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Srinagar News: सखी के दर पर जलीं मशालें... वली कहो या ऋषि, भरते हैं खाली झोली
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सांस्कृतिक विरासत...श्रीनगर से 75 किमी दूर ऐशमुकाम में सूफी संत सखी जैन उद्दीन वली के गुफा स्थ
- फोटो : संवाद
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- सांप्रदायिक सौहार्द और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है मशाल उत्सव
- सर्दी खत्म होने और बोआई की शुरुआत का संकेत देती है यह परंपरा
अजीम यूसुफ
श्रीनगर। कश्मीर की साझी सांस्कृतिक विरासत और सांप्रदायिक सौहार्द के प्रतीक मशाल उत्सव का आयोजन वीरवार शाम को किया गया। श्रीनगर से 75 किमी दूर ऐशमुकाम में सूफी संत सखी जैन उद्दीन वली के गुफा स्थित आस्ताने (दरगाह) के बाहर सैकड़ों लोग जलती मशाल लेकर जुटे। यह परंपरा सर्दी खत्म होने और बोआई की शुरूआत का संकेत देती है।
मान्यता है कि मुस्लिमों के सखी सूफी संत और कश्मीरी पंडितों के जैन उद्दीन रेशी (ऋषि) मांगने वाले को कभी खाली हाथ नहीं जाने देते। वीरवार को दोपहर से ही जायरीन और श्रद्धालुओं का ऐशमुकाम में पहाड़ी गुफा के बाहर जमा होना शुरू हो गया था। वह शाम के मशाल उत्सव की तैयारियां करते दिखाई दिए। शाम को मगरिब की नमाज के बाद उत्सव शुरू हुआ और लोग जलती मशाल लेकर खुशियां मनाने लगे।
यहां मौजूद ऐशमुकाम के वसी अहमद गनई ने बताया कि सूफी संत सखी जैन-उद्दीन वली जो बाबा जैनुद्दीन रेशी के नाम से भी मशहूर हैं, 15वीं सदी के एक प्रसिद्ध कश्मीरी ऋषि और सूफी संत हैं। इनकी दरगाह ऐशमुकाम में पहाड़ी गुफा में स्थित है। यह शेख नूरुद्दीन के शिष्य हैं जो अपनी सखावत (उदारता) और सांप्रदायिक सद्भाव के लिए पूजनीय हैं। उनकी दरगाह पर प्रतिवर्ष मशाल उत्सव मनाया जाता है।
यहां आए कश्मीरी पंडित रविंदर टिकू ने बताया कि जैन-उद्दीन रेशी कश्मीरी ऋषि सूफी संप्रदाय से संबंधित हैं जो कश्मीरी संस्कृति और इस्लामी रहस्यवाद का एक अनूठा मिश्रण है। यहां प्रतिवर्ष मार्च और अप्रैल के महीने में जिसे स्थानीय भाषा में जैथ महीना कहा जाता है, उनकी बरसी पर एक विशेष मशाल उत्सव मनाया जाता है, जिसे जूल कहते हैं। श्रद्धालु मशालें जलाकर पहाड़ी पर उनकी दरगाह तक जाते हैं, जो लंबी सर्दियों के अंत और बोआई के मौसम की शुरुआत का प्रतीक है।
श्रीनगर के इस्माइल अहमद ने बताया कि यहां दरगाह पर हर धर्म के लोग मन्नत मांगने आते हैं। यहां मन्नत पूरी होने पर धागा बांधने की परंपरा है। यह दरगाह पारंपरिक कश्मीरी लकड़ी की वास्तुकला, पैगोडा शैली की छत और नक्काशीदार लकड़ी के काम के लिए प्रसिद्ध है। इन्हें उदारता के लिए सखी (दाता) कहा जाता है और मान्यता के अनुसार आज भी इनके मानने वाने उनके दर से खाली हाथ नहीं लौटते।
उर्स के प्रबंधकों में से एक ने बताया कि प्रशासन की ओर से श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए सुरक्षा, यातायात, पेयजल, स्वास्थ्य सेवाओं और अन्य जरूरी इंतजामात किए जाते हैं ताकि आने वाले जायरीन को किसी प्रकार की परेशानी का सामना न करना पड़े। जूल उत्सव न सिर्फ एक धार्मिक आयोजन है बल्कि यह कश्मीर की गंगा-जमुनी तहज़ीब, भाईचारे और सांस्कृतिक विरासत का भी प्रतीक है।
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- सर्दी खत्म होने और बोआई की शुरुआत का संकेत देती है यह परंपरा
अजीम यूसुफ
श्रीनगर। कश्मीर की साझी सांस्कृतिक विरासत और सांप्रदायिक सौहार्द के प्रतीक मशाल उत्सव का आयोजन वीरवार शाम को किया गया। श्रीनगर से 75 किमी दूर ऐशमुकाम में सूफी संत सखी जैन उद्दीन वली के गुफा स्थित आस्ताने (दरगाह) के बाहर सैकड़ों लोग जलती मशाल लेकर जुटे। यह परंपरा सर्दी खत्म होने और बोआई की शुरूआत का संकेत देती है।
मान्यता है कि मुस्लिमों के सखी सूफी संत और कश्मीरी पंडितों के जैन उद्दीन रेशी (ऋषि) मांगने वाले को कभी खाली हाथ नहीं जाने देते। वीरवार को दोपहर से ही जायरीन और श्रद्धालुओं का ऐशमुकाम में पहाड़ी गुफा के बाहर जमा होना शुरू हो गया था। वह शाम के मशाल उत्सव की तैयारियां करते दिखाई दिए। शाम को मगरिब की नमाज के बाद उत्सव शुरू हुआ और लोग जलती मशाल लेकर खुशियां मनाने लगे।
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यहां मौजूद ऐशमुकाम के वसी अहमद गनई ने बताया कि सूफी संत सखी जैन-उद्दीन वली जो बाबा जैनुद्दीन रेशी के नाम से भी मशहूर हैं, 15वीं सदी के एक प्रसिद्ध कश्मीरी ऋषि और सूफी संत हैं। इनकी दरगाह ऐशमुकाम में पहाड़ी गुफा में स्थित है। यह शेख नूरुद्दीन के शिष्य हैं जो अपनी सखावत (उदारता) और सांप्रदायिक सद्भाव के लिए पूजनीय हैं। उनकी दरगाह पर प्रतिवर्ष मशाल उत्सव मनाया जाता है।
यहां आए कश्मीरी पंडित रविंदर टिकू ने बताया कि जैन-उद्दीन रेशी कश्मीरी ऋषि सूफी संप्रदाय से संबंधित हैं जो कश्मीरी संस्कृति और इस्लामी रहस्यवाद का एक अनूठा मिश्रण है। यहां प्रतिवर्ष मार्च और अप्रैल के महीने में जिसे स्थानीय भाषा में जैथ महीना कहा जाता है, उनकी बरसी पर एक विशेष मशाल उत्सव मनाया जाता है, जिसे जूल कहते हैं। श्रद्धालु मशालें जलाकर पहाड़ी पर उनकी दरगाह तक जाते हैं, जो लंबी सर्दियों के अंत और बोआई के मौसम की शुरुआत का प्रतीक है।
श्रीनगर के इस्माइल अहमद ने बताया कि यहां दरगाह पर हर धर्म के लोग मन्नत मांगने आते हैं। यहां मन्नत पूरी होने पर धागा बांधने की परंपरा है। यह दरगाह पारंपरिक कश्मीरी लकड़ी की वास्तुकला, पैगोडा शैली की छत और नक्काशीदार लकड़ी के काम के लिए प्रसिद्ध है। इन्हें उदारता के लिए सखी (दाता) कहा जाता है और मान्यता के अनुसार आज भी इनके मानने वाने उनके दर से खाली हाथ नहीं लौटते।
उर्स के प्रबंधकों में से एक ने बताया कि प्रशासन की ओर से श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए सुरक्षा, यातायात, पेयजल, स्वास्थ्य सेवाओं और अन्य जरूरी इंतजामात किए जाते हैं ताकि आने वाले जायरीन को किसी प्रकार की परेशानी का सामना न करना पड़े। जूल उत्सव न सिर्फ एक धार्मिक आयोजन है बल्कि यह कश्मीर की गंगा-जमुनी तहज़ीब, भाईचारे और सांस्कृतिक विरासत का भी प्रतीक है।