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Lucknow News: डॉक्टरों के कमीशन और कंपनियों के खेल से मरीज बेहाल, जेब पर पड़ रहा बोझ

Sat, 24 Oct 2026 01:38 AM IST
Lucknow Bureau लखनऊ ब्यूरो
Updated Sat, 24 Oct 2026 01:38 AM IST
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Patients are suffering due to doctors' commissions and the machinations of companies, placing a heavy financial burden on them.
प्रतीकात्मक।
लखनऊ। खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन (एफएसडीए) विभाग दवाओं की ऊंची कीमतों पर नियंत्रण का प्रयास कर रहा है, लेकिन महंगी मोनोपोली दवाओं के सिंडिकेट पर लगाम लगाने में नाकाम नजर आ रहा है। आरोप है कि कुछ सरकारी व निजी चिकित्सक और निजी फार्मा कंपनियां मिलकर मरीजों को महंगी दवाएं लिखने का नेटवर्क चला रहे हैं। इससे मरीजों को सस्ती दवाओं के विकल्पों के बजाय अधिक कीमत चुकानी पड़ रही है। विभाग के पास शिकायतें होने के बावजूद कार्रवाई नहीं होने से उसकी कार्यप्रणाली पर सवाल उठ रहे हैं।
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राजधानी में करीब एक हजार नर्सिंग होम और 250 से अधिक निजी प्रैक्टिस करने वाले चिकित्सक हैं। आरोप है कि इनमें से कुछ के यहां मोनोपोली दवाओं का कारोबार चल रहा है। इस तरह की दवाओं का इस्तेमाल निजी प्रैक्टिस करने वाले कुछ चिकित्सकों के यहां अधिक है, जो कमीशन के लालच में मरीजों को जेनेरिक या प्रचलित ब्रांडेड दवाओं के बजाय महंगी दवाएं लिखते हैं। ये दवाएं चुनिंदा मेडिकल स्टोर पर ही मिलती हैं, जिससे दूसरे स्टोर पर पहुंचने वाले मरीज परेशान होते हैं।
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ये हैं जेनेरिक दवाएं?
जेनेरिक दवाएं समान सक्रिय औषधीय घटक (साल्ट) के आधार पर उपलब्ध विकल्प होती हैं। कई मामलों में इनकी कीमत महंगे ब्रांडेड उत्पादों से काफी कम होती है। उदाहरण के तौर पर, यदि किसी दवा के पांच दिन के इलाज पर एक हजार रुपये खर्च होते हैं, तो उसकी जेनेरिक दवा जनऔषधि केंद्रों पर 100 से 125 रुपये में मिलने का दावा किया जाता है।
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ये हैं मोनोपोली दवाएं
मोनोपोली दवाएं वह हैं, जो कुछ चिकित्सक और निजी फार्मा कंपनियां बड़ी कंपनियों की दवाओं के विकल्प के तौर पर तैयार कराती हैं और इन्हें चुनिंदा मेडिकल स्टोर के जरिये बिकवाती हैं। इनकी कीमत सस्ते विकल्पों से कई गुना अधिक बताई जाती है। यदि जेनेरिक दवा 100 रुपये की है, तो कथित तौर पर इसी साल्ट वाली दूसरी दवा की कीमत एक हजार से डेढ़ हजार रुपये तक हो सकती है।

आठ रुपये की दवा, 70-80 रुपये में बिक्री का दावा
मानसिक बीमारी के उपचार में इस्तेमाल होने वाली स्टेलोपॉम दवा का उदाहरण भी सामने आया है। दावा है कि इसका जेनेरिक विकल्प आठ रुपये में मिलता है, जबकि दूसरे मेडिकल स्टोर पर इसी साल्ट वाली दवा का एक पत्ता 70 से 80 रुपये में बेचा जा रहा है।
Iविभाग ने उच्च दर पर बेची जा रही दवाओं का मामला केंद्र को भेजा है। इस पर दवाओं का मूल्य तय होने के बाद मोनोपोली दवाओं के सिंडिकेट को तोड़ा जाएगा।
- ब्रजेश, सहायक मंडल आयुक्त, एफएसडीएI
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