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UP: 'आपराधिक मामला ट्रांसफर नहीं कर सकते CJM...', हाईकोर्ट ने एक आदेश किया रद्द; 3.20 करोड़ के गबन का मामला

अमर उजाला ब्यूरो, लखनऊ Published by: भूपेन्द्र सिंह Updated Sun, 08 Feb 2026 10:59 PM IST
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सार

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने एक ट्रांसफर आदेश को रद्द करते हुए कहा कि सीजेएम आपराधिक मामले को ट्रांसफर नहीं कर सकते हैं। इसके पीछे अपना तर्क भी रखा। आगे पढ़ें पूरी खबर...

Lucknow bench of High Court while quashing transfer order said CJM cannot transfer criminal case
लखनऊ हाईकोर्ट।
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विस्तार

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (सीजेएम) को किसी आपराधिक मामले को एक अदालत से दूसरी अदालत में स्थानांतरित करने का अधिकार नहीं है। न्यायमूर्ति तेज प्रताप तिवारी की एकल पीठ ने कहा कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) और दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) के तहत यह अधिकार केवल सत्र न्यायाधीश, हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट को ही प्राप्त है। इसलिए लखनऊ के सीजेएम द्वारा पारित ट्रांसफर आदेश को अदालत ने अवैध मानते हुए रद्द कर दिया।

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यह मामला करीब 3.20 करोड़ रुपये के सोने के गहनों के गबन से जुड़ा है। आरोपियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज हुई थी और फरवरी 2022 में निचली अदालत ने मुकदमे की सुनवाई शुरू की। आरोपियों ने पहले सत्र न्यायाधीश से केस ट्रांसफर की मांग की थी, जिसे खारिज कर दिया गया। इसके बाद उन्होंने सीजेएम के पास आवेदन दिया, जिस पर मामला दूसरी अदालत में भेज दिया गया था।

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हाईकोर्ट ने कहा कि सीजेएम ने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर यह आदेश दिया, इसलिए इसे रद्द किया जाता है।

नितेश रस्तोगी ने बीएनएसएस की धारा 528 के तहत याचिका दायर कर लखनऊ के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा 10 अक्टूबर, 2025 को पारित आदेश को चुनौती दी थी। इस आदेश के द्वारा आपराधिक मामला ( राज्य बनाम बिजेंद्र पाल सिंह और अन्य ) का मुकदमा न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम एटीएस), लखनऊ की अदालत से अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम, लखनऊ की अदालत में स्थानांतरित कर दिया गया था।

यह मामला लगभग 3.20 करोड़ रुपये के सोने के आभूषणों के कथित गबन के आरोप में बिजेंद्र पाल सिंह और राजीव सिंह के खिलाफ दर्ज एफआईआर से शुरू हुआ। जांच के बाद, आरोप पत्र दाखिल किया गया और निचली अदालत ने फरवरी 2022 में संज्ञान लिया।

मुकदमे की सुनवाई के दौरान, आरोपियों ने लखनऊ के सत्र न्यायाधीश के समक्ष मामले को स्थानांतरित करने के लिए एक आवेदन दिया, जिसे अस्वीकार कर दिया गया। इसके बाद, उन्होंने लखनऊ के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष एक और स्थानांतरण आवेदन दायर किया। न्यायिक मजिस्ट्रेट से प्राप्त रिपोर्ट के आधार पर, मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने प्रश्नगत आदेश पारित करते हुए मामले को स्थानांतरित कर दिया।

याचिकाकर्ता के वकील अमित जायसवाल ने तर्क दिया कि दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 408 के तहत तबादलों का अधिकार केवल सत्र न्यायाधीश को ही प्राप्त है। उन्होंने कहा कि सी जे एम को ऐसा कोई समकक्ष अधिकार प्राप्त नहीं है। उधर, सरकारी वकील ने कहा कि सी जे एम को दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 15 के तहत अधीनस्थ मजिस्ट्रेटों के बीच कार्य वितरण का प्रशासनिक और पर्यवेक्षी अधिकार प्राप्त है। 

तर्क दिया कि मामलों को वापस लेने और पुनः सौंपने की शक्ति इसी नियंत्रण से प्राप्त होती है।हाईकोर्ट ने माना कि लखनऊ के मुख्य न्यायिक न्यायाधीश ने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर कार्य किया। कोर्ट ने 10 अक्टूबर, 2025 के आदेश को रद्द करते हुए याचिका को स्वीकार कर लिया।
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