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Sirmour News: शमशेर स्कूल नाहन ने कबाड़ से जुगाड़ कर बचाए लाखों रुपये
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शमशेर स्कूल नाहन में स्क्रैब से तैयार किए नये डेस्कों पर बैठे विद्यार्थी। संवाद
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सचित्र-- (स्पेस न हो तो रोकी जा सकती है..)
पंकज तन्हा
नाहन (सिरमौर)। रियासतकालीन वैभव को समेटे 243 साल पुराने शमशेर राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय (छात्र) नाहन ने सरकारी संपत्ति के सदुपयोग की एक बेमिसाल कहानी गढ़ी है। स्कूल परिसर में 1992 से खुले में सड़ रहे टूटे डेस्क (स्क्रेब) को प्रधानाचार्य राजकुमार चौहान ने कबाड़ से जुगाड़ तकनीक से नया जीवन दिया है। इस पहल से न केवल लाखों रुपये की सरकारी बचत हुई है, बल्कि कड़ाके की ठंड में बच्चों को आरामदेह बैठने की सुविधा भी मिली है।
जानकारी के अनुसार स्कूल परिसर के एक कोने में सालों से कबाड़ के रूप में टूटे-फूटे लोहे और लकड़ी के डेस्क पड़े हुए थे, जो बारिश और धूप में खराब हो रहे थे। प्रधानाचार्य ने इस बेकार पड़े स्क्रेब को पुनर्जीवित करने का निर्णय लिया और कम लागत में शानदार डेस्क तैयार करवाए। इन टूटे गले-सड़े डेस्कों की केवल मरम्मत ही नहीं की गई, बल्कि इन्हें अपग्रेड भी किया गया है। डेस्क की मजबूती के लिए पुराना लोहा इस्तेमाल किया गया, जबकि बच्चों के बैठने और टेबल के ऊपरी हिस्से में लकड़ी की कारीगरी की गई है। इसका मुख्य उद्देश्य यह है कि कड़ाके की ठंड में बच्चों को लोहे पर बैठने से ठंड न लगे और उन्हें आरामदायक माहौल में शिक्षा मिल सके।
यदि शिक्षा विभाग इतने डेस्क नए खरीदता, तो लाखों रुपये खर्च होते, लेकिन स्कूल प्रशासन की सूझबूझ से मात्र 60 हजार रुपये की लागत में 100 डेस्क तैयार हो गए हैं। यह पहल आत्मनिर्भर भारत की दिशा में एक छोटा, लेकिन बेहद असरदार कदम है।
-- -बाक्स
स्कूल परिसर में 1992 से बेकार पड़े लोहे व लकड़ी के कबाड़ का सदुपयोग किया गया है। बच्चों को सर्दियों में ठंड न लगे, इसलिए डेस्क के ऊपर और बैठने की जगह लकड़ी का इस्तेमाल किया है। 100 डेस्क तैयार करने में 60 हजार रुपये की लागत आई है, जिससे लाखों रुपये की सरकारी बचत हुई है।
— राजकुमार चौहान, प्रधानाचार्य, शमशेर स्कूल, नाहन।
-- -- संवाद
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पंकज तन्हा
नाहन (सिरमौर)। रियासतकालीन वैभव को समेटे 243 साल पुराने शमशेर राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय (छात्र) नाहन ने सरकारी संपत्ति के सदुपयोग की एक बेमिसाल कहानी गढ़ी है। स्कूल परिसर में 1992 से खुले में सड़ रहे टूटे डेस्क (स्क्रेब) को प्रधानाचार्य राजकुमार चौहान ने कबाड़ से जुगाड़ तकनीक से नया जीवन दिया है। इस पहल से न केवल लाखों रुपये की सरकारी बचत हुई है, बल्कि कड़ाके की ठंड में बच्चों को आरामदेह बैठने की सुविधा भी मिली है।
जानकारी के अनुसार स्कूल परिसर के एक कोने में सालों से कबाड़ के रूप में टूटे-फूटे लोहे और लकड़ी के डेस्क पड़े हुए थे, जो बारिश और धूप में खराब हो रहे थे। प्रधानाचार्य ने इस बेकार पड़े स्क्रेब को पुनर्जीवित करने का निर्णय लिया और कम लागत में शानदार डेस्क तैयार करवाए। इन टूटे गले-सड़े डेस्कों की केवल मरम्मत ही नहीं की गई, बल्कि इन्हें अपग्रेड भी किया गया है। डेस्क की मजबूती के लिए पुराना लोहा इस्तेमाल किया गया, जबकि बच्चों के बैठने और टेबल के ऊपरी हिस्से में लकड़ी की कारीगरी की गई है। इसका मुख्य उद्देश्य यह है कि कड़ाके की ठंड में बच्चों को लोहे पर बैठने से ठंड न लगे और उन्हें आरामदायक माहौल में शिक्षा मिल सके।
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यदि शिक्षा विभाग इतने डेस्क नए खरीदता, तो लाखों रुपये खर्च होते, लेकिन स्कूल प्रशासन की सूझबूझ से मात्र 60 हजार रुपये की लागत में 100 डेस्क तैयार हो गए हैं। यह पहल आत्मनिर्भर भारत की दिशा में एक छोटा, लेकिन बेहद असरदार कदम है।
स्कूल परिसर में 1992 से बेकार पड़े लोहे व लकड़ी के कबाड़ का सदुपयोग किया गया है। बच्चों को सर्दियों में ठंड न लगे, इसलिए डेस्क के ऊपर और बैठने की जगह लकड़ी का इस्तेमाल किया है। 100 डेस्क तैयार करने में 60 हजार रुपये की लागत आई है, जिससे लाखों रुपये की सरकारी बचत हुई है।
— राजकुमार चौहान, प्रधानाचार्य, शमशेर स्कूल, नाहन।

शमशेर स्कूल नाहन में स्क्रैब से तैयार किए नये डेस्कों पर बैठे विद्यार्थी। संवाद