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Sirmour News: पारंपरिक ईंधन की ओर लौट रहे ग्रामीण, फिर जलने लगे चूल्हे
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-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गैस आपूर्ति प्रभावित होने से बढ़ीं मुश्किलें
-उज्ज्वला योजना से गांवों की रसोई व्यवस्था में आया था बड़ा बदलाव
सुंदर चौहान
कफोटा (सिरमौर)। रसोई गैस की किल्लत ने ग्रामीण क्षेत्रों में एक बार फिर पुराने दौर की यादें ताजा कर दी हैं। उज्ज्वला योजना के तहत मुफ्त गैस सिलिंडर मिलने के बाद लकड़ी और गोबर के उपलों से दूरी बना चुकी गांव की महिलाएं अब दोबारा पारंपरिक ईंधन अपनाने को मजबूर हो गई हैं।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गैस आपूर्ति प्रभावित होने से समय पर सिलिंडर नहीं मिल पा रहे हैं। ऐसे में रसोई का कामकाज प्रभावित हो रहा हैं। लोगों को मजबूरी में फिर से लकड़ी के चूल्हों का सहारा लेना पड़ रहा है। गांव में लकड़ी की उपलब्धता होने के कारण लोगों को ईंधन जुटाने में अधिक दिक्कत नहीं हो रही। पशुओं के चारे से बची लकड़ियों को छांटकर उपयोग में लाया जा रहा है, जिससे कई घरों में फिर से लकड़ी के ढेर दिखाई देने लगे हैं।
दरअसल, केंद्र सरकार की उज्ज्वला योजना के तहत मुफ्त गैस कनेक्शन मिलने के बाद गांवों में रसोई व्यवस्था में बड़ा बदलाव आया था। जिन घरों में पहले गैस सिलिंडर का नामोनिशान नहीं था, वहां एक-एक नहीं बल्कि दो-दो सिलिंडर इस्तेमाल होने लगे थे। इससे महिलाओं को धुएं से राहत मिली और उनका जीवन आसान हुआ, लेकिन अब गैस की अनियमित आपूर्ति ने इस व्यवस्था को फिर से पीछे धकेल दिया है।
गांव के रतिराम, सूरत सिंह, अतर सिंह, माया राम और रंगा लाल ने बताया कि कुछ समय पहले तक उन्होंने लकड़ी जलाना पूरी तरह बंद कर दिया था, लेकिन अब हालात ऐसे बन गए हैं कि फिर से उसी पर निर्भर होना पड़ रहा है। ग्रामीणों का कहना है कि ईरान-इजराइल के बीच चल रहे तनाव के चलते अंतरराष्ट्रीय बाजार में गैस आपूर्ति प्रभावित हुई है, जिसका असर देश में भी देखने को मिल रहा है। समय पर सिलिंडर न मिलने के कारण लोग इंडक्शन चूल्हों और पारंपरिक ईंधन दोनों का सहारा ले रहे हैं। संवाद
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-उज्ज्वला योजना से गांवों की रसोई व्यवस्था में आया था बड़ा बदलाव
सुंदर चौहान
कफोटा (सिरमौर)। रसोई गैस की किल्लत ने ग्रामीण क्षेत्रों में एक बार फिर पुराने दौर की यादें ताजा कर दी हैं। उज्ज्वला योजना के तहत मुफ्त गैस सिलिंडर मिलने के बाद लकड़ी और गोबर के उपलों से दूरी बना चुकी गांव की महिलाएं अब दोबारा पारंपरिक ईंधन अपनाने को मजबूर हो गई हैं।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गैस आपूर्ति प्रभावित होने से समय पर सिलिंडर नहीं मिल पा रहे हैं। ऐसे में रसोई का कामकाज प्रभावित हो रहा हैं। लोगों को मजबूरी में फिर से लकड़ी के चूल्हों का सहारा लेना पड़ रहा है। गांव में लकड़ी की उपलब्धता होने के कारण लोगों को ईंधन जुटाने में अधिक दिक्कत नहीं हो रही। पशुओं के चारे से बची लकड़ियों को छांटकर उपयोग में लाया जा रहा है, जिससे कई घरों में फिर से लकड़ी के ढेर दिखाई देने लगे हैं।
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दरअसल, केंद्र सरकार की उज्ज्वला योजना के तहत मुफ्त गैस कनेक्शन मिलने के बाद गांवों में रसोई व्यवस्था में बड़ा बदलाव आया था। जिन घरों में पहले गैस सिलिंडर का नामोनिशान नहीं था, वहां एक-एक नहीं बल्कि दो-दो सिलिंडर इस्तेमाल होने लगे थे। इससे महिलाओं को धुएं से राहत मिली और उनका जीवन आसान हुआ, लेकिन अब गैस की अनियमित आपूर्ति ने इस व्यवस्था को फिर से पीछे धकेल दिया है।
गांव के रतिराम, सूरत सिंह, अतर सिंह, माया राम और रंगा लाल ने बताया कि कुछ समय पहले तक उन्होंने लकड़ी जलाना पूरी तरह बंद कर दिया था, लेकिन अब हालात ऐसे बन गए हैं कि फिर से उसी पर निर्भर होना पड़ रहा है। ग्रामीणों का कहना है कि ईरान-इजराइल के बीच चल रहे तनाव के चलते अंतरराष्ट्रीय बाजार में गैस आपूर्ति प्रभावित हुई है, जिसका असर देश में भी देखने को मिल रहा है। समय पर सिलिंडर न मिलने के कारण लोग इंडक्शन चूल्हों और पारंपरिक ईंधन दोनों का सहारा ले रहे हैं। संवाद