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Sirsa News: चक्कां में मनाया गणगौर व्रत उत्सव
संवाद न्यूज एजेंसी, सिरसा
Updated Sat, 21 Mar 2026 11:57 PM IST
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रानियां01 गणगौर की पूजन करती महिलाएं।
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- गांव में 5 परिवारों ने निकाली गणगौर की शोभायात्रा, किया विसर्जन
फोटो- 35
संवाद न्यूज एजेंसी
रानियां। गांव चक्कां में शनिवार को ताराचंद नोखवाल, प्रेमचंद नोखवाल, बिरबल डाल व दो अन्य परिवारों की महिलाओं की ओर से गणगौर व्रत उत्सव विधि-विधान से मनाया गया। गणगौर का व्रत विवाहित महिलाएं अपने अखंड सौभाग्य, पति की दीर्घायु, सुख-समृद्धि और परिवार के कल्याण तथा कुंवारी कन्याएं अच्छे वर प्राप्ति के लिए यह व्रत करती हैं।
शनिवार के दिन विवाहित महिलाओं व कुंवारी कन्याओं ने सुबह नए वस्त्र व आभूषण धारण कर गणगौर (गण अर्थात भगवान शिव और गौर अर्थात माता पार्वती) का विधिवत रूप से पूजन किया। सभी महिलाओं ने कच्ची मिट्टी से भगवान शिव और माता पार्वती की प्रतिमा बनाई। इन्हें कुछ समय के लिए दीवार के साथ स्थापित कर दीवार पर काजल, मेहंदी और रोली के 16-16 तिलक करते हुए विधि-विधान और मंगल गीत के साथ पूजन किया। इसके उपरांत व्रत में शामिल सभी महिलाओं व कन्याओं ने प्रसाद ग्रहण कर व्रत तोड़ा।
संध्या के समय महिलाओं ने गण गौर की प्रतिमा को सिर पर उठाकर मंगल गीत गाते हुए और नृत्य करते हुए शोभायात्रा निकाली और गांव के कुएं के पानी में गणगौर को विसर्जित किया। इस उत्सव में मुख्य रूप से गुड्डी देवी, मंजू, सुमित्रा, मोहरां देवी, सुनीता, सुमन, प्रर्मीला, रोशनी, रुकमा, श्याकोरी, सुमन, बाधो देवी, विनोद कुमार, कविता, संजना व शकुंतला आदि शामिल रहीं।
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इस प्रकार मनाया जाता है गणगौर उत्सव -
हिंदू धर्म व प्राचीन मान्यता अनुसार गणगौर उत्सव चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को मनाया जाता है। इस उत्सव में विवाहित महिलाएं और कुवांरी कन्याएं शामिल रहती है। इस उत्सव में श्रद्धा, सौंदर्य और भक्ति का अद्भुत समन्वय देखने को मिलता है। गणगौर राजस्थान व हरियाणा के ज्यादातर क्षेत्र में बनाए जाने वाला लोक पर्व है। यह पर्व शिव और पार्वती के दिव्य मिलन और उनके आदर्श दांपत्य जीवन का प्रतीक है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार माता पार्वती ने कठोर तपस्या कर भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त किया था। जिसके पक्ष से ही विवाहित महिलाएं अखंड सौभाग्य, पति की दीर्घायु, सुख में दांपत्य जीवन, ऐश्वर्य व प्रतिष्ठा और कुंवारी कन्या अच्छे पर प्राप्ति के यह व्रत रखती है।
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इस प्रकार होता है गणगौर पूजन -
इस दिन प्रात:काल महिलाएं और कन्याएं स्नान कर सुंदर वस्त्र और आभूषण धारण कर शुद्ध जल से भरे लोटे में हरी दूब और पुष्प सजाती हैं और अपने घर शुद्ध मिट्टी से ईसर (शिव) और गौर (पार्वती) की प्रतिमाएं बनाकर पूर्ण विधि विधान पूजन कर स्थापित करती है और दीवार पर रोली, मेहंदी और काजल से सोलह-सोलह बिंदियां लगाती है । जो महिलाओं के सोलह श्रृंगार का प्रतीक मानी जाती हैं। थाली में जल, दूध, दही, हल्दी और कुमकुम मिलाकर ‘सुहाग जल’ तैयार किया जाता है। विवाहित महिलाएं जिसे सबसे पहले गणगौर को अर्पित करती हैं फिर महिलाएं स्वयं पर छिडक़ती हैं। पूजन के उपरांत महिलाएं गणगौर के मंगल गीत गाती हैं और प्रसाद ग्रहण कर व्रत तोड़ती है। शाम के शुभ मुहूर्त में महिलाएं द्वारा गणगौर को सिर पर उठाकर मंगल गीत के साथ गांव के किसी पवित्र कुंए में विसर्जन किया जाता है।
फोटो - रानियां01 गणगौर की पूजन करती महिलाएं।
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फोटो- 35
संवाद न्यूज एजेंसी
रानियां। गांव चक्कां में शनिवार को ताराचंद नोखवाल, प्रेमचंद नोखवाल, बिरबल डाल व दो अन्य परिवारों की महिलाओं की ओर से गणगौर व्रत उत्सव विधि-विधान से मनाया गया। गणगौर का व्रत विवाहित महिलाएं अपने अखंड सौभाग्य, पति की दीर्घायु, सुख-समृद्धि और परिवार के कल्याण तथा कुंवारी कन्याएं अच्छे वर प्राप्ति के लिए यह व्रत करती हैं।
शनिवार के दिन विवाहित महिलाओं व कुंवारी कन्याओं ने सुबह नए वस्त्र व आभूषण धारण कर गणगौर (गण अर्थात भगवान शिव और गौर अर्थात माता पार्वती) का विधिवत रूप से पूजन किया। सभी महिलाओं ने कच्ची मिट्टी से भगवान शिव और माता पार्वती की प्रतिमा बनाई। इन्हें कुछ समय के लिए दीवार के साथ स्थापित कर दीवार पर काजल, मेहंदी और रोली के 16-16 तिलक करते हुए विधि-विधान और मंगल गीत के साथ पूजन किया। इसके उपरांत व्रत में शामिल सभी महिलाओं व कन्याओं ने प्रसाद ग्रहण कर व्रत तोड़ा।
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संध्या के समय महिलाओं ने गण गौर की प्रतिमा को सिर पर उठाकर मंगल गीत गाते हुए और नृत्य करते हुए शोभायात्रा निकाली और गांव के कुएं के पानी में गणगौर को विसर्जित किया। इस उत्सव में मुख्य रूप से गुड्डी देवी, मंजू, सुमित्रा, मोहरां देवी, सुनीता, सुमन, प्रर्मीला, रोशनी, रुकमा, श्याकोरी, सुमन, बाधो देवी, विनोद कुमार, कविता, संजना व शकुंतला आदि शामिल रहीं।
इस प्रकार मनाया जाता है गणगौर उत्सव -
हिंदू धर्म व प्राचीन मान्यता अनुसार गणगौर उत्सव चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को मनाया जाता है। इस उत्सव में विवाहित महिलाएं और कुवांरी कन्याएं शामिल रहती है। इस उत्सव में श्रद्धा, सौंदर्य और भक्ति का अद्भुत समन्वय देखने को मिलता है। गणगौर राजस्थान व हरियाणा के ज्यादातर क्षेत्र में बनाए जाने वाला लोक पर्व है। यह पर्व शिव और पार्वती के दिव्य मिलन और उनके आदर्श दांपत्य जीवन का प्रतीक है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार माता पार्वती ने कठोर तपस्या कर भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त किया था। जिसके पक्ष से ही विवाहित महिलाएं अखंड सौभाग्य, पति की दीर्घायु, सुख में दांपत्य जीवन, ऐश्वर्य व प्रतिष्ठा और कुंवारी कन्या अच्छे पर प्राप्ति के यह व्रत रखती है।
इस प्रकार होता है गणगौर पूजन -
इस दिन प्रात:काल महिलाएं और कन्याएं स्नान कर सुंदर वस्त्र और आभूषण धारण कर शुद्ध जल से भरे लोटे में हरी दूब और पुष्प सजाती हैं और अपने घर शुद्ध मिट्टी से ईसर (शिव) और गौर (पार्वती) की प्रतिमाएं बनाकर पूर्ण विधि विधान पूजन कर स्थापित करती है और दीवार पर रोली, मेहंदी और काजल से सोलह-सोलह बिंदियां लगाती है । जो महिलाओं के सोलह श्रृंगार का प्रतीक मानी जाती हैं। थाली में जल, दूध, दही, हल्दी और कुमकुम मिलाकर ‘सुहाग जल’ तैयार किया जाता है। विवाहित महिलाएं जिसे सबसे पहले गणगौर को अर्पित करती हैं फिर महिलाएं स्वयं पर छिडक़ती हैं। पूजन के उपरांत महिलाएं गणगौर के मंगल गीत गाती हैं और प्रसाद ग्रहण कर व्रत तोड़ती है। शाम के शुभ मुहूर्त में महिलाएं द्वारा गणगौर को सिर पर उठाकर मंगल गीत के साथ गांव के किसी पवित्र कुंए में विसर्जन किया जाता है।
फोटो - रानियां01 गणगौर की पूजन करती महिलाएं।