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Kathua News: एनडीपीएस के 10 साल पुराने मामले में आरोपी साक्ष्य के अभाव में बरी
Wed, 01 Jul 2026 02:02 AM IST
जम्मू और कश्मीर ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, कठुआ
संवाद न्यूज एजेंसी, कठुआ
Updated Wed, 01 Jul 2026 02:02 AM IST
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अदालत से
कोर्ट ने नशीले पदार्थ की बरामदगी की सुरक्षित अभिरक्षा और कानूनी प्रक्रिया का पालन न करने पर उठाए सवाल
संवाद न्यूज एजेंसी
कठुआ। अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश ने वर्ष 2016 के एक एनडीपीएस मामले में आरोपी को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया है। कोर्ट ने आरोपी को फैसले में कहा कि अभियोजन पक्ष बरामद मादक पदार्थ की सुरक्षित अभिरक्षा, सील की शुचिता और एनडीपीएस अधिनियम की अनिवार्य कानूनी प्रक्रियाओं का पालन साबित करने में पूरी तरह विफल रहा है। इसके बाद कोर्ट ने आरोपी को संदेह का लाभ देते हुए बरी करने का फैसला सुनाया।
मामले की सुनवाई अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश प्रवीन पंडोह की अदालत में की गई। मामला 2 जून 2016 का है। पुलिस टीम ने आरोपी रिंकू कुमार निवासी समराला पठानकोट (पंजाब) को उस समय के वार्ड 14 के बरमोरा इलाके से नशीले कैप्सूल के साथ गिरफ्तार किया था। पुलिस ने दावा था कि आरोपी के कब्जे से कुल 227 नशीले कैप्सूल बरामद किए थे। पुलिस ने आरोपी के खिलाफ एनडीपीएस के तहत मामला दर्ज कर चालान को 30 जून 2016 को कोर्ट में प्रस्तुत किया गया। आरोपी के खिलाफ आरोप 11 जुलाई 2016 को तय किए गए। इसमें आरोपी ने खुद को निर्दोष बताया और मुकदमा चलाए जाने की वकालत की।
कोर्ट ने अभियोजन पक्ष को मामले में गवाहों को पेश करने के निर्देश दिए गए। मामले में कुल 11 गवाहों की गवाही करवाई गई। कोर्ट सुनवाई के दौरान गवाहों के बयानों में कई विरोधाभास सामने आए। हालांकि पुलिसकर्मियों ने बरामदगी की पुष्टि की लेकिन कई ने स्वीकार किया कि तलाशी से पहले आरोपी को मजिस्ट्रेट या गजेटेड अधिकारी की मौजूदगी का विकल्प नहीं दिया गया। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि अभियोजन पक्ष यह साबित नहीं कर पाया कि बरामद कैप्सूलों को जब्त करने के बाद उन्हें सुरक्षित तरीके से रखा गया। मलकाना रजिस्टर में जमा करने का समय दर्ज नहीं था। तारीख में काट-छांट पाई गई और यह भी स्पष्ट नहीं किया गया कि बरामद सामग्री कब एफएसएल भेजी गई। अदालत ने माना कि ऐसी स्थिति में बरामद सामग्री से छेड़छाड़ की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। इसके अलावा कोर्ट ने कहा कि आरोपी की गिरफ्तारी सार्वजनिक मार्ग पर की गई और वहां लोगों की आवाजाही थी, लेकिन पुलिस ने किसी भी स्वतंत्र नागरिक को गवाह नहीं बनाया। अदालत ने कहा कि जांच में कई गंभीर खामियां हैं। इस कारण अभियोजन पक्ष आरोपी का अपराध संदेह से परे साबित करने में असफल रहा। इसके बाद कोर्ट ने आरोपी को संदेह का लाभ देते हुए उसे बरी करने का फैसला सुनाया गया।
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कोर्ट ने नशीले पदार्थ की बरामदगी की सुरक्षित अभिरक्षा और कानूनी प्रक्रिया का पालन न करने पर उठाए सवाल
संवाद न्यूज एजेंसी
कठुआ। अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश ने वर्ष 2016 के एक एनडीपीएस मामले में आरोपी को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया है। कोर्ट ने आरोपी को फैसले में कहा कि अभियोजन पक्ष बरामद मादक पदार्थ की सुरक्षित अभिरक्षा, सील की शुचिता और एनडीपीएस अधिनियम की अनिवार्य कानूनी प्रक्रियाओं का पालन साबित करने में पूरी तरह विफल रहा है। इसके बाद कोर्ट ने आरोपी को संदेह का लाभ देते हुए बरी करने का फैसला सुनाया।
मामले की सुनवाई अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश प्रवीन पंडोह की अदालत में की गई। मामला 2 जून 2016 का है। पुलिस टीम ने आरोपी रिंकू कुमार निवासी समराला पठानकोट (पंजाब) को उस समय के वार्ड 14 के बरमोरा इलाके से नशीले कैप्सूल के साथ गिरफ्तार किया था। पुलिस ने दावा था कि आरोपी के कब्जे से कुल 227 नशीले कैप्सूल बरामद किए थे। पुलिस ने आरोपी के खिलाफ एनडीपीएस के तहत मामला दर्ज कर चालान को 30 जून 2016 को कोर्ट में प्रस्तुत किया गया। आरोपी के खिलाफ आरोप 11 जुलाई 2016 को तय किए गए। इसमें आरोपी ने खुद को निर्दोष बताया और मुकदमा चलाए जाने की वकालत की।
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कोर्ट ने अभियोजन पक्ष को मामले में गवाहों को पेश करने के निर्देश दिए गए। मामले में कुल 11 गवाहों की गवाही करवाई गई। कोर्ट सुनवाई के दौरान गवाहों के बयानों में कई विरोधाभास सामने आए। हालांकि पुलिसकर्मियों ने बरामदगी की पुष्टि की लेकिन कई ने स्वीकार किया कि तलाशी से पहले आरोपी को मजिस्ट्रेट या गजेटेड अधिकारी की मौजूदगी का विकल्प नहीं दिया गया। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि अभियोजन पक्ष यह साबित नहीं कर पाया कि बरामद कैप्सूलों को जब्त करने के बाद उन्हें सुरक्षित तरीके से रखा गया। मलकाना रजिस्टर में जमा करने का समय दर्ज नहीं था। तारीख में काट-छांट पाई गई और यह भी स्पष्ट नहीं किया गया कि बरामद सामग्री कब एफएसएल भेजी गई। अदालत ने माना कि ऐसी स्थिति में बरामद सामग्री से छेड़छाड़ की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। इसके अलावा कोर्ट ने कहा कि आरोपी की गिरफ्तारी सार्वजनिक मार्ग पर की गई और वहां लोगों की आवाजाही थी, लेकिन पुलिस ने किसी भी स्वतंत्र नागरिक को गवाह नहीं बनाया। अदालत ने कहा कि जांच में कई गंभीर खामियां हैं। इस कारण अभियोजन पक्ष आरोपी का अपराध संदेह से परे साबित करने में असफल रहा। इसके बाद कोर्ट ने आरोपी को संदेह का लाभ देते हुए उसे बरी करने का फैसला सुनाया गया।
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