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Lucknow News: लखनऊ चिड़ियाघर के अध्ययन में मगरमच्छ की अनूठी जीवनशैली का खुलासा

Lucknow Bureau लखनऊ ब्यूरो
Updated Tue, 16 Jun 2026 10:29 PM IST
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Study at Lucknow Zoo reveals unique lifestyle of crocodiles.
लखनऊ चिड़ियाघर के अध्ययन में मगरमच्छ की अनूठी जीवनशैली का खुलासा
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लखनऊ। विश्व मगरमच्छ दिवस के अवसर पर नवाब वाजिद अली शाह प्राणि उद्यान (लखनऊ चिड़ियाघर) में मगरमच्छों पर एक अध्ययन किया गया है। इस अध्ययन में मगरमच्छ की अनूठी जीवनशैली और शिकार करने की रणनीति का खुलासा हुआ है। वन्यजीव चिकित्सकों ने बताया कि मगरमच्छ शेर या बाघ से बिल्कुल अलग तरीके से शिकार करते हैं। वे भोजन पचाने से पहले अपने शरीर का तापमान बढ़ाते हैं।


अध्ययन के अनुसार, मगरमच्छ शिकार करने या भोजन पचाने से पहले खुद को औसत से अधिक गर्म करते हैं। यह उन्हें मांस को अच्छी तरह से पचाने में मदद करता है। मगरमच्छ का उपापचय बेहद धीमा होता है। जब वे हिरण या जंगली सूअर जैसे बड़े शिकार को निगलते हैं, तो उन्हें पचाने के लिए अत्यधिक शारीरिक ऊष्मा चाहिए। पेट भरकर खाने के बाद मगरमच्छ धूप में बैठ जाते हैं। सूर्य की किरणें उनके विशाल शरीर को गर्म करती हैं। इससे उनके पेट के पाचक एंजाइम और अम्लीय तत्व सक्रिय हो जाते हैं। यह एसिड शिकार की मजबूत हड्डियों और खुरों को भी गला देता है।
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पानी के भीतर सांस रोकने की क्षमता

लखनऊ चिड़ियाघर के वन्यजीव चिकित्सक और उप निदेशक उत्कर्ष शुक्ला ने बताया कि मगरमच्छ सामान्यतः 15 से 30 मिनट तक पानी के अंदर सांस रोक सकते हैं। विशेष परिस्थितियों में वे दो घंटे या उससे अधिक समय तक पानी में रहते हैं। ऐसा तब होता है जब वे पानी के नीचे बिल्कुल शांत बैठे हों। इस दौरान मगरमच्छ अपनी ऊर्जा बचाते हैं। पानी में जाने पर वे अपने दिल की धड़कन बहुत धीमी कर लेते हैं। इस खूबी से उनके शरीर में ऑक्सीजन की खपत बेहद कम हो जाती है।
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लखनऊ चिड़ियाघर में मगरमच्छों का प्रबंधन

लखनऊ चिड़ियाघर के निदेशक संजय कुमार बिश्वाल के अनुसार, चिड़ियाघर परिसर में इस समय करीब 13 मगरमच्छ हैं। गर्मी के मौसम में वे अपना अधिकांश समय पानी के भीतर ही बिताते हैं। मौजूदा समय में उन्हें सप्ताह में केवल दो दिन भोजन दिया जाता है। सर्दियों या ठंडे मौसम में मगरमच्छ भोजन करना पूरी तरह बंद कर देते हैं। एक वयस्क मगरमच्छ एक बार भरपेट भोजन करने के बाद कई महीनों तक बिना कुछ खाए-पिए जीवित रह सकता है। यह उनकी धीमी उपापचय दर के कारण संभव होता है।
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