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Panchkula News: पूर्व डीआईजी के परिवार को पेंशन भुगतान में देरी, पंजाब सरकार को 7.5 प्रतिशत ब्याज का आदेश
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चंडीगढ़। पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने पूर्व डीआईजी पुलिस जोगिंदर सिंह आनंद की पत्नी, बेटे को पेंशन लाभों के भुगतान में हुई देरी पर पंजाब सरकार को 7.5 प्रतिशत वार्षिक ब्याज देने का निर्देश दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि यह ब्याज 23 मार्च 2017 में आपराधिक मामले में बरी किए जाने की तारीख से लेकर वास्तविक भुगतान तक देय होगा। डीआईजी जोगिंदर सिंह आनंद का निधन 34 वर्ष पहले हो चुका था। जोगिंदर सिंह आनंद केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी के रिश्तेदार थे।
जस्टिस जगमोहन बंसल ने कहा कि जैसे ही याचिकाकर्ताओं को बरी किया गया, उसी समय से वे पारिवारिक पेंशन और उसके एरियर के हकदार हो गए थे। याचिकाकर्ताओं को सीबीआई ने आरोपी बनाया था और ट्रायल कोर्ट ने दोषी ठहराया था लेकिन हाईकोर्ट ने उन्हें सम्मानपूर्वक बरी कर दिया। राज्य सरकार पर यह बाध्यता थी कि वह तुरंत पेंशन जारी करे। बरी होने के बाद पेंशन रोके रखने का कोई औचित्य नहीं था।
याचिकाकर्ताओं ने पारिवारिक पेंशन, ग्रेच्युटी, लीव एनकैशमेंट और एरियर के साथ 12 प्रतिशत ब्याज की मांग की थी। उनकी ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता गुरमिंदर सिंह ने दलील दी कि केवल इसलिए पेंशनरी लाभ रोके गए क्योंकि वे हत्या के मामले में आरोपी थे, जबकि बाद में उन्हें पूरी तरह से बरी कर दिया गया। मुकदमे के दौरान देय राशि तो जारी कर दी गई लेकिन कोई ब्याज नहीं दिया गया।
हालांकि, हाईकोर्ट ने बरी होने से पहले की अवधि के लिए ब्याज देने से इन्कार कर दिया। अदालत ने कहा कि उस समय देरी का कारण ट्रायल और दोषसिद्धि लंबित होना था। कोर्ट ने कहा कि राज्य कोई निजी संस्था नहीं है। उसे सार्वजनिक कोष से भुगतान करना होता है। व्यक्तिगत हित सार्वजनिक हित पर हावी नहीं हो सकता। मार्च 2017 में आरोपियों को बरी करते हुए हाईकोर्ट ने यह भी कहा था कि सीबीआई मामले की समुचित जांच करने में विफल रही।
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जस्टिस जगमोहन बंसल ने कहा कि जैसे ही याचिकाकर्ताओं को बरी किया गया, उसी समय से वे पारिवारिक पेंशन और उसके एरियर के हकदार हो गए थे। याचिकाकर्ताओं को सीबीआई ने आरोपी बनाया था और ट्रायल कोर्ट ने दोषी ठहराया था लेकिन हाईकोर्ट ने उन्हें सम्मानपूर्वक बरी कर दिया। राज्य सरकार पर यह बाध्यता थी कि वह तुरंत पेंशन जारी करे। बरी होने के बाद पेंशन रोके रखने का कोई औचित्य नहीं था।
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याचिकाकर्ताओं ने पारिवारिक पेंशन, ग्रेच्युटी, लीव एनकैशमेंट और एरियर के साथ 12 प्रतिशत ब्याज की मांग की थी। उनकी ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता गुरमिंदर सिंह ने दलील दी कि केवल इसलिए पेंशनरी लाभ रोके गए क्योंकि वे हत्या के मामले में आरोपी थे, जबकि बाद में उन्हें पूरी तरह से बरी कर दिया गया। मुकदमे के दौरान देय राशि तो जारी कर दी गई लेकिन कोई ब्याज नहीं दिया गया।
हालांकि, हाईकोर्ट ने बरी होने से पहले की अवधि के लिए ब्याज देने से इन्कार कर दिया। अदालत ने कहा कि उस समय देरी का कारण ट्रायल और दोषसिद्धि लंबित होना था। कोर्ट ने कहा कि राज्य कोई निजी संस्था नहीं है। उसे सार्वजनिक कोष से भुगतान करना होता है। व्यक्तिगत हित सार्वजनिक हित पर हावी नहीं हो सकता। मार्च 2017 में आरोपियों को बरी करते हुए हाईकोर्ट ने यह भी कहा था कि सीबीआई मामले की समुचित जांच करने में विफल रही।