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सुना है क्या: 'मैं कौन खामखां...' की कहानी, साथ ही कमिश्नर का अजब आदेश व जांच के नाम पर बचाने का खेल के किस्से

अमर उजाला ब्यूरो, लखनऊ Published by: भूपेन्द्र सिंह Updated Mon, 19 Jan 2026 11:06 AM IST
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सार

यूपी के राजनीतिक गलियारे और प्रशासन में तमाम ऐसे किस्से हैं, जो हैं तो उनके अंदरखाने के... लेकिन, चाहे-अनचाहे बाहर आ ही जाते हैं। ऐसे किस्सों को आप अमर उजाला के "सुना है क्या" सीरीज में पढ़ सकते हैं। तो आइए पढ़ते हैं इस बार क्या है खास...

suna hai kya Main Kaun Khamakhan story along with Commissioner order and protection game name of investigation
सुना है क्या/suna hai kya - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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यूपी के राजनीतिक गलियारे और प्रशासनिक गलियों में आज तीन किस्से काफी चर्चा में रहे। चाहे-अनचाहे आखिर ये बाहर आ ही जाते हैं। इन्हें रोकने की हर कोशिश नाकाम होती है। आज की कड़ी में 'मैं कौन खामखां...' की कहानी। इसके अलावा 'कमिश्नर बहादुर का अजब आदेश' और 'जांच के नाम पर बचाने का खेल' के किस्से भी चर्चा में रहे। आगे पढ़ें, नई कानाफूसी... 

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मैं कौन खामखां...

माफिया से नेता बने एक महानुभाव किसी दल में नहीं हैं। खुद को युवाओं का नेता बताते हैं। जिन छोटे भाइयों से घिरे रहते थे, उन्होंने जेल भिजवाने में कसर नहीं छोड़ी। अब उनका नया कारनामा सामने आया है। दरअसल, वह भगवा पट्टा पहनकर 1500 किमी दूर प्रचार करने पहुंच गए। प्रदेश में भगवा लहर थी। लिहाजा नतीजे भी वैसे ही आए। नेताजी ने चेलों से प्रचार कराने लगे कि वह जहां-जहां गए, भगवा जीता है। यह देख दल वाले बोल रहे हैं कि इन पर मैं कौन खामखां वाली कहावत सटीक बैठती है। खुद का जिला हरवा दिया और जहां कोई पहचानता नहीं वहां अफलातून बनने चले गए।

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कमिश्नर बहादुर का अजब आदेश

कमिश्नर बहादुर के क्या कहने? अब बहादुर हैं तो समझ ही सकते हैं कि हर नियम-कानून से परे ही होंगे। जमीन के वर्षों पुराने मामले अपने यहां से निपटा डाले। नॉन-जेडए जमीन को जेडए श्रेणी में करने का आदेश पारित कर दिया। जब मामला दाखिल खारिज के लिए तहसील पहुंचा तो छोटे अफसरों के हाथ-पैर फूल गए कि ये काम कैसे करें। संबंधित पार्टियों से कह दिया कि कमिश्नर बहादुर के यहां से जो भी आदेश पारित करा लिया, पर दाखिल खारिज के लिए दबाव बनाया तो मुकदमा दर्ज करा दिया जाएगा। एक्ट में जो नियम हैं, उससे परे जाकर कोई कुछ नहीं कर सकता।

जांच के नाम पर बचाने का खेल

बीते दिनों प्रदेश की जेल से दो बंदी सुरक्षा-व्यवस्था को धता बता दीवार फांदकर भाग निकले। अब भी वह पकड़ से दूर हैं। जेलर, डिप्टी जेलर जैसे छोटे अफसरों की जिम्मेदारी तय कर उनको निलंबित कर दिया गया लेकिन जेल के मुख्य जिम्मेदार को सिर्फ हटाया गया। अब जांच के नाम पर उनको बचाने का खेल चल रहा है। ये वही जेल मुखिया हैं जो जेल की सुरक्षा व्यवस्था और नियम-कानून दरकिनार कर वारदात के ठीक पहले गाना गुनगुनाने में मगन थे। फिलहाल साहब ने खुद को बचाने की जो बिसात बिछाई थी, वह सफल होती दिख रही है।

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