UP News: नदी जोड़ो परियोजनाओं का 46.7 प्रतिशत हिस्सा यूपी में, लेकिन दफ्तर होगा भोपाल में
एनडब्ल्यूडीए का कार्यालय भोपाल चले जाने से परियोजना क्षेत्रों और संबंधित राज्यों से दूरी बढ़ जाएगी। आशंका है कि इससे बैठकों, निरीक्षण और तकनीकी कार्यों में देरी हो सकती है। कई परियोजनाओं के तालमेल पर भी असर पड़ने की संभावना जताई जा रही है।
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लखनऊ से राष्ट्रीय जल विकास अभिकरण (एनडब्ल्यूडीए) के उत्तर क्षेत्रीय कार्यालय को 45 दिन के भीतर भोपाल भेजने के फैसले पर सवाल उठने लगे हैं। पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि उत्तर क्षेत्र की परियोजनाओं का सबसे अधिक यानी 46.7 फीसदी हिस्सा उत्तर प्रदेश का है। ये परियोजनाएं बिहार, पश्चिम बंगाल, राजस्थान, असम, ओडिशा, झारखंड और नेपाल तक फैली हैं।
इन परियोजनाओं में तालमेल के लिए लखनऊ सबसे सुविधाजनक केंद्र है। ऐसे में कार्यालय हटने से दूरी बढ़ेगी, काम धीमा पड़ सकता है और सरकारी खर्च भी बढ़ने की आशंका है। एनडब्ल्यूडीए का कार्यालय भोपाल चले जाने से परियोजना क्षेत्रों और संबंधित राज्यों से दूरी बढ़ जाएगी। आशंका है कि इससे बैठकों, निरीक्षण और तकनीकी कार्यों में देरी हो सकती है। कई परियोजनाओं के तालमेल पर भी असर पड़ने की संभावना जताई जा रही है।
नदी जोड़ो परियोजनाओं का अहम केंद्र रहा है लखनऊ
देश में बाढ़ और सूखे जैसी समस्याओं से निपटने के लिए नदी जोड़ो परियोजनाओं की शुरुआत की गई थी। इन परियोजनाओं के अध्ययन और विस्तृत रिपोर्ट तैयार करने की जिम्मेदारी राष्ट्रीय जल विकास अभिकरण को दी गई। उत्तर भारत की परियोजनाओं के लिए वर्ष 1992 में लखनऊ में प्रभाग कार्यालय और 2004 में मुख्य अभियंता (उत्तर) कार्यालय स्थापित किया गया था। पर्यावरण एक्टिविस्ट शिप्रा भट्ट के अनुसार लखनऊ को इसलिए चुना गया था क्योंकि उत्तर भारत की अधिकतर परियोजनाएं उत्तर प्रदेश और आसपास के राज्यों से जुड़ी हैं।
कार्यालय मध्य प्रदेश ले जाने पर सवाल
लखनऊ के वरिष्ठ पर्यावरण कार्यकर्ता शिवेंद्र नाथ तिवारी ने बताया कि वर्ष 2004 से लखनऊ में संचालित मुख्य अभियंता (उत्तर) कार्यालय उत्तर भारत की 14 नदी जोड़ो परियोजनाओं का तकनीकी अध्ययन और समन्वय देख रहा है। इन परियोजनाओं का कुल 133.35 लाख हेक्टेयर कमान क्षेत्र है, जिसमें सबसे बड़ा 46.7 प्रतिशत हिस्सा उत्तर प्रदेश में आता है, जबकि मध्य प्रदेश का हिस्सा केवल 6.08 प्रतिशत है। शेष 13 परियोजनाओं के कमान क्षेत्र में मध्य प्रदेश का कोई क्षेत्र शामिल नहीं होने के बावजूद कार्यालय को भोपाल ले जाने पर सवाल उठ रहे हैं। लखनऊ से कार्यालय हटने पर लगभग 82 प्रतिशत कमान क्षेत्र वाले राज्यों के साथ समन्वय प्रभावित होने की आशंका जताई गई है।
नजीर बनी केन-बेतवा लिंक परियोजना
विशेषज्ञ केन-बेतवा लिंक परियोजना का उदाहरण दे रहे हैं। उनका कहना है कि इस परियोजना में लखनऊ कार्यालय की महत्वपूर्ण भूमिका रही, जिसके कारण अलग-अलग राज्यों के बीच समन्वय तेजी से हो सका। यह परियोजना प्रदेश के चार जिलों बांदा, महोबा, झांसी व ललितपुर के लिए वरदान साबित हुई। ऐसे में बाकी 13 परियोजनाओं के लिए मुख्य अभियंता कार्यालय को भोपाल भेजने का फैसला समझ से परे बताया जा रहा है।