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Karnal News: फल्गु तीर्थ ने फरल गांव को दी विश्व पटल पर पहचान

संवाद न्यूज एजेंसी, करनाल Updated Wed, 10 Jun 2026 11:08 PM IST
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Phalgu Tirth has brought global recognition to Faral village.
गांव में ​स्थित महाभारत कालीन वृक्ष। संवाद
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नरेंद्र राणा

पूंडरी। गांव फरल कैथल जिले ही नहीं, बल्कि पूरे प्रदेश व देश में विश्व प्रसिद्ध फल्गु तीर्थ की वजह से पहचान रखता है। गांव फरल पूंडरी से पिहोवा रोड पर स्थित है। फरल गांव का नामकरण भी फलकी वन से ही पड़ा। फलकी वन में ही महर्षि फल्गु निवास करते थे। वामन पुराण में काम्यक वन, अदिति वन, व्यास वन, सूर्यवन, मधुवन व शीत वन के साथ फलकी वन का भी उल्लेख हुआ है। यह सभी सात वन प्राचीन कुरुक्षेत्र भूमि के प्रमुख वन थे।
इस तीर्थ का वर्णन महाभारत, वामन पुराण, मत्स्य पुराण और नारद पुराण में भी मिलता है। महाभारत व वामन पुराण दोनों में यह तीर्थ देवताओं की तपस्या की विशेष स्थली के रूप में उल्लिखित है। महाभारत वन पर्व में तीर्थयात्रा प्रसंग के अंतर्गत इस तीर्थ के महत्त्व के विषय में स्पष्ट उल्लेख है। महाभारत के अनुसार इस तीर्थ में स्नान करने व देवताओं का तर्पण करने से मनुष्य को अग्निष्टोम और अतिरात्र यज्ञों के करने से भी कहीं अधिक श्रेष्ठतर फल को प्राप्त होता है।
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वामन पुराण के अनुसार सोमवार की अमावस्या के दिन इस तीर्थ में किया गया श्राद्ध पितरों को वैसा ही तृप्त और संतुष्ट करता है, जैसा कि गया में किया गया श्राद्ध। कहा जाता है कि मात्र मन से जो व्यक्ति फलकी वन का स्मरण करता है, निःसन्देह उसके पितर तृप्त हो जाते हैं।
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गांव में महाराणा प्रताप की राज्य की सबसे ऊंची प्रतिमा स्थापित

ऐतिहासिक व प्राचीन गांव फरल जो वर्ष 1968 में बनी सड़क अंबाला से जींद रोड पर स्थित है। जो कि पूंडरी से पिहोवा के नाम पर भी जानी जाती है। गांव की आबादी की बात करें तो 15 हजार से अधिक है और लगभग 8500 मतदाता हैं। गांव में प्रवेश पर वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप की हरियाणा की सबसे ऊंची प्रतिमा स्थापित है, जो गांव की शोभा बढ़ा रही है। इसके अलावा पूंडरी रोड पर ही उत्तर दिशा में तिरंगा चौक भी गांव की पहचान बन चुका है।

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कुषाण कालीन तांबे के सिक्के मिल चुके
पुरातात्विक उत्खनन व अन्वेषण का अनुभव रखने वाले जसबीर सिंह ने कुषाण से हड़प्पा तक का सफर बताया। इस ऐतिहासिक टीले पर विभिन्न कालखंडों की संस्कृतियों की परतें एक के ऊपर एक समाई हुई हैं। फरल के इस टीले पर कुषाण कालीन तांबे के सिक्के मिल चुके हैं।


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सैंकड़ों वर्ष प्राचीन वट वृक्ष गांव की धरोहर
संदीप क्वात्रा ने बताया कि फल्गु तीर्थ पर सैकड़ों वर्ष पुराना वट वृक्ष खड़ा है, जो कि ग्रामीणों ही नहीं बल्कि दूर-दुराज के लोगों के लिए भी पूजनीय है। इस वृक्ष को पिछले सौ वर्ष से लोग बुड्ढा बड़ कहते सुने गए हैं। उन्होंने बताया कि लोग इस पेड़ की सुबह-शाम पूजा करते हैं। अमावस्या पर इस पेड़ के नीचे पूजा करने का अलग ही महत्व है। सांसद नवीन जिंदल से लेकर मुख्यमंत्री तक इस पेड़ के नीचे अपने चुनाव की जनसभा को संबोधित कर चुके हैं।

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गांव में सभी भाईचारे के साथ रहते
ग्रामीण देवव्रत राणा ने बताया कि गांव रावत, महमत व राणा तीन पट्टियों में बंटा हुआ हैं, जिसमें सभी बिरादरी के लोग आपसी मेलजोल और भाईचारे के साथ रहते हैं। गांव की सबसे बड़ी पट्टी महमत पट्टी है।

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गांव के पास करीब 52 हजार बीघा जमीन
ग्रामीण नवीन राणा ने बताया कि गांव फरल के पास आसपास के गांवों से कहीं अधिक जमीन है। करीब 52 हजार बीघा से अधिक जमीन फरल के लोगों के पास है। सभी अपने खेतों में अलग-अलग फसलों को उगाते हैं।

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गांव में मंदिर और गुरुद्वारे व 4 मुख्य तीर्थ
ग्रामीण पंडित भीम शर्मा ने बताया कि गांव में फल्गु तीर्थ, पानेश्वर तीर्थ, मधुश्रवा तीर्थ व वनवेश्वर तीर्थ जो कि प्राचीन व ऐतिहासिक मान्यता प्राप्त हैं। गांव में शिव मंदिर, हनुमान मंदिर, काली माता मंदिर, सांईं मंदिर, रविदास मंदिर, वाल्मिकी मंदिर, राधा मंदिर के अलावा 2 गुरुद्वारे हैं।

गांव में स्थित महाभारत कालीन वृक्ष। संवाद

गांव में स्थित महाभारत कालीन वृक्ष। संवाद

गांव में स्थित महाभारत कालीन वृक्ष। संवाद

गांव में स्थित महाभारत कालीन वृक्ष। संवाद

गांव में स्थित महाभारत कालीन वृक्ष। संवाद

गांव में स्थित महाभारत कालीन वृक्ष। संवाद

गांव में स्थित महाभारत कालीन वृक्ष। संवाद

गांव में स्थित महाभारत कालीन वृक्ष। संवाद

गांव में स्थित महाभारत कालीन वृक्ष। संवाद

गांव में स्थित महाभारत कालीन वृक्ष। संवाद

गांव में स्थित महाभारत कालीन वृक्ष। संवाद

गांव में स्थित महाभारत कालीन वृक्ष। संवाद

गांव में स्थित महाभारत कालीन वृक्ष। संवाद

गांव में स्थित महाभारत कालीन वृक्ष। संवाद

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