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Lucknow News: रिश्वतखोरी में फंसे जेई व कर्मी की आय से अधिक संपत्ति की जांच
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लखनऊ। रिश्वतखोरी में फंसे लखनऊ विकास प्राधिकरण (एलडीए) के अवर अभियंता और सुपरवाइजर के खिलाफ अब आय से अधिक संपत्ति की जांच शुरू हुई है। शुरुआती जांच में कई अहम साक्ष्य भी मिले हैं। विजिलेंस अब इन सुबूतों की तस्दीक करेगी। वह आरोपियों के बैंक खातों की डिटेल मांगने के साथ ही उनकी संपत्तियों की भी जानकारी जुटा रही है। आने वाले समय में दोनों पर और शिकंजा कसेगा।
विजिलेंस ने शनिवार को एलडीए के अवर अभियंता दिनेश कुमार वर्मा, सुपरवाइजर चंद्र प्रकाश और निजी व्यक्ति श्रवण कुमार को रिश्वत लेते गिरफ्तार किया था। आरोपियों ने निर्माणाधीन भवन के खिलाफ कार्रवाई न करने के एवज में 15 लाख रुपये मांगे थे। जाल बिछाकर विजिलेंस ने 7.50 लाख रुपये रिश्वत लेते रंगे हाथ गिरफ्तार किया था। सूत्रों के मुताबिक, विजिलेंस की जांच में ही सामने आया था कि आरोपी रिश्वतखोरी का ये खेल लंबे समय से खेल रहा था। इन सभी ने लाखों-करोड़ों का खेल किया है। इसलिए पूरे नेटवर्क का भी पता किया जा रहा है। फिलहाल आय से अधिक संपत्ति होने की भी जानकारी मिली है, इसलिए गहनता से जांच शुरू की गई है।
इस तरह से बने हैं कई गिरोह
सूत्रों के मुताबिक, पूछताछ में आरोपियों ने वसूली का पूरा खेल कबूला है। कुछ और लोगों के नाम भी बताए हैं, जो इस तरह के गिरोह चलाते हैं। मतलब, इस तरह के कई अलग-अलग गिरोह बने हैं, जिसमें कुछ अधिकारी, कर्मचारी और बिचौलिए शामिल हैं। पहले शिकायत की जाती है और फिर वसूली के लिए दबाव बनाया जाता है। अधिकतर लोग रकम देने पर मजबूर हो जाते हैं।
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नहीं दी रिश्वत तो निर्माण पर लगी रोक
सूत्रों के मुताबिक, विजिलेंस की जांच में एक और अहम तथ्य सामने आया है। दरअसल, जो लोग रिश्वत नहीं देते थे, उन मामलों में निर्माण कार्य पर रोक लगा दी जाती थी। तमाम तरह की जांच-पड़ताल शुरू हो जाती थी। कुछ ऐसे मामले सामने भी आए हैं। हालांकि, जब विभाग प्रकरण की विभागीय जांच करेगा, तब इसकी तस्दीक हो सकेगी। इसलिए इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हो सकी है।
जेल भेजे गए आरोपी
विजिलेंस ने आरोपियों से लंबी पूछताछ की है। तमाम अहम सुबूत जुटाने के बाद रविवार को आरोपियों को कोर्ट में पेश किया। जहां से सभी आरोपी जेल भेज दिए गए।
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विजिलेंस ने शनिवार को एलडीए के अवर अभियंता दिनेश कुमार वर्मा, सुपरवाइजर चंद्र प्रकाश और निजी व्यक्ति श्रवण कुमार को रिश्वत लेते गिरफ्तार किया था। आरोपियों ने निर्माणाधीन भवन के खिलाफ कार्रवाई न करने के एवज में 15 लाख रुपये मांगे थे। जाल बिछाकर विजिलेंस ने 7.50 लाख रुपये रिश्वत लेते रंगे हाथ गिरफ्तार किया था। सूत्रों के मुताबिक, विजिलेंस की जांच में ही सामने आया था कि आरोपी रिश्वतखोरी का ये खेल लंबे समय से खेल रहा था। इन सभी ने लाखों-करोड़ों का खेल किया है। इसलिए पूरे नेटवर्क का भी पता किया जा रहा है। फिलहाल आय से अधिक संपत्ति होने की भी जानकारी मिली है, इसलिए गहनता से जांच शुरू की गई है।
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इस तरह से बने हैं कई गिरोह
सूत्रों के मुताबिक, पूछताछ में आरोपियों ने वसूली का पूरा खेल कबूला है। कुछ और लोगों के नाम भी बताए हैं, जो इस तरह के गिरोह चलाते हैं। मतलब, इस तरह के कई अलग-अलग गिरोह बने हैं, जिसमें कुछ अधिकारी, कर्मचारी और बिचौलिए शामिल हैं। पहले शिकायत की जाती है और फिर वसूली के लिए दबाव बनाया जाता है। अधिकतर लोग रकम देने पर मजबूर हो जाते हैं।
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नहीं दी रिश्वत तो निर्माण पर लगी रोक
सूत्रों के मुताबिक, विजिलेंस की जांच में एक और अहम तथ्य सामने आया है। दरअसल, जो लोग रिश्वत नहीं देते थे, उन मामलों में निर्माण कार्य पर रोक लगा दी जाती थी। तमाम तरह की जांच-पड़ताल शुरू हो जाती थी। कुछ ऐसे मामले सामने भी आए हैं। हालांकि, जब विभाग प्रकरण की विभागीय जांच करेगा, तब इसकी तस्दीक हो सकेगी। इसलिए इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हो सकी है।
जेल भेजे गए आरोपी
विजिलेंस ने आरोपियों से लंबी पूछताछ की है। तमाम अहम सुबूत जुटाने के बाद रविवार को आरोपियों को कोर्ट में पेश किया। जहां से सभी आरोपी जेल भेज दिए गए।