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Lucknow News: फेफड़े के कैंसर के 55 फीसदी मरीजों का शरीर ही नहीं, मन भी टूट रहा

Sat, 01 Aug 2026 02:53 AM IST
Lucknow Bureau लखनऊ ब्यूरो
Updated Sat, 01 Aug 2026 02:53 AM IST
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For 55 percent of lung cancer patients, it is not just the body that is breaking down, but the mind as well.
लखनऊ। फेफड़े के कैंसर से जूझ रहे मरीजों का शरीर ही नहीं, बल्कि मन भी टूट रहा है। इस लाइलाज बीमारी से ग्रस्त 55 फीसदी मरीज डिप्रेशन का भी दंश झेल रहे हैं। ये बातें केजीएमयू में हुए अध्ययन में सामने आई हैं। यह अध्ययन जर्नल ऑफ द इंडियन मेडिकल एसोसिएशन में प्रकाशित हुआ है।
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विश्व फेफड़ा कैंसर दिवस के अवसर पर केजीएमयू के रेस्पिरेटरी मेडिसिन विभाग ने यह अध्ययन जारी किया है। अध्ययन में सामने आया कि फेफड़ों के कैंसर के मरीज शारीरिक बीमारी के साथ-साथ मानसिक तनाव, चिंता और अवसाद से भी जूझ रहे हैं। विभाग के प्रमुख डॉ. सूर्यकांत ने बताया अध्ययन में फेफड़ों के कैंसर से पीड़ित 90 मरीजों का मूल्यांकन किया गया। इसके परिणाम चौंकाने वाले रहे।
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55 प्रतिशत मरीजों को चिंता, 26 फीसदी को अवसाद
अध्ययन के अनुसार 55.56 प्रतिशत मरीजों में मध्यम स्तर की चिंता, 26.67 प्रतिशत में मध्यम स्तर का अवसाद, 34.44 प्रतिशत में हल्का अवसाद और 12 प्रतिशत मरीजों में मानसिक तनाव के लक्षण पाए गए। डॉ. सूर्यकांत ने बताया कि अधिक उम्र, धूम्रपान की आदत, कैंसर की बढ़ी हुई स्टेज और बीमारी के गंभीर लक्षण मानसिक समस्याओं का खतरा बढ़ाते हैं।
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देश में हर साल 1 लाख नए मरीज, 85 हजार मौतें
इंडियन सोसाइटी फॉर स्टडी ऑफ लंग कैंसर की राष्ट्रीय कार्यकारणी सदस्य डॉ. सूर्यकांत ने बताया कि देश में प्रतिवर्ष फेफड़े के कैंसर के लगभग एक लाख रोगी चिह्नित किए जाते हैं। सबसे दुखद बात यह है कि हर साल 85 हजार रोगियों की मौत हो जाती है। धूम्रपान, लकड़ी के चूल्हे का धुआं, फैक्टरी का धुआं और वायु प्रदूषण इसके प्रमुख कारण हैं। इस वर्ष की थीम ''''फेफड़ों के कैंसर का सामना साथ मिलकर'''' रखी गई है।
मानसिक स्वास्थ्य की अनदेखी न हो
रेस्पिरेटरी मेडिसिन विभाग की एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. ज्योति बाजपेयी ने कहा कि इलाज में आमतौर पर सर्जरी, कीमोथेरेपी, टार्गेटेड थेरेपी और इम्यूनोथेरेपी पर ध्यान दिया जाता है, लेकिन मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य की अनदेखी हो जाती है। समय रहते अवसाद और चिंता की पहचान कर उपचार किया जाए तो मरीज का जीवन स्तर बेहतर होता है।
बीड़ी-सिगरेट पीने वालों तक ही सीमित नहीं कैंसर
लोहिया संस्थान के रेस्पिरेटरी मेडिसिन विभाग के अध्यक्ष डॉ. अजय वर्मा ने बताया कि फेफड़ों का कैंसर केवल बीड़ी-सिगरेट पीने वालों तक सीमित नहीं रह गया है। शहरों में बढ़ते वायु प्रदूषण के कारण धूम्रपान न करने वाले लोगों में भी फेफड़ों के कैंसर के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। बीड़ी और सिगरेट के धुएं में 70 से अधिक ऐसे रसायन पाए जाते हैं, जो कैंसर पैदा कर सकते हैं, लेकिन अब प्रदूषण भी उतना ही गंभीर खतरा बनकर उभरा है।

डीएनए में बदलाव भी मुमकिन
केजीएमयू रेस्पिरेटरी मेडिसिन विभाग के डॉ. संतोष कुमार ने बताया कि हवा में मौजूद छाेटे धूल कण सांस के जरिये फेफड़ों तक पहुंच जाते हैं। नाइट्रोजन डाइऑक्साइड, सल्फर डाइऑक्साइड, ओजोन, कार्बन मोनोऑक्साइड, बेंजीन, फॉर्मल्डिहाइड, पॉलीसाइक्लिक एरोमैटिक हाइड्रोकार्बन व भारी धातुएं जैसे आर्सेनिक, कैडमियम और निकल भी शरीर में प्रवेश कर कोशिकाओं को नुकसान पहुंचाते हैं। लंबे समय तक इनके संपर्क में रहने से डीएनए में बदलाव हो सकते हैं। जिससे कैंसर की आशंका बढ़ जाती है।
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