टल सकता है इंसान का बुढ़ापा : उम्र की रफ्तार थामने की दहलीज पर विज्ञान, अगले 10 साल बेहद अहम
एआई, कोशिका री-प्रोग्रामिंग और जीन थेरेपी के मेल से ये करिश्मा संभव हो सकेगा। वैज्ञानिकों का मानना है कि बुढ़ापा केवल नियति नहीं, बल्कि ऐसी जैविक प्रक्रिया है, जिस पर भविष्य में चिकित्सकीय हस्तक्षेप संभव हो सकता है।
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क्या इंसान बुढ़ापा टाल सकता है? क्या बढ़ती उम्र की रफ्तार धीमी की जा सकती है? कभी विज्ञान-कथा माने जाने वाले इन सवालों पर अब दुनिया की प्रमुख प्रयोगशालाओं में गंभीर शोध चल रहे हैं। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई), जीन थेरेपी और सेलुलर री-प्रोग्रामिंग जैसी तकनीकों ने एंटी-एजिंग रिसर्च को नई दिशा दी है।
शुरुआती अध्ययनों में उम्र बढ़ने के संकेत कम करने और चूहों में अल्जाइमर जैसे रोगों के लक्षण घटाने के उत्साहजनक परिणाम भी मिले हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि बुढ़ापा केवल नियति नहीं, बल्कि ऐसी जैविक प्रक्रिया है, जिस पर भविष्य में चिकित्सकीय हस्तक्षेप संभव हो सकता है।
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राजधानी आई इंदौर के देवी अहिल्याबाई विश्वविद्यालय की वरिष्ठ माइक्रोबायोलॉजिस्ट डॉ. नंदिनी फड़से ने अमर उजाला से बातचीत में बताया कि दुनिया भर में उम्र बढ़ने की गति कम करने पर तेजी से शोध हो रहे हैं। यामानाका फैक्टर्स पर आधारित आंशिक सेलुलर री-प्रोग्रामिंग और जीन थेरेपी जैसी तकनीकें अगले 10 से 20 वर्षों में ऐसी चिकित्सा का रास्ता खोल सकती हैं, जो बढ़ती उम्र के असर को कम करने के साथ अल्जाइमर, हृदय रोग और कैंसर जैसी उम्र-संबंधी बीमारियों को लंबे समय तक टालने में मददगार साबित हो।
उन्होंने बताया कि इस समय 'लॉन्गेविटी एस्केप वेलोसिटी' की अवधारणा सबसे अधिक चर्चा में है। इसका अर्थ है कि यदि कोई व्यक्ति अगले 10 वर्षों तक स्वयं को स्वस्थ बनाए रख सके, तो तब तक विकसित होने वाली नई तकनीकें उसे और अधिक स्वस्थ तथा लंबा जीवन दे सकती हैं।
अमेरिका में मानव परीक्षण पर अरबों डॉलर का निवेश
उप्र विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. सुमित श्रीवास्तव ने बताया कि इस क्षेत्र में दुनिया की बड़ी टेक कंपनियां और फार्मा उद्योग अरबों डॉलर का निवेश कर रहे हैं। जेफ बेजोस की एल्टोस लैब्स और सैम ऑल्टमैन की रेट्रो बायोसाइंसेज उम्र बढ़ने की प्रक्रिया को धीमा करने वाली तकनीकों पर काम कर रही हैं। जनवरी 2026 में अमेरिकी नियामक एफडीए ने एपिजेनेटिक री-प्रोग्रामिंग आधारित पहले मानव परीक्षण को मंजूरी देकर इस शोध को नई गति दी है।
चीन में शुरुआती नतीजे उत्साहजनक
हाल में चीन के शोधकर्ताओं ने ट्रायल के दौरान जीन थेरेपी की मदद से कुछ स्वयंसेवकों में उम्र बढ़ने से जुड़े जैविक संकेतकों (बायोमार्कर्स) में कमी आने का दावा किया है। यह तकनीक भी यामानाका फैक्टर्स पर आधारित आंशिक सेलुलर री-प्रोग्रामिंग की अवधारणा से जुड़ी मानी जाती है। इसे पुराने कंप्यूटर को बिना डेटा मिटाए रीस्टार्ट करने जैसा समझा जा सकता है।
भारतीयों के जीन में है लंबी उम्र की क्षमता, तीन खोजों से बढ़ी उम्मीद
लखनऊ स्थित सेंटर फॉर बायोमेडिकल रिसर्च (सीबीएमआर) के पूर्व निदेशक और वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. आलोक धवन के अनुसार, भारतीयों में लंबी उम्र की आनुवंशिक क्षमता मौजूद है। पुरातन भारतीयों में सौ वर्ष से ज्यादा लंबी उम्र आम बात थी। उन्होंने बताया कि एंटी-एजिंग रिसर्च में तीन खोजें सबसे महत्वपूर्ण मानी जा रही हैं...
सेलुलर री-प्रोग्रामिंग (यामानाका फैक्टर्स): जापानी वैज्ञानिक डॉ. शिन्या यामानाका ने वयस्क कोशिकाओं को फिर से युवा जैसी अवस्था में लाने की तकनीक विकसित की, जिसके लिए उन्हें नोबेल पुरस्कार मिला। आज यही तकनीक एंटी-एजिंग रिसर्च की सबसे बड़ी उम्मीद मानी जा रही है।
सेनेसेंट (जॉम्बी) कोशिकाएं: उम्र बढ़ने के साथ शरीर में निष्क्रिय, लेकिन जीवित कोशिकाएं जमा होती जाती हैं। ये सूजन, ऊतकों की क्षति और उम्र संबंधी कई बीमारियों की वजह बनती हैं। इन्हें समाप्त करने के लिए सेनोलिटिक्स दवाओं पर शोध चल रहा है। हाल ही में वैज्ञानिकों ने इन कोशिकाओं का पहला विस्तृत शारीरिक मानचित्र भी तैयार किया है।
टेलोमीयर और टेलोमेरेज: गुणसूत्रों के सिरों पर मौजूद टेलोमीयर उम्र बढ़ने के साथ छोटे होते जाते हैं। इस क्षेत्र में महत्वपूर्ण खोज के लिए एलिजाबेथ ब्लैकबर्न और उनके सहयोगियों को 2009 का नोबेल पुरस्कार मिला था।