Bahraich: बाघ, तेंदुओं की धरती पर बेखौफ बस्तियां, प्रकृति और वन्यजीवों के बीच सामंजस्य की मिसाल है ये गांव
भारत-नेपाल सीमा पर बसे कुछ गांवों ने मानव-वन्यजीव संघर्ष से बचने के तरीके विकसित कर लिए हैं। ग्रामीणों ने ऐसी फसलें चुनी हैं जो उन्हें वन्यजीवों से बचाती हैं। हालांकि, ग्रामीणों का कहना है कि मां भवानी की कृपा से वो सुरक्षित हैं।
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प्रकृति और वन्यजीवों के बीच सामंजस्य की मिसाल है कतर्नियाघाट के जंगलों के बीच बसा भवानीपुर गांव। बाघ, तेंदुए और हाथी अक्सर गांव के चारों तरफ घूमते हैं लेकिन कभी ग्रामीणों पर हमला नहीं करते। ग्रामीणों ने फसलें भी ऐसी चुनी हैं जो उन्हें वन्यजीवों से बचाती हैं। हालांकि, गांव के लोग मानते हैं कि उनके गांव का नाम मां भवानी के नाम पर है। इसलिए मां भवानी की कृपा से वे सुरक्षित हैं।
भारत-नेपाल सीमा पर बसे ज्यादातर गांव मानव-वन्यजीव संघर्ष का केंद्र बने हुए हैं। वहीं, कुछ गांव ऐसे भी हैं जो जंगल के बीच या किनारे पर होने के बाद भी खतरे से बाहर हैं। आखिर कैसे? इसी जिज्ञासा ने हमें बहराइच में कौड़ियाला नदी के पास बसे राजस्व गांव भवानीपुर पहुंचा दिया। कौड़ियाला नदी नेपाल के पहाड़ों से निकलकर यहां प्रवेश करती है। भवानीपुर के लोग काफी हद तक प्रकृति पर निर्भर हैं। बिजली की जगह सौर ऊर्जा का इस्तेमाल करते हैं।
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तिगड़ा: हमें एक-दूसरे को देखने की आदत, मगर दूर से
इंसानों और जंगल पर आधिपत्य रखने वाले जानवरों के बीच सामंजस्य का दूसरा उदाहरण तिगड़ा गांव है। कतर्निया के घने जंगलों और गांव के बीच 4-5 मीटर की बरसाती नदी है। यहां भी किसी वन्यजीव ने कभी हमला नहीं किया। तिगड़ा के सागर प्रसाद कहते हैं कि गांव के आसपास कोई बाघ या तेंदुआ दिखता है तो हम शोर नहीं मचाते। बस रास्ता बदल लेते हैं। इन जानवरों को भी हमारा गांव देखने की आदत पड़ गई है। इसलिए वे भी अलग रास्ता पकड़ लेते हैं। तिगड़ा के लालजीत ग्राम देवता की ओर इशारा करते हुए कहते हैं कि उनकी पूजा हमें हर खतरे से बचाती है।
धुसकिया: हमारा सह-अस्तित्व मजे से चल रहा
लखीमपुर खीरी में दुधवा टाइगर रिजर्व से महज 300 मीटर दूरी पर बसा घुसकिया गांव थारू जनजाति के लिए जाना जाता है। ग्रामीण वीर प्रताप बताते हैं कि यहां के जंगलों में हाथी, बाघ, तेंदुए, भालू और गैंडे हैं। कभी इंसानों को नुकसान पहुंचाने की घटना नहीं हुई। वन्यजीव गांव के नजदीक आते हैं और जलाशय से पानी पीकर लौट जाते हैं। फिर कुछ गावों में वन्यजीव इंसानों पर हमला क्यों करते हैं? इसके जवाब में गांव के रामेश्वर कहते हैं कि जहां जंगली जानवरों के आने पर शोर मचाया जाता है या लोग उनकी तरफ दौड़ते हैं, वहां ऐसी घटनाएं ज्यादा होती हैं। हमारा तो मजे से सह-अस्तित्व चल रहा है।
केले और गन्ने की खेती नहीं करते ग्रामीण
स्थानीय किसान पल्लू बताते हैं कि सभी ग्रामीणों ने बहुत पहले तय कर लिया था कि केले और गन्ने की खेती नहीं करेंगे। दरअसल, यह हाथी पसंद करते हैं। हालांकि, कुछ समय पहले एक-दो परिवारों ने खाने के लिए घर के बाहर केले के पेड़ लगाए तो हाथी गांव में आने लगे। फिर लोगों ने केले के पेड़ खुद ही हटा दिए। गन्ना तेंदुओं को जंगल जैसा लगता है।
किसान अरविंद बताते हैं कि हल्दी कोई भी वन्यजीव नहीं खाता। इसलिए हमने हल्दी को प्राथमिकता दी। भवानीपुर में सभी किसान तैयार हल्दी की खोदाई कर रहे है। यहां गेहूं, मक्का, अरहर और सरसों उगाते हैं। खाने भर का अनाज खेत में पैदा कर लेते हैं। भोजन पकाने के लिए लकड़ी जंगल से मिल जाती है। आवास, शौचालय, राशन और पेंशन सरकार से मिल रही हैं।
हुकुम अली बताते हैं कि हाथी गांव के नजदीक से गुजरते हैं लेकिन कभी नुकसान नहीं पहुंचाते। दिसंबर की एक सर्द रात हाथियों ने जंगल से सटी एक झोपड़ी जरूर गिरा दी थी लेकिन ग्रामीणों के जागने और शोर मचाने पर चले गए। हमारी कई पीढ़ियों ने जंगली जानवरों के व्यवहार को परखा है। इन जानवरों से बचने की कला हम अच्छी तरह सीख चुके हैं।