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सुंदर कीट के गायब होने की कहानी: बुझ जाएंगे 'जुगनू' तो क्या होगा? वैज्ञानिकों की बड़ी चेतावनी; पढ़ें रिपोर्ट

घनश्याम सिंह, अमर उजाला, लखनऊ Published by: Akash Dwivedi Updated Fri, 05 Jun 2026 01:12 PM IST
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सार

जुगनुओं की घटती संख्या पर्यावरणीय संकट का गंभीर संकेत मानी जा रही है। आर्द्र भूमि के विनाश, प्रकाश प्रदूषण और कीटनाशकों के बढ़ते उपयोग से उनका अस्तित्व खतरे में है। विशेषज्ञों के अनुसार जुगनुओं के लुप्त होने से जैव विविधता, खाद्य श्रृंखला, प्राकृतिक कीट नियंत्रण और वैज्ञानिक अनुसंधान पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।

story of the beautiful insect's disappearance: What happens if the 'fireflies' vanish? Scientists issue a
जुगनू - फाइल फोटो। - फोटो : अमर उजाला नेटवर्क
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विस्तार

गर्मियों की रातों में खेतों, बागों और तालाबों के किनारे टिमटिमाने वाले जुगनू कभी ग्रामीण भारत की पहचान थे। बच्चों के लिए वे किसी जादुई दुनिया की चमक थे लेकिन अब उनकी रोशनी तेजी से मंद पड़ रही है।



विशेषज्ञों के अनुसार जुगनुओं की घटती संख्या केवल एक सुंदर कीट के गायब होने की कहानी नहीं, बल्कि पर्यावरणीय संकट का गंभीर संकेत है। आर्द्र भूमि का विनाश, बढ़ता प्रकाश प्रदूषण और कीटनाशकों का अंधाधुध इस्तेमाल उनके अस्तित्व पर खतरा बनकर उभरा है।
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जुगनू अपने जीवन की शुरुआत नम मिट्टी, तालाबों और दलदली क्षेत्रों में करते हैं। इसलिए उनके लुप्त होने का अर्थ उन प्राकृतिक आवासों का भी खत्म होना है जो जैव विविधता के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं। विश्व पर्यावरण दिवस पर जुगनुओं की गुम होती चमक हमें चेतावनी दे रही है कि अगर इनको नहीं बचाया गया तो आने वाली पीढ़ियां इन्हें कहानियों और किताबों में ही देख पाएंगी।
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आईयूसीएन एसएससी फायर फ्लाई विशेषज्ञ समूह के क्षेत्रीय समन्वयक और फायरफ्लाईज एशियन एसोसिएशन, नई दिल्ली के संस्थापक व निदेशक डॉ. परवेज खान बताते हैं कि जुगनू का गायब होना गहरे पर्यावरणीय संकट की चेतावनी है। 

उनके अनुसार, विभिन्न वैज्ञानिक अध्ययनों में पाया गया है कि जुगनुओं के लुप्त होने से कई गंभीर परिणाम सामने आ सकते हैं। जूटाक्सा, बॉयोसाइंट और आईयूसीएन एसएससी फायर फ्लाई विशेषज्ञ समूह की रिपोर्ट्स के मुताबिक इनके न होने के कई नुकसान हो सकते हैं।

 

प्राकृतिक कीट नियंत्रण पर असर

जुगनू के लार्वा बेहद खूंखार शिकारी होते हैं। वे थोथे, स्लग और मिट्टी के अन्य कीड़ों को खाते हैं। इनके न रहने पर इन कीटों की संख्या बढ़ सकती है, जो फसलों और बगीचों को भारी नुकसान पहुंचा सकते हैं।

पर्यावरणीय चेतावनी तंत्र कमजोर होगा: पर्यावरण विज्ञानी जुगनू को बायो इंडिकेटर मानते हैं। संवेदनशील जुगनू स्वच्छ पानी, शुद्ध हवा और बिना रोशनी वाले प्रदूषण मुक्त क्षेत्रों में पनपते हैं। उनका गायब होना मिट्टी जहरीली, पानी प्रदूषित और प्रकाश प्रदूषण घातक स्तर पर पहुंचने का संकेत है।

खाद्य श्रृंखला में असंतुलन बढ़ेगा कुछ मकड़ियां, मेंढक और अन्य जीव जुगनुओं पर निर्भर रहते हैं। इनके लुप्त होने से स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र प्रभावित हो सकता है।

वैज्ञानिक व चिकित्सा अनुसंधान को झटका

जुगनुओं से मिलने वाले लूसिफेरेज एंजाइम का उपयोग कैंसर, अल्जाइमर और हृदय रोगों से जुड़े शोध में किया जाता है। जैव प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में जुगनू एक अहम मॉडल हैं। उनके न रहने से बायोलुमिनेसेंस पर आधारित कई वैज्ञानिक खोजें और भविष्य की चिकित्सा तकनीक बाधित हो सकती हैं। 

 

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जुगनू - फाइल फोटो। - फोटो : संवाद

267 साल बाद बनी पहली राष्ट्रीय सूची, 92 प्रजातियां दर्ज

डॉ. परवेज के मुताबिक भारत में पहली बार जुगनुओं की राष्ट्रीय सूची बनी है। जर्नल जूटॉक्सा में प्रकाशित अध्ययन के अनुसार 1758 से 2025 तक के रिकॉर्ड के विश्लेषण में देश में जुगनू के 27 वंशों और 92 प्रजातियों का दस्तावेजीकरण किया गया है।

सबसे बड़ी खोज यह है कि इनमें करीब 60 प्रतिशत प्रजातियां भारत में ही पाई जाती हैं। शोधकर्ताओं ने लगभग 300 वैज्ञानिक प्रकाशनों का विश्लेषण कर यह सूची तैयार की है। इसे भविष्य में संरक्षण और नई प्रजातियों की पहचान का आधार माना जा रहा है।

50 से ज्यादा प्रजातियां 200 साल से लापता : अध्ययन में जुगनू संरक्षण को लेकर गंभीर चिंता जताई गई है। वैज्ञानिकों के मुताबिक कई प्रजातियों का वर्णन 1800 के दशक में किया गया था। उसके बाद वे दोबारा कभी रिकॉर्ड नहीं की गई। ऐसी 50 से अधिक प्रजातियों की मौजूदगी पर आज भी सवाल बना हुआ है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर समय रहते व्यापक सर्वेक्षण नहीं हुए तो कुछ प्रजातियां बिना जानकारी के ही विलुप्त हो सकती हैं।

 

लुप्त होने के कारण जुगनू के खत्म होने के तीन कारण डॉ.

परवेज खान के मुताबिक जुगनू का खत्म होना खामोश विलुप्ति का हिस्सा है। वे उस डोमिनो इफेक्ट की पहली कड़ी हो सकते हैं जो आखिर में दूसरे कीटों और बड़े जानवरों के पतन का कारण बनेगा।

आवास का नष्ट होना

शहरीकरण, जंगलों की कटाई, आर्द्र भूमि (वेटलैंड्स) घटने से जुगनुओं के आवास सिकुड़ रहे हैं। जुगनुओं के लार्वा के लिए आवश्यक नम मिट्टी और जैविक पदार्थों से भरपूर वातावरण कम हो रहा है।

प्रकाश प्रदूषण

जुगनू अपनी रोशनी के जरिये साथी को आकर्षित करते हैं। एलईडी, स्ट्रीट लाइट और अन्य कृत्रिम रोशनियां उनके संकेतों को बाधित करती हैं। ऐसे में उनकी आबादी घटने लगती है।

बढ़ता रासायनिक प्रदूषण

खेती और बागवानी में इस्तेमाल होने वाले कीटनाशक जुगनुओं के लार्वा और वयस्क दोनों के लिए घातक होते हैं। इसके अलावा मिट्टी और जल प्रदूषण भी उनके जीवन चक्र को प्रभावित करता है।

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