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Zorawar Tank: चीन के टाइप-15 टैंक से भी 10 टन हल्का है भारत का जोरावर, वजन कम रखने के पीछे ये वजह आई सामने

Harendra Chaudhary हरेंद्र चौधरी
Updated Sat, 19 Oct 2024 08:18 PM IST
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सार

जोरावर के साथ सबसे खास बात यह है कि यह टी-72 या टी-90 जितना भारी नहीं है। चीन के टाइप 15 लाइट टैंक की तुलना में बेहद हल्का है और इसका वजन मात्र 25 टन है। जबकि चीन के टैंक का वजन 35 टन है। सूत्रों ने बताया कि चीनी टैंक के मुकाबले इसका वजन कम रखने के पीछे कई वजह हैं। 

India's Zorawar tank is 10 tonnes lighter than China's Type-15 tank know full details
भारत का जोरावर टैंक - फोटो : ANI
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विस्तार
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हाल ही में भारतीय सेना के लिए बनाए गए लाइट माउंटेन टैंक जोरावर का राजस्थान के रेगिस्तानी इलाके जैसलमेर में फील्ड ट्रायल किया गया था। शुरुआती ऑटोमोटिव ट्रायल्स में जोरावर ने अलग-अलग रेंज के टारगेट्स पर बिल्कुल सटीक निशाने साधे। इसके बाद लद्दाख के माइनस जीरो डिग्री तापमान में भी इसके ट्रायल किए जाएंगे। जोरावर के ट्रायल्स 2026 तक चलेंगे। जिसके बाद उसका प्रोडक्शन शुरू किया जाएगा। जोरावर को डीआरडीओ और एलएंडटी ने ढाई साल की मेहनत के बाद तैयार किया है। जोरावर के साथ सबसे खास बात यह है कि यह टी-72 या टी-90 जितना भारी नहीं है। चीन के टाइप 15 लाइट टैंक की तुलना में बेहद हल्का है और इसका वजन मात्र 25 टन है। जबकि चीन के टैंक का वजन 35 टन है। सूत्रों ने बताया कि चीनी टैंक के मुकाबले इसका वजन कम रखने के पीछे कई वजह हैं। 
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ऑपरेशनल जरूरतों को रखा ध्यान 
भारतीय सेना की प्रोविजनल स्टाफ क्वालिटेटिव रिक्वायरमेंट्स ने चीन के टाइप 15 लाइट टैंक के मुकाबले के लिए हल्के टैंक की मांग की थी। ताकि वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) और अन्य सुपर हाई एल्टीट्यूड इलाकों में इसकी तैनाती की जा सके। वहीं इसका वजन चीनी टैंक के मुताबले जानबूझ कर 25 टन रखा गया। जबकि इस कैटेगरी के टैंकों का वजन 33-36 टन तक होता है। सैन्य सूत्रों ने बताया कि परंपरागत तौर पर टैंक की फायरपावर और आर्मर पर फोकस किया जाता है। लेकिन जोरावर के मामले में ऐसा नहीं था। बल्कि इसमें परंपरागत जरूरतों के साथ ऑपरेशनल आवश्यकताओं को भी ध्यान में रखा गया। जोरावर प्रोजेक्ट से जुड़े भारतीय सेना के एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक, जोरावर को डिजाइन करते वक्त कई चीजों को ध्यान में रखा गया। उन्होंने बताया कि जोरावर को जिन इलाकों में तैनात किया जाना है, वहां के जमीनी हालात और मौसमी परिस्थितियां ही कुछ ऐसी हैं। 
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गलवां संघर्ष से पहले ही चीन ने तैनात कर दिए थे टाइप-15 टैंक
सूत्रों ने बताया कि जोरावर का वजन 25 टन रखने के पीछे यह भी थी कि भारतीय सेना को ऐसा टैंक चाहिए था, जिसकी तैनाती फटाफट की जा सके। खास तौर पर हाई एल्टीट्यूड एरिया। 2020 में भारत-चीन के बीच हुए गलवां संघर्ष के बाद कुछ ऐसे ही हालात थे। उस समय पूर्वी लद्दाख में 90 से ज्यादा टैंकों को तुरतफुरत एलएसी तैनात किया गया था, जिनमें टी-72 टैंक प्रमुख थे। उस समय 6 टी-90 टैंक भी तैनात किए गए थे। बाद में एलएसी पर टी-72 टैंकों की संख्या बढ़ कर 200 तक पहुंच गई थी। वहीं, चीन ने 2020 से पहले ही ZTQ टाइप-15 टैंक एलएसी पर तैनात कर दिए थे। चीन के पास ऐसे 500 टैंक हैं। 

सूत्रों ने बताया कि चूंकि टी-72 (44 टन) और टी-90 टैंक (46 टन) जोरावर के मुकाबले भारी हैं और उस दौरान हाई एल्टीट्यूड इलाकों में इन्हें पहुंचाने में काफी मशक्कत करनी पड़ी थी। वहीं, जोरावर का वजन 25 टन होने से इसे भारतीय वायु सेना के C-130J सुपर हरक्यूलिस और C-17, IL-76 ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट से आसानी से एयरलिफ्ट किया जा सकता है। किसी भी तनावपूर्ण स्थिति में लद्दाख और अरुणाचल प्रदेश जैसे हाई एल्टीट्यूड इलाकों में इसकी तुरंत तैनाती होने से यह युद्ध में गेमचेंजर साबित हो सकता है। 

लॉजिस्टिक सप्लाई पर नहीं पड़ेगा कोई बोझ
सूत्रों के मुताबिक हाई एल्टीट्यूड इलाकों में जहां कई जगहों पर सड़क संपर्क न के बराबर होता है, वहां ऑपरेशनल रेडिनेस में एयरफोर्स की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होती है। आज के हालात को देखते हुए चीनी टाइप-15 टैंकों के भारी होने के चलते डिप्लॉयमेंट में देरी हो सकती है, लेकिन जोरावर की तैनाती में बिल्कुल भी देरी नहीं होगी। सूत्रों के मुताबिक युद्ध में जैसे हालात में जब आज भी एलएसी पर शांति तो लेकिन वह स्थाई नहीं है, ऐसे में उस दौरान आपको टैंकों के अलावा अपने जवानों और बाकी हथियारों का भी डिप्लॉयमेंट करना होता है। जिससे डिप्लॉयमेंट में देरी होने की संभावना बढ़ जाती है। अकेले गलवां संघर्ष के बाद भारतीय वायुसेना के विमानों ने भारतीय सेना के कई डिवीजन को एयरलिफ्ट किया था, जिसमें कुल 68,000 से अधिक सैनिक, 90 से अधिक टैंक, 330 बीएमपी लड़ाकू वाहन, राडार प्रणाली, तोपें और कई अन्य साजो-सामान शामिल थे। उस समय वायुसेना ने ट्रांसपोर्ट जहाजों ने 9,000 टन की ढुलाई की थी। ऐसे में टैंकों की का नंबर कब आएगा, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। इस लिए जोरावर को 25 टन पर रखकर, भारतीय सेना ने सुनिश्चित किया कि ऐसे हालात में लॉजिस्टिक सप्लाई पर बिना कोई बोझ डाले, टैंकों का तेजी से डिप्लॉयमेंट किया जा सके। सूत्रों ने बताया कि भारतीय वायुसेना के सी-17 ग्लोबमास्टर में एक बार में दो जोरावर टैंक ले जाए जा सकते हैं। 

नदी को आराम से पार करेगा जोरावर
सूत्रों ने बताया कि हाई एल्टीट्यूड इलाकों में नदी-नाले भी बड़ी संख्या होते हैं और जहां भी पूर्वी लद्दाख में जहां भी वास्तविक नियंत्रण रेखा है, ऐसे इलाकों से घिरी हुई है। एलएसी तक पहुंचने के लिए सिंधु नदी के पार जाना होता है। इसकी मिसाल तब देखने को मिली थी, जब अमर उजाला एलएसी पर न्योमा पहुंचा था, जहां भारतीय सेना की आर्मर ब्रिगेड तैनात थी। वहां टी-90 और टी-72 ने सिंधु नदी को पार किया था। जोरावर के हल्के वजन के पीछे भी यही वजह है। भारी वजन के चलते इस साल जून में एक एक्सरसाइज के दौरान एक टी-72 टैंक पूर्वी लद्दाख में श्योक नदी में डूब गया था। जिसमें पांच जवानों की मौत हो गई थी। लेकिन एक हल्का टैंक इन अभियानों के लिए कहीं अधिक उपयुक्त है, क्योंकि यह नदी-नालों और दलदली जमीन पर आसानी से चल सकता है। जिसकी वजह से जोरावर को हिमालयी इलाकों के अलावा कच्छ के रण में भी तैनात किया जा सकता है। वहीं चीनी टैंक टाइप-15 में एंफीबियस क्षमता नहीं है और जोरावर में यह खूबी है। 

कम ऑक्सीजन का नहीं पड़ेगा असर
सूत्रों के मुताबिक किसी भी टैंक के डिजाइन में पावर-टू-वेट रेशियो की बेहद अहमियत होती है। हाई एल्टीट्यूड इलाकों में जहां ऑक्सीजन की मात्रा पहले ही कम हो जाती है, ऐसे में टैंकों को भी संघर्ष करना पड़ता है। कम ऑक्सीजन का असर टैंकों के इंजन की परफॉरमेंस पर भी पड़ता है। लेकिन अगर पावर-टू-वेट रेशियो सही होगा तो टैंक के साथ कोई समस्या नहीं होगी। जोरावर के इंजन में पावर-टू-वेट रेशियो का ध्यान रखा गया है। जिससे हाई एल्टीट्यूड इलाकों में इसकी मोबिलिटी और रफ्तार पर कोई असर नहीं पड़ता है। सूत्रों के बताया कि भारी टैंकों के साथ ये समस्या आती है, जैसे ही उन्हें थोड़ा उंचाई पर चढ़ना होता है, तो उनका दम फूल जाता है। इसके लिए उन्हें पीछे से ही रफ्तार पकड़ कर ऊंचाई पर चढ़ाया जाता है। लेकिन हर जगह यह सुविधा नहीं मिल सकती है। जोरावर ऊबड़-खाबड़ रास्तों को आसानी से पार कर सकता है।

जोरावर टैंक में रबर ट्रैक
सूत्रों ने बताया कि पूर्वी लद्दाख के एलएसी से सटे कई इलाकों में रेत औऱ मिट्टी के टीले हैं। जमीन रेतीली है। तो कई जगह बर्फ से लदे हुए हैं। इन जगहों छोटी-छोटी गाड़ियां का फंसना आम है। वहीं टैंकों का वजन ज्यादा होता है और ऐसी जगहों पर उनके फंसने की संभावना बढ़ जाती है। हाई ग्राउंड प्रेशर वाली जगहों पर टैंक फंस सकते हैं, जिससे उनकी रफ्तार कम जाती है। वहीं जोरावर का वजन कम रखने से जमीनी दबाव कम हो जाता है। जिससे यह बर्फ से ढके पहाड़ों और चट्टानी इलाकों, सैंड ड्यूंस, दलदली जगहों पर आसानी से चल सकता है। सूत्रों का कहना है कि जोरावर टैंक में एक खास ट्रैक सिस्टम लगाया गया है। जोरावर टैंक में एडवांस रबर ट्रैक सिस्टम (कम्पोजिट रबर ट्रैक्स) लगाया है। अभी तक टैंकों में स्टील ट्रैक लगाए जाते थे, जो उन्हें न केवल वजनी बनाता है, बल्कि रफ्तार पर भी असर पड़ता था। इससे पहले मेन बैटल टैंक अर्जुन Mk1A भी ट्रायल के तौर पर डिटैचेबल रबर पैड लगाए गए थे। वहीं, लद्दाख में जोरावर टैंक की तैनाती बेहद अहम है, क्योंकि इस इलाके को ठंडे रेगिस्तान के नाम से भी जाना जाता है। वहीं, टैंक में लगाया गया खास रबर ट्रैक सिस्टम इस इलाके की ठंडी कठोर जमीन के लिए विशेष रूप से उपयुक्त है। 

वहीं, टैंक में स्टील ट्रैक की जगह रबर ट्रैक सिस्टम का लगाने से ईंधन खपत कम होगी। रबर ट्रैक से बर्फ, गंदगी या कीचड़ बड़ी आसानी से साफ हो जाती है। जबकि स्टील ट्रैक में उसे साफ करने में दिक्कत होती थी। लद्दाख जैसे चुनौतीपूर्ण इलाकों में यह बड़ी समस्या है। इसके अलावा, रबर ट्रैक सिस्टम स्टील ट्रैक की तुलना में काफी हल्का है। स्टील ट्रैक की बजाय रबर ट्रैक इस्तेमाल करने से वजन लगभग 50 फीसदी तक कम हुआ है। वहीं, वजन में कमी से न केवल टैंक की परफॉरमेंस बढ़ी है, बल्कि इसकी ऑपरेशनल रेंज और ट्रांसपोर्टेशन में भी सुधार हुआ है। 

शोर और वाइब्रेशन में कमी
सूत्रों ने बताया कि रबर ट्रैक का एक बड़ा फायदा यह भी है कि यह स्टील ट्रैक के मुकाबले कम शोर करता है। शोर में लगभग 13 डेसिबल तक की कमी आती है, जिससे मूवमेंट के दौरान दुश्मन को टैंक से होने वाले शोर का पता नहीं चलता। वहीं अंदर बैठा हुए चालक दल के सदस्यों को भी शोर में 6 डेसिबल की कमी आती है, जिससे उन्हें काम करने में आसानी होती और शोर से उत्पन्न होने वाला तनाव कम होता है। इसके अलावा रबर होने से टैंक में वाइब्रेशन भी कम होता है। वाइब्रेशन में 60-70 फीसदी की कमी का मतलब है कि चालक दल बिना थके लंबे समय तक टैंक ऑपरेट कर सकता है। यह एक बड़ा सुधार है, क्योंकि इससे लंबे मिशनों में ऑपरेशन के दौरान चालक दल की सहनशीलता बढ़ती है। 

बनाई जाएंगी छह रेजिमेंट  
शुरुआत में भारतीय सेना को 59 जोरावर टैंक दिए जाएंगे। बाद में 295 अतिरिक्त टैंक खरीदे जाएंगे। जोरावर में 105-मिमी राइफल गन और मल्टी-रेंजिंग सेंसर (MRS) से लैस है। इसमें एक बेल रिमोट वेपन स्टेशन (RWS) और सफरन पासेओ ऑप्टिक्स के साथ-साथ दो एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल (ATGM) भी शामिल हैं। टैंक में एक नई लाइट वेट राइफल (LWR), एक एक्टिव प्रोटेक्शन सिस्टम (APS) और एड-ऑन मॉड्यूलर आर्मर ब्लॉक भी है। इसमें कैमरे भी लगाए गए हैं। जोरावर टैंक को सेना के प्रोजेक्ट जोरावर के तहत डेवलप किया गया है। वहीं, इन्हें चलाने के लिए सिर्फ तीन लोगों की जरूरत होगी। सेना ने चरणों में लगभग 354 हल्के टैंक हासिल करने की योजना बनाई है, जिसके बाद इसकी लगभग छह रेजिमेंट बनाई जाएंगी। 

 
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