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Lucknow News: मनमाफिक दिल लगवाने की दुकान ने किया लोटपोट
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नाटक का मंचन करते कलाकार।
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लखनऊ। जरा सोचिए, आपको मनमाफिक दिल लगवाने की छूट मिल जाए तो क्या होगा। इसी काल्पनिक विचार को नाटक के माध्यम से बुधवार को मंच पर उतारा गया। इसे देखने वाले लोटपोट हो गए। मौका था संगीत नाटक अकादमी में दो दिवसीय राज्य नाट्य समारोह के अंतिम दिन नाटक ‘दिल की दुकान’ के मंचन का।
प्रादेशिक नाट्य समारोह की चयनित संस्था कानपुर की अनुभूति नाट्य इकाई की ओर से संगीत नाटक अकादमी के संत गाडगे प्रेक्षागृह में मंचन किया गया। रतन सिंह राठौर के निर्देशन में नाटक ने जीवन में सब्र रखने की सीख भी दी। लेखक राजेंद्र कुमार शर्मा थे। समारोह के दूसरे दिन की शुरुआत अकादमी की उपाध्यक्ष विभा सिंह, वरिष्ठ रंगकर्मी डॉ. अनिल रस्तोगी और पूर्व आईएएस रमेश मिश्रा ने दीप प्रज्ज्वलन कर की।
नाटक में दिखाया गया कि बाजारवाद के युग में एक दुकान ऐसी भी है, जहां लोग मनमाफिक दिल का चयन कर सकते हैं। सबसे पहले ऐसा परिवार दिखाया गया जिसका नायक बेहद कंजूस होता है। उसकी पत्नी तंग आकर उसे बादशाह का दिल लगवा देती है। उसकी यह युक्ति काम करती है, पर बाद में अति हो जाती है। वह कंजूस खुद को बादशाह समझकर अपना धन दोनों हाथों से लुटाना शुरू कर देता है।
दूसरे प्रसंग में दिखाया गया कि झगड़ालू पत्नी से तंग आकर पति उसका दिल लैला के दिल से बदलवा देता है। फिर उसकी पत्नी सुबह शाम, प्यार ही प्यार लुटाने लगती है। आखिरकार उसका पति भी परेशान हो जाता है। फिर ऐसा परिवार दिखाया गया, जिसमें पति शराबी होता है तो उसकी पत्नी उसका दिल एक महात्मा के दिल से बदलवा देती है। इसके बाद स्थितियां और बिगड़ जाती हैं। अंत में सभी को उनके असली दिल लगा दिए जाते हैं। मंच पर मुरारी गौड़, अंकिता चौधरी, श्याम मनोहर तिवारी, कमल द्विवेदी, योगेंद्र श्रीवास्तव, प्रिया वर्मा, वलीउल्लाह खान, हंसशिखा ने अहम भूमिकाएं निभाईं।
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प्रादेशिक नाट्य समारोह की चयनित संस्था कानपुर की अनुभूति नाट्य इकाई की ओर से संगीत नाटक अकादमी के संत गाडगे प्रेक्षागृह में मंचन किया गया। रतन सिंह राठौर के निर्देशन में नाटक ने जीवन में सब्र रखने की सीख भी दी। लेखक राजेंद्र कुमार शर्मा थे। समारोह के दूसरे दिन की शुरुआत अकादमी की उपाध्यक्ष विभा सिंह, वरिष्ठ रंगकर्मी डॉ. अनिल रस्तोगी और पूर्व आईएएस रमेश मिश्रा ने दीप प्रज्ज्वलन कर की।
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नाटक में दिखाया गया कि बाजारवाद के युग में एक दुकान ऐसी भी है, जहां लोग मनमाफिक दिल का चयन कर सकते हैं। सबसे पहले ऐसा परिवार दिखाया गया जिसका नायक बेहद कंजूस होता है। उसकी पत्नी तंग आकर उसे बादशाह का दिल लगवा देती है। उसकी यह युक्ति काम करती है, पर बाद में अति हो जाती है। वह कंजूस खुद को बादशाह समझकर अपना धन दोनों हाथों से लुटाना शुरू कर देता है।
दूसरे प्रसंग में दिखाया गया कि झगड़ालू पत्नी से तंग आकर पति उसका दिल लैला के दिल से बदलवा देता है। फिर उसकी पत्नी सुबह शाम, प्यार ही प्यार लुटाने लगती है। आखिरकार उसका पति भी परेशान हो जाता है। फिर ऐसा परिवार दिखाया गया, जिसमें पति शराबी होता है तो उसकी पत्नी उसका दिल एक महात्मा के दिल से बदलवा देती है। इसके बाद स्थितियां और बिगड़ जाती हैं। अंत में सभी को उनके असली दिल लगा दिए जाते हैं। मंच पर मुरारी गौड़, अंकिता चौधरी, श्याम मनोहर तिवारी, कमल द्विवेदी, योगेंद्र श्रीवास्तव, प्रिया वर्मा, वलीउल्लाह खान, हंसशिखा ने अहम भूमिकाएं निभाईं।

नाटक का मंचन करते कलाकार।

नाटक का मंचन करते कलाकार।

नाटक का मंचन करते कलाकार।

नाटक का मंचन करते कलाकार।

नाटक का मंचन करते कलाकार।

नाटक का मंचन करते कलाकार।