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Kurukshetra News: गहरी आस्था के प्रतीक हैं सरस्वती तीर्थ के आसपास स्थित कई प्राचीन मंदिर
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पिहोवा। सरस्वती तीर्थ पर स्थित प्रेत पीपल। संवाद
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पिहोवा। सरस्वती तीर्थ पर 16 मार्च से चैत्र चौदस मेला शुरू होगा। इसके लिए श्रद्धालुओं में उत्साह बना हुआ है। 19 मार्च तक चलने वाले मेले की प्रशासन की ओर से तैयारियां की जा रही हैं। इसमें दूर-दराज से लाखों श्रद्धालुओं के पहुंचने की उम्मीद है। सरस्वती तीर्थ के आसपास ही कई प्राचीन मंदिर हैं जोकि धार्मिक मान्यताओं के अनुसार बहुत अहम माने जाते हैं, जिनके दर्शन करने से पूर्वजों को आत्मिक शांति मिलती है और परिवार में सुख-समृद्धि आती है।
सरस्वती तीर्थ पर स्थित स्वामी कार्तिकेय मंदिर भी श्रद्धालुओं की गहरी आस्था और श्रद्धा का प्रमुख केंद्र है। भगवान स्वामी कार्तिकेय को देवताओं के सेनापति के रूप में पूजा जाता है और सनातन धर्म में उनका विशेष महत्व माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार स्वामी कार्तिकेय भगवान शिव और माता पार्वती के पुत्र हैं। उन्हें साहस, शक्ति और ज्ञान का प्रतीक माना जाता है। इस मंदिर में महिलाओं का प्रवेश वर्जित है। पिंडदान के बाद लोग यहां पर सरसों का तेल चढ़ाते हैं।
तीर्थ पर एक अत्यंत प्राचीन पीपल का वृक्ष स्थित है, जिसे स्थानीय लोग श्रद्धा व आस्था के साथ ‘प्रेत पीपल’ के नाम से जानते हैं। यह वृक्ष वर्षों से श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बना हुआ है और यहां आने वाले लोग अपने पितरों की शांति और मोक्ष की कामना से पूजा-अर्चना करते हैं और पेड़ पर सरस्वती नदी का जल अर्पित करते हैं।
मान्यता है कि सरस्वती तीर्थ पर स्थित इस प्रेत पीपल के नीचे पितरों की आत्मा की शांति के लिए विशेष रूप से पूजा की जाती है। दूर-दराज से आने वाले श्रद्धालु यहां दीप प्रज्वलित करते हैं, जल अर्पित करते हैं और अपने पूर्वजों की स्मृति में प्रार्थना करते हैं। स्थानीय पंडितों के अनुसार इस स्थान पर विधि-विधान से पूजा करने से पितृदोष से मुक्ति मिलती है और परिवार में सुख-समृद्धि बनी रहती है। इतिहासकारों और धार्मिक विद्वानों का भी मानना है कि पिहोवा प्राचीन काल से ही पितृ तर्पण और श्राद्ध कर्म के लिए प्रसिद्ध रहा है।
सरस्वती नदी के तट पर स्थित होने के कारण यहां सदियों से धार्मिक अनुष्ठान और कर्मकांड होते आ रहे हैं। इसी परंपरा के अंतर्गत प्रेत पीपल का वृक्ष भी विशेष महत्व रखता है। विशेषकर अमावस्या, पितृपक्ष और अन्य धार्मिक अवसरों पर यहां विशेष भीड़ देखी जाती है।
वाल्मीकि मंदिर- संत परंपरा और आध्यात्मिक विरासत की भी अमूल्य धरोहर
सरस्वती तीर्थ पर स्थित वाल्मीकि मंदिर न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है बल्कि यह भारतीय संस्कृति, संत परंपरा और आध्यात्मिक विरासत की भी अमूल्य धरोहर है। पवित्र सरस्वती तीर्थ पर बना वाल्मीकि मंदिर श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र है। उनकी ओर से रचित महान ग्रंथ रामायण भारतीय संस्कृति और धर्म का आधार स्तंभ माना जाता है। इसी कारण सरस्वती तट पर स्थित यह मंदिर संत महापुरुषों और श्रद्धालुओं के लिए श्रद्धा का प्रमुख केंद्र बन गया है। हर वर्ष दूर-दराज से श्रद्धालु इस मंदिर में दर्शन करने और आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए पहुंचते हैं। विशेष अवसरों पर यहां धार्मिक कार्यक्रम, भजन-कीर्तन और सामूहिक प्रार्थनाएं भी आयोजित की जाती हैं। स्थानीय लोगों का मानना है कि इस मंदिर में सच्चे मन से की गई प्रार्थना अवश्य फलदायी होती है।
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सरस्वती तीर्थ पर स्थित स्वामी कार्तिकेय मंदिर भी श्रद्धालुओं की गहरी आस्था और श्रद्धा का प्रमुख केंद्र है। भगवान स्वामी कार्तिकेय को देवताओं के सेनापति के रूप में पूजा जाता है और सनातन धर्म में उनका विशेष महत्व माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार स्वामी कार्तिकेय भगवान शिव और माता पार्वती के पुत्र हैं। उन्हें साहस, शक्ति और ज्ञान का प्रतीक माना जाता है। इस मंदिर में महिलाओं का प्रवेश वर्जित है। पिंडदान के बाद लोग यहां पर सरसों का तेल चढ़ाते हैं।
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तीर्थ पर एक अत्यंत प्राचीन पीपल का वृक्ष स्थित है, जिसे स्थानीय लोग श्रद्धा व आस्था के साथ ‘प्रेत पीपल’ के नाम से जानते हैं। यह वृक्ष वर्षों से श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बना हुआ है और यहां आने वाले लोग अपने पितरों की शांति और मोक्ष की कामना से पूजा-अर्चना करते हैं और पेड़ पर सरस्वती नदी का जल अर्पित करते हैं।
मान्यता है कि सरस्वती तीर्थ पर स्थित इस प्रेत पीपल के नीचे पितरों की आत्मा की शांति के लिए विशेष रूप से पूजा की जाती है। दूर-दराज से आने वाले श्रद्धालु यहां दीप प्रज्वलित करते हैं, जल अर्पित करते हैं और अपने पूर्वजों की स्मृति में प्रार्थना करते हैं। स्थानीय पंडितों के अनुसार इस स्थान पर विधि-विधान से पूजा करने से पितृदोष से मुक्ति मिलती है और परिवार में सुख-समृद्धि बनी रहती है। इतिहासकारों और धार्मिक विद्वानों का भी मानना है कि पिहोवा प्राचीन काल से ही पितृ तर्पण और श्राद्ध कर्म के लिए प्रसिद्ध रहा है।
सरस्वती नदी के तट पर स्थित होने के कारण यहां सदियों से धार्मिक अनुष्ठान और कर्मकांड होते आ रहे हैं। इसी परंपरा के अंतर्गत प्रेत पीपल का वृक्ष भी विशेष महत्व रखता है। विशेषकर अमावस्या, पितृपक्ष और अन्य धार्मिक अवसरों पर यहां विशेष भीड़ देखी जाती है।
वाल्मीकि मंदिर- संत परंपरा और आध्यात्मिक विरासत की भी अमूल्य धरोहर
सरस्वती तीर्थ पर स्थित वाल्मीकि मंदिर न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है बल्कि यह भारतीय संस्कृति, संत परंपरा और आध्यात्मिक विरासत की भी अमूल्य धरोहर है। पवित्र सरस्वती तीर्थ पर बना वाल्मीकि मंदिर श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र है। उनकी ओर से रचित महान ग्रंथ रामायण भारतीय संस्कृति और धर्म का आधार स्तंभ माना जाता है। इसी कारण सरस्वती तट पर स्थित यह मंदिर संत महापुरुषों और श्रद्धालुओं के लिए श्रद्धा का प्रमुख केंद्र बन गया है। हर वर्ष दूर-दराज से श्रद्धालु इस मंदिर में दर्शन करने और आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए पहुंचते हैं। विशेष अवसरों पर यहां धार्मिक कार्यक्रम, भजन-कीर्तन और सामूहिक प्रार्थनाएं भी आयोजित की जाती हैं। स्थानीय लोगों का मानना है कि इस मंदिर में सच्चे मन से की गई प्रार्थना अवश्य फलदायी होती है।

पिहोवा। सरस्वती तीर्थ पर स्थित प्रेत पीपल। संवाद

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