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Bilaspur News: फेस, आर्म, स्पीच, टाइम तकनीक से बताए चेतावनी संकेत
संवाद न्यूज एजेंसी, बिलासपुर
Updated Sun, 22 Feb 2026 11:52 PM IST
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एम्स बिलासपुर के लोगों को लकवा बीमारी के बारे में जानकारी देते नर्सिंग प्रशिक्षु। स्रोत: एम्स प
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स्ट्रोक के मामलों में शुरुआती गोल्डन आवर बेहद महत्वपूर्ण
एम्स बिलासपुर में स्ट्रोक के लक्षण पहचानने को जागरूक किए लोग
नर्सिंग छात्रों ने तीमारदारों, मरीजों को दिया स्वास्थ्य का संदेश
कॉलेज ऑफ नर्सिंग में आयोजित सत्र में समय पर उपचार पर जोर
संवाद न्यूज एजेंसी
बिलासपुर। स्ट्रोक (लकवा) जैसी गंभीर बीमारी के प्रति लोगों को जागरूक करने के लिए एम्स बिलासपुर के कॉलेज ऑफ नर्सिंग के बीएससी नर्सिंग द्वितीय वर्ष के विद्यार्थियों ने स्वास्थ्य शिक्षा सत्र आयोजित किया। इस दौरान प्रतिभागियों को स्ट्रोक के शुरुआती लक्षणों की पहचान, बचाव के उपायों और समय पर उपचार की अहमियत के बारे में विस्तार से जानकारी दी गई।
सत्र के दौरान नर्सिंग विद्यार्थियों ने बताया कि स्ट्रोक अचानक होने वाली एक गंभीर स्थिति है, जिसमें मस्तिष्क को रक्त आपूर्ति बाधित हो जाती है। यदि समय रहते उपचार न मिले तो मरीज को स्थायी विकलांगता या जान का खतरा भी हो सकता है। विद्यार्थियों ने उपस्थित लोगों को फेस, आर्म, स्पीच, टाइम (फास्ट) तकनीक से चेतावनी संकेतों को पहचानने का तरीका समझाया। इसमें चेहरे का टेढ़ा होना, हाथ में कमजोरी आना और बोलने में कठिनाई जैसे लक्षण दिखाई देने पर तुरंत अस्पताल पहुंचाने की सलाह दी गई।
कार्यक्रम में जीवनशैली से जुड़े जोखिम कारकों पर भी प्रकाश डाला गया। विद्यार्थियों ने बताया कि उच्च रक्तचाप, मधुमेह, मोटापा, धूम्रपान, अत्यधिक शराब सेवन और शारीरिक निष्क्रियता स्ट्रोक के प्रमुख कारणों में शामिल हैं। नियमित व्यायाम, संतुलित आहार, तनाव नियंत्रण और समय-समय पर स्वास्थ्य जांच से इस बीमारी के खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
कार्यक्रम डॉक्टर ज्योति कथवाल और अनुजा शर्मा के नेतृत्व में हुआ। प्राचार्य डॉक्टर मोनालिजा के मार्गदर्शन में विद्यार्थियों ने इसे सफल बनाया। आयोजकों ने बताया कि ऐसे कार्यक्रमों का उद्देश्य समुदाय को जागरूक करने के साथ-साथ नर्सिंग विद्यार्थियों में व्यावहारिक कौशल विकसित करना भी है, ताकि भविष्य में वे बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान कर सकें। स्थानीय लोगों ने भी इस पहल की सराहना की। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि स्ट्रोक के मामलों में शुरुआती गोल्डन आवर बेहद महत्वपूर्ण होता है। यदि मरीज को समय पर उपचार मिल जाए तो जान बचाने के साथ-साथ विकलांगता से भी बचाव संभव है। ऐसे में जागरूकता ही सबसे बड़ा बचाव है।
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एम्स बिलासपुर में स्ट्रोक के लक्षण पहचानने को जागरूक किए लोग
नर्सिंग छात्रों ने तीमारदारों, मरीजों को दिया स्वास्थ्य का संदेश
कॉलेज ऑफ नर्सिंग में आयोजित सत्र में समय पर उपचार पर जोर
संवाद न्यूज एजेंसी
बिलासपुर। स्ट्रोक (लकवा) जैसी गंभीर बीमारी के प्रति लोगों को जागरूक करने के लिए एम्स बिलासपुर के कॉलेज ऑफ नर्सिंग के बीएससी नर्सिंग द्वितीय वर्ष के विद्यार्थियों ने स्वास्थ्य शिक्षा सत्र आयोजित किया। इस दौरान प्रतिभागियों को स्ट्रोक के शुरुआती लक्षणों की पहचान, बचाव के उपायों और समय पर उपचार की अहमियत के बारे में विस्तार से जानकारी दी गई।
सत्र के दौरान नर्सिंग विद्यार्थियों ने बताया कि स्ट्रोक अचानक होने वाली एक गंभीर स्थिति है, जिसमें मस्तिष्क को रक्त आपूर्ति बाधित हो जाती है। यदि समय रहते उपचार न मिले तो मरीज को स्थायी विकलांगता या जान का खतरा भी हो सकता है। विद्यार्थियों ने उपस्थित लोगों को फेस, आर्म, स्पीच, टाइम (फास्ट) तकनीक से चेतावनी संकेतों को पहचानने का तरीका समझाया। इसमें चेहरे का टेढ़ा होना, हाथ में कमजोरी आना और बोलने में कठिनाई जैसे लक्षण दिखाई देने पर तुरंत अस्पताल पहुंचाने की सलाह दी गई।
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कार्यक्रम में जीवनशैली से जुड़े जोखिम कारकों पर भी प्रकाश डाला गया। विद्यार्थियों ने बताया कि उच्च रक्तचाप, मधुमेह, मोटापा, धूम्रपान, अत्यधिक शराब सेवन और शारीरिक निष्क्रियता स्ट्रोक के प्रमुख कारणों में शामिल हैं। नियमित व्यायाम, संतुलित आहार, तनाव नियंत्रण और समय-समय पर स्वास्थ्य जांच से इस बीमारी के खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
कार्यक्रम डॉक्टर ज्योति कथवाल और अनुजा शर्मा के नेतृत्व में हुआ। प्राचार्य डॉक्टर मोनालिजा के मार्गदर्शन में विद्यार्थियों ने इसे सफल बनाया। आयोजकों ने बताया कि ऐसे कार्यक्रमों का उद्देश्य समुदाय को जागरूक करने के साथ-साथ नर्सिंग विद्यार्थियों में व्यावहारिक कौशल विकसित करना भी है, ताकि भविष्य में वे बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान कर सकें। स्थानीय लोगों ने भी इस पहल की सराहना की। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि स्ट्रोक के मामलों में शुरुआती गोल्डन आवर बेहद महत्वपूर्ण होता है। यदि मरीज को समय पर उपचार मिल जाए तो जान बचाने के साथ-साथ विकलांगता से भी बचाव संभव है। ऐसे में जागरूकता ही सबसे बड़ा बचाव है।