सुना है क्या: 'बेताब नेताजी' की कहानी, साथ ही 'फिर कोई गाय तलाशो व छोटी मैडम की चुगली से बड़ी धड़ाम' के किस्से
यूपी के राजनीतिक गलियारे और प्रशासन में तमाम ऐसे किस्से हैं, जो हैं तो उनके अंदरखाने के... लेकिन, चाहे-अनचाहे बाहर आ ही जाते हैं। ऐसे किस्सों को आप अमर उजाला के "सुना है क्या" सीरीज में पढ़ सकते हैं। तो आइए पढ़ते हैं इस बार क्या है खास...
विस्तार
यूपी के राजनीतिक गलियारे और प्रशासनिक गलियों में आज तीन किस्से काफी चर्चा में रहे। चाहे-अनचाहे आखिर ये बाहर आ ही जाते हैं। इन्हें रोकने की हर कोशिश नाकाम होती है। आज की कड़ी में 'भोंपू का चोला उतारने को बेताब नेताजी' की कहानी। इसके अलावा 'फिर कोई गाय तलाशो' और 'छोटी मैडम की चुगली से बड़ी धड़ाम' के किस्से भी चर्चा में रहे। आगे पढ़ें, नई कानाफूसी...
भोंपू का चोला उतारने को बेताब नेताजी
भगवा दल के एक भोंपू बने नेताजी की महत्वाकांक्षाएं इन दिनों आसमान छू रही हैं। चर्चा है कि संगठन के मुखिया ने एक सार्वजनिक कार्यक्रम में मंच से उनका नाम क्या ले लिया, तभी से उनके पांव जमीन पर नहीं टिक रहे हैं। चर्चा है कि नेताजी अब भोंपू का चोला उतारकर संगठन के मजबूत पिलर बनने की जुगत में जुट गए हैं। इसके लिए उन्होंने सारे घोड़े खोल रखे हैं। हालांकि, अंदरखाने क्षेत्रीय आधार पर उनकी दावेदारी को झटका लगने की भी बात कही जा रही है क्योंकि एक ही क्षेत्र से कई लोगों को टीम में स्थान पर मिलने पर भी सवाल उठेंगे।
फिर कोई गाय तलाशो
अफसर चाहे जितना प्रभावशाली हो, घर का टिफिन उसके लिए दहशत का सबब बन जाता है। कभी दोस्तों ने लंच पर बुला लिया तो पहली चिंता टिफिन को ठिकाने लगाने की होती है। एक केंद्रीय एजेंसी के अफसर भी इससे आजिज हैं। अक्सर बैचमेट लंच पर बुला लेते हैं। ऐसे में टिफिन को ठिकाने लगाने का नया फार्मूला तलाशा गया है। ऑफिस के पास ही गाय की तलाश शुरू कर दी जाती है। जैसे ही गाय दिखती है, दोस्तों के साथ लंच पर जाने की क्लीयरेंस मिल जाती है। अब तो मातहत भी समझ गए हैं कि साहब दोपहर में टिफिन लेकर बाहर क्यों जाते हैं?
छोटी मैडम की चुगली से बड़ी धड़ाम
बड़ी मैडम लीज डीड विस्तारित करने की फाइलें वर्षों से अटकाए हैं। अब जब फाइलों के निपटाने का दबाव पड़ रहा है तो उन्होंने नया पैंतरा चल दिया है। उन्होंने चाल चली कि लीज डीड विस्तारित करने का अधिकार शासन के बजाय मुख्यालय को दे दिया जाए। मुख्यालय वाली छोटी मैडम भी कहां कम? उन्होंने भी ऊपर वालों को चुपके से ब्रीफ कर दिया कि जो अधिकार शासन का है, वो शासन के पास ही रहना चाहिए। अगर यह अधिकार मुख्यालय को दिया गया तो सारा दबाव नीचे ही आ जाएगा जो उचित नहीं होगा। पूरा प्लान लेकर जब बड़ी मैडम उच्चस्तरीय बैठक में पहुंचीं, तब तक यह धड़ाम हो चुका था।
