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सुना है क्या: साहब पर माफिया का आशीर्वाद की कहानी, साथ ही ज्ञानी नियरे राखिए व कुर्सी डगमगाने की आहट के किस्से

अमर उजाला ब्यूरो, लखनऊ Published by: Bhupendra Singh Updated Fri, 27 Mar 2026 03:21 PM IST
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सार

यूपी के राजनीतिक गलियारे और प्रशासन में तमाम ऐसे किस्से हैं, जो हैं तो उनके अंदरखाने के... लेकिन, चाहे-अनचाहे बाहर आ ही जाते हैं। ऐसे किस्सों को आप अमर उजाला के "सुना है क्या" सीरीज में पढ़ सकते हैं। तो आइए पढ़ते हैं इस बार क्या है खास...

Sahib enjoying Mafia blessings along with anecdotes on wisdom of keeping wise counsel close
सुना है क्या/suna hai kya - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

यूपी के राजनीतिक गलियारे और प्रशासनिक गलियों में आज तीन किस्से काफी चर्चा में रहे। चाहे-अनचाहे आखिर ये बाहर आ ही जाते हैं। इन्हें रोकने की हर कोशिश नाकाम होती है। आज की कड़ी में 'माफिया का आशीर्वाद साहबों पर' की कहानी। इसके अलावा 'ज्ञानी नीरे राखिए, निवेश बढ़ता जाए...' और 'कुर्सी के डगमगाने की आहट' के किस्से भी चर्चा में रहे। आगे पढ़ें, नई कानाफूसी...

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माफिया का आशीर्वाद साहबों पर

एक ऐसा प्रधान है, जिस पर पहले अफसरों ने कृपा बरसाई। फिर उसकी कृपा अफसरों पर बरसी। बड़े-बड़े धन्नासेठों से लेकर साहबों को जेब में रखने वाले इस माफिया का जलवा इस कदर है कि इसके नाम की गाड़ियां बेधड़क सड़कों पर दौड़ती हैं। 

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प्रदेश के बड़े-बड़े ब्रांड के मालिकों से सीधे ठेका लेने वाले इस माफिया पर पहले एक मंत्री की छत्रछाया थी, फिर विभाग के ही दो वरिष्ठ अफसरों ने अपना हाथ रख करोड़ों के वारे न्यारे किए। बताते हैं कि माया के मोह में पराये भी माफिया के चरणों की धूल सिर पर लगाते थे।

ज्ञानी नियरे राखिए, निवेश बढ़ता जाए...

एमओयू के खेल भी निराले होते हैं। खुद को अरबपति दिखाने की हसरत एक बार स्टेट गेस्ट बनने का सुख पाकर ही पूरी हो जाती है। कौड़ियों की हैसियत वाले तिकड़मबाज आईएएस अफसरों को चकमा देकर यह आनंद उठा ही लेते हैं। अब कौन समझाए कि इनकी नब्ज तो पेशेवर ही भांप सकते हैं। 


नियम बनाने वाले भला कंपनियों के मायाजाल और मनी ट्रेल की तिकड़मों को कहां जांच पाएंगे। यदि इस काम के लिए कुछ धुरंधर आईआरएस अफसर भी केंद्र से मांग लिए जाएं तो दुनिया भर में फजीहत झेलने की जगह निवेश की इमारत मजबूत होगी। एक अनुभवी ब्यूरोक्रेट ने इसे यूं समझाया कि, 'ज्ञानी नीरे राखिए, निवेश बढ़ता जाए...

कुर्सी के डगमगाने की आहट

प्रदेश के एक कमिश्नरेट के मुखिया काफी बेचैन और परेशान है क्योंकि उनकी कुर्सी के डगमगाने की आहट उनको हो गई है। चर्चा है वहां जो पहले साहब तैनात थे, वह अभी भी हस्तक्षेप कर रहे हैं लेकिन वर्तमान वाले उनकी सुन नहीं रहे। इसलिए पुराने वाले इनकी कुर्सी हिलाने में जुटे हैं। 

उनका कमिश्नरेट से मोह कम नहीं हो रहा और गाहे-बेगाहे अपनी पुरानी रियासत का मौका-मुआयना करने चले आते हैं। चूंकि दिल्ली में बैठे पुराने साहब का मामला काफी मजबूत है, इसलिए वर्तमान की घबराहट बढ़ती जा रही है। देखना होगा कुर्सी बचेगी या नहीं।

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