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मान्यता : देवी देहरी की पूजा से जुड़ी चर्मकील निवारण की परंपरा

Shimla Bureau शिमला ब्यूरो
Updated Fri, 30 Jan 2026 12:44 AM IST
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Belief: The tradition of removing skin rashes is associated with the worship of Goddess Dehri.
पांगणा क्षेत्र में चर्मकील निवारण के लिए पेड़ लगाई कीलें। स्त्रोत- जागरूक पाठक
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करसोग (मंडी)। पांगणा क्षेत्र में स्थित ग्राम देवी देहरी वाली माता का देवस्थल न केवल श्रद्धा का प्रमुख केंद्र है, बल्कि हिमालयी लोक परंपराओं और जन-विश्वासों का भी सशक्त प्रतीक माना जाता है। यहां प्रचलित चर्मकील निवारण की लोक मान्यता ऐसी सांस्कृतिक परंपरा है, जिसमें आस्था, प्रकृति और अनुभवजन्य ज्ञान का गहरा समन्वय स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।
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शिकारी देवी, शिवा देओरा, फरास, मदन गढ़, झौरगढ़, कमरुदेव और रेश्टाधार की नयनाभिराम पर्वत शृंखलाओं से घिरा पांगणा क्षेत्र प्राचीन काल से ही इतिहास, पर्यटन और लोक संस्कृति का केंद्र रहा है। इसी ऐतिहासिक परिदृश्य में देहरी वाली माता का देवस्थल लोक आस्था का विशेष केंद्र माना जाता है।
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पुरातत्व चेतना संघ मंडी की ओर से दिवंगत चंद्रमणी कश्यप राज्य पुरातत्व चेतना पुरस्कार से सम्मानित डॉ. जगदीश शर्मा के अनुसार मंदिर परिसर में स्थित पश्चिमाभिमुख देवदार के शहतीर से चर्मकील निवारण की एक पुरातन परंपरा जुड़ी हुई है। लोकरीति के अनुसार पीड़ित व्यक्ति मंगलवार, शुक्रवार अथवा रविवार को देवी की विधिवत पूजा-अर्चना कर चर्मकील पर कांटे, सुई या कील के नुकीले सिरे से हल्का सा रक्त निकालता है और उसी कील के साथ एक सिक्का देवदार के शहतीर में गाड़ देता है।
मान्यता है कि यदि यह क्रिया शुद्ध भाव, अडिग विश्वास और पारंपरिक नियमों के अनुरूप की जाए, तो चर्मकील कुछ ही समय में स्वतः सूखकर समाप्त हो जाता है। प्रख्यात साहित्यकार एवं इतिहासकार डॉ. हिमेंद्र बाली का कहना है कि यह परंपरा सामूहिक अनुभव और लोक अनुभव का परिणाम है। संवाद
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