा काउंटर पर डाक्टर की लिखी हुई पर्ची देकर बोली कि भईया ये दवा देना। कर्मचारी ने पर्ची देखी और तीन-चार पत्ते दवा के देकर पर्ची महिला की तरफ उछाली और बोला कि बाकी दवा बाहर से मिलेगी। महिला भी मजबूरी में पर्ची उठाकर मायूस मन से बाहर की ओर चल पड़ी। ये स्थिति आजकल नागरिक अस्पताल में आमतौर पर बनी हुई है।
अस्पताल के दवा भंडार में कई दवाएं समाप्त हैं। अस्पताल में मुफ्त दवा मिलने की आस में आने वाले मरीजों को यहां दवा की बजाय बेबसी मुफ्त मिल रही है। गरीब तबके के लोग आर्थिक तंगी के अभाव में अस्पताल से ही मिली आधी-अधूरी दवाओं से ही काम चला रहे हैं। सरकारी अस्पताल में वे लोग आते हैं जिनके पास निजी अस्पतालों में जाने का सामर्थ्य नहीं होता। लेकिन यहां 60 से 70 प्रतिशत दवाइयां बाहर से खरीदने को कहा जा रहा है। एक तरफ बीमारी की मार और दूसरी तरफ महंगे दामों पर निजी स्टोर से दवा खरीदने का दबाव मरीज दोहरी चक्की में पिस रहे हैं। संवाद
स्थानीय दवा विक्रेताओं का भुगतान भी अटका
अस्पताल में दवाओं की किल्लत का कारण स्वास्थ्य महकमे पर चढ़ा भारी-भरकम कर्ज है। जब मुख्य स्टॉक खत्म होता है, तो अस्पताल प्रशासन स्थानीय स्तर पर लोकल परचेज के जरिए दवाएं उपलब्ध कराता है, लेकिन स्वास्थ्य विभाग पिछले लंबे समय से स्थानीय दवा विक्रेताओं का भुगतान करने में विफल रहा है। कर्ज का ग्राफ इतना बढ़ गया है कि अब विक्रेताओं ने उधार में दवा देने से हाथ खड़े कर दिए हैं। महकमे पर करीब एक करोड़ रुपये का कर्ज चढ़ गया है। यदि जल्द ही बजट जारी नहीं हुआ, तो अस्पताल में बची-कुची दवाइयों की सप्लाई भी ठप हो सकती है।
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ये हैं बाजार में दवाओं के रेट
- आंख की दवाई : बाजार में 70-80 रुपये
- बच्चे के गले की : 100-120 रुपये
- सांस के रोग की : 80-120 रुपये
- पीलिया की : 120-150 रुपये
- आर्थोपेडिक : 70-80 रुपये
नोट : दवा कंपनी के अनुसार अलग-अलग रेट हो सकते हैं।
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मरीजों की मुंह जुबानी
मजबूरी में बाहर से लेनी पड़ेगी
- गांव क्योड़क निवासी विकास ने कहा कि लंबे इंतजार के बाद नंबर आया था। कर्मचारी ने कुछ दवाएं देकर कहा कि बाकी दवा बाहर से मिलेगी। आर्थोपेडिक की दवा बाहर से लिखी गई है। मजबूरी में लेनी पड़ेगी और क्या कर सकते हैं।
पर्ची मेरी तरफ उछाल दी
- क्योड़क निवासी सुदेश ने बताया कि वी पीलिया से संबंधित उपचार के लिए आई थी। डाक्टर की दवा लिखी पर्ची काउंटर पर दी तो कुछ दवाएं देकर पर्ची मेरी तरफ उछाल दी और बोले कि बाकी बाहर से मिलेगी। ऐसी स्थिति में गरीब आदमी क्या करे।
50 रुपये की शीशी मिली
- हाबड़ी से बिशंबर ने बताया कि काउंटर पर काफी देर खड़ा रहा। जब बारी आई तो बच्चे की दवा नहीं मिली तो वह मायूस बन से जन औधषि केंद्र पर गया। वहां से 50 रुपये की शीशी मिली है। यहां न मिलती तो और भी महंगी मिलती।
केवल एक ही दवा मिली
- बुढ़ा खेड़ा से साधु राम ने बताया कि वह आंख की दवाई लेन आया था। दवा काउंटर पर केवल एक ही दवा मिली जबकि दूसरी के लिए मना कर दिया। तो जन औषधि केंद्र से मजबूरी में 30 रुपये में ली।
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वर्जन
सिविल सर्जन डा. रेनू चावला ने बताया कि स्टॉक में दवाएं उपलब्ध हैं। कुछ दवाएं समाप्त होती है तो लोकल परचेज कर मरीजों को उपलब्ध कराई जाती हैं। चेक कराएंगे कौन सी दवाएं कम हैं, उनकी परचेज की जाएगी। मरीजों का निशुल्क दवाएं उपलब्ध कराई जाएंगी।
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कैथल। नागरिक अस्पताल के दवा काउंटर पर सोमवार को समय करीब दोपहर 12.05 बजे। महिला मरीज दवा काउंटर पर डाक्टर की लिखी हुई पर्ची देकर बोली कि भईया ये दवा देना। कर्मचारी ने पर्ची देखी और तीन-चार पत्ते दवा के देकर पर्ची महिला की तरफ उछाली और बोला कि बाकी दवा बाहर से मिलेगी। महिला भी मजबूरी में पर्ची उठाकर मायूस मन से बाहर की ओर चल पड़ी। ये स्थिति आजकल नागरिक अस्पताल में आमतौर पर बनी हुई है।
अस्पताल के दवा भंडार में कई दवाएं समाप्त हैं। अस्पताल में मुफ्त दवा मिलने की आस में आने वाले मरीजों को यहां दवा की बजाय बेबसी मुफ्त मिल रही है। गरीब तबके के लोग आर्थिक तंगी के अभाव में अस्पताल से ही मिली आधी-अधूरी दवाओं से ही काम चला रहे हैं। सरकारी अस्पताल में वे लोग आते हैं जिनके पास निजी अस्पतालों में जाने का सामर्थ्य नहीं होता। लेकिन यहां 60 से 70 प्रतिशत दवाइयां बाहर से खरीदने को कहा जा रहा है। एक तरफ बीमारी की मार और दूसरी तरफ महंगे दामों पर निजी स्टोर से दवा खरीदने का दबाव मरीज दोहरी चक्की में पिस रहे हैं। संवाद
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स्थानीय दवा विक्रेताओं का भुगतान भी अटका
अस्पताल में दवाओं की किल्लत का कारण स्वास्थ्य महकमे पर चढ़ा भारी-भरकम कर्ज है। जब मुख्य स्टॉक खत्म होता है, तो अस्पताल प्रशासन स्थानीय स्तर पर लोकल परचेज के जरिए दवाएं उपलब्ध कराता है, लेकिन स्वास्थ्य विभाग पिछले लंबे समय से स्थानीय दवा विक्रेताओं का भुगतान करने में विफल रहा है। कर्ज का ग्राफ इतना बढ़ गया है कि अब विक्रेताओं ने उधार में दवा देने से हाथ खड़े कर दिए हैं। महकमे पर करीब एक करोड़ रुपये का कर्ज चढ़ गया है। यदि जल्द ही बजट जारी नहीं हुआ, तो अस्पताल में बची-कुची दवाइयों की सप्लाई भी ठप हो सकती है।
ये हैं बाजार में दवाओं के रेट
- आंख की दवाई : बाजार में 70-80 रुपये
- बच्चे के गले की : 100-120 रुपये
- सांस के रोग की : 80-120 रुपये
- पीलिया की : 120-150 रुपये
- आर्थोपेडिक : 70-80 रुपये
नोट : दवा कंपनी के अनुसार अलग-अलग रेट हो सकते हैं।
मरीजों की मुंह जुबानी
मजबूरी में बाहर से लेनी पड़ेगी
- गांव क्योड़क निवासी विकास ने कहा कि लंबे इंतजार के बाद नंबर आया था। कर्मचारी ने कुछ दवाएं देकर कहा कि बाकी दवा बाहर से मिलेगी। आर्थोपेडिक की दवा बाहर से लिखी गई है। मजबूरी में लेनी पड़ेगी और क्या कर सकते हैं।
पर्ची मेरी तरफ उछाल दी
- क्योड़क निवासी सुदेश ने बताया कि वी पीलिया से संबंधित उपचार के लिए आई थी। डाक्टर की दवा लिखी पर्ची काउंटर पर दी तो कुछ दवाएं देकर पर्ची मेरी तरफ उछाल दी और बोले कि बाकी बाहर से मिलेगी। ऐसी स्थिति में गरीब आदमी क्या करे।
50 रुपये की शीशी मिली
- हाबड़ी से बिशंबर ने बताया कि काउंटर पर काफी देर खड़ा रहा। जब बारी आई तो बच्चे की दवा नहीं मिली तो वह मायूस बन से जन औधषि केंद्र पर गया। वहां से 50 रुपये की शीशी मिली है। यहां न मिलती तो और भी महंगी मिलती।
केवल एक ही दवा मिली
- बुढ़ा खेड़ा से साधु राम ने बताया कि वह आंख की दवाई लेन आया था। दवा काउंटर पर केवल एक ही दवा मिली जबकि दूसरी के लिए मना कर दिया। तो जन औषधि केंद्र से मजबूरी में 30 रुपये में ली।
वर्जन
सिविल सर्जन डा. रेनू चावला ने बताया कि स्टॉक में दवाएं उपलब्ध हैं। कुछ दवाएं समाप्त होती है तो लोकल परचेज कर मरीजों को उपलब्ध कराई जाती हैं। चेक कराएंगे कौन सी दवाएं कम हैं, उनकी परचेज की जाएगी। मरीजों का निशुल्क दवाएं उपलब्ध कराई जाएंगी।

बाहर से मिलने वाली दवा की पर्ची दिखाता विकास। संवाद

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