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यूपी: अब वैज्ञानिक तरीके से भी परखी जा सकेंगी जड़ी-बूटी, 'रासायनिक फिंगरप्रिंट बनेंगे पहचान का आधार

Mon, 19 Oct 2026 12:44 PM IST
रोहित मिश्र विनीत चतुर्वेदी, अमर उजाला लखनऊ
विनीत चतुर्वेदी, अमर उजाला लखनऊ Published by: रोहित मिश्र Updated Mon, 19 Oct 2026 12:44 PM IST
सार

Herbs and medicines: राष्ट्रीय वनस्पति अनुसंधान संस्थान (एनबीआरआई) के वैज्ञानिकों ने पौधों के 'रासायनिक फिंगरप्रिंट को उनकी पहचान का आधार बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण काम किया है।

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UP: Herbs can now be tested scientifically, 'chemical fingerprints' will become the basis for identification.
अब ज्यादा प्रमाणिक हो सकेंगी जड़ी-बूटी। - फोटो : अमर उजाला।

विस्तार

 जड़ी-बूटियों की पहचान अब सिर्फ उनके रंग-रूप से नहीं, बल्कि उनके रासायनिक फिंगरप्रिंट से होगी। पुनर्नवा, चिरायता, अशोक और विदारीकंद असली हैं या मिलते-जुलते पाैधों से मिलावट वाले, अब एक खास वैज्ञानिक जांच इसका फैसला करेगी।
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राष्ट्रीय वनस्पति अनुसंधान संस्थान (एनबीआरआई) के वैज्ञानिकों ने पौधों के ''''रासायनिक फिंगरप्रिंट'''' को उनकी पहचान का आधार बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण काम किया है। जड़ी-बूटियों की पहचान में सबसे बड़ी दिक्कत यही है कि कई पौधे देखने में एक-दूसरे से काफी मिलते-जुलते हैं। अलग-अलग क्षेत्रों में इनके नाम और इनके भीतर रसायन भी अलग-अलग हो सकते हैं। ऐसे में केवल बाहरी रूप देखकर सही पौधे की पहचान करना मुश्किल हो जाता है।
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वैज्ञानिकों ने ऐसे निकाला समाधान
एनबीआरआई के शोध ने इस समस्या का वैज्ञानिक रास्ता दिखाया है। किसी पौधे में मौजूद रासायनिक तत्वों की मात्रा और उनका आपसी अनुपात एक खास पैटर्न बनाता है। यही पैटर्न उस पौधे की रासायनिक पहचान बन सकता है। इसे किसी जड़ी-बूटी का खास केमिकल -आधार कार्ड की तरह समझा जा सकता है।
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पुनर्नवा में पकड़ा गया रासायनिक फर्क
एनबीआरआई के वैज्ञानिकों ने पुनर्नवा के 21 नमूनों का रासायनिक विश्लेषण किया। इनमें बाजार से लिए गए दो नमूनों का पैटर्न सामान्य पुनर्नवा से अलग मिला। उनमें ट्रिएन्थेमा पोर्टुलाकैस्ट्रम नाम के पौधे से जुड़े रासायनिक गुण पाए गए। यह पुनर्नवा में मिलावट के संभावित स्रोतों में शामिल है।

शोध में पुनर्नवा के कुछ खास रासायनिक संकेतक भी सामने आए। इनमें बीटा-एक्डीसोन और बोएराविनोन-बी प्रमुख हैं। इनकी मौजूदगी और आपसी पैटर्न से असली पुनर्नवा को उससे मिलते-जुलते पौधों से अलग करने में मदद मिल सकती है।

चिरायता, अशोक और विदारीकंद जैसे औषधीय पौधों में भी ऐसी समस्या सामने आती रही है। इनकी मांग अधिक है, जबकि हर जगह असली कच्चा माल आसानी से मिलना संभव नहीं होता। ऐसे में मिलते-जुलते दूसरे पौधों के इस्तेमाल की आशंका बढ़ जाती है। पौधा बदलने पर हर्बल दवाओं व उसमें मौजूद सक्रिय रासायनिक तत्वों की मात्रा और गुणवत्ता भी बदल जाती है।

शोध दल में डॉ. शरद श्रीवास्तव के साथ मृदुल कांत चौधरी, अंकिता मिश्रा व आदर्श तिवारी शामिल रहे। शोध को केंद्रीय आयुर्वेदिक विज्ञान अनुसंधान परिषद (सीसीआरएएस), नई दिल्ली से आर्थिक सहयोग मिला है। यह शोध नेचुरल प्रोडक्ट रिसर्च में प्रकाशित हुआ है।

जानें, क्या है रासायनिक फिंगरप्रिंट
हर पौधे में मौजूद रासायनिक तत्व एक खास अनुपात में होते हैं। इन्हीं की मात्रा और आपसी संबंध एक विशिष्ट पैटर्न बनाते हैं। वैज्ञानिक इस पैटर्न को दूसरे नमूनों से मिलाकर पता लगा सकते हैं कि जड़ी-बूटी असली है या किसी मिलते-जुलते पौधे से बदली गई है।


इस बदलाव से बढ़ेगा आयुर्वेद पर भरोसा
एनबीआरआई निदेशक डॉ. जबीर अहमद ने उम्मीद जताई कि इस रासायनिक फिंगरप्रिंट आधारित जांच को हर्बल दवाओं में गुणवत्ता नियंत्रण का हिस्सा बनाया जा सकेगा। इससे पता चल सकेगा कि दवा बनाने में इस्तेमाल की जा रही जड़ी-बूटी असली है या उसकी जगह मिलता-जुलता कोई दूसरा पौधा इस्तेमाल किया गया है। इससे आयुर्वेदिक दवाओं की गुणवत्ता बनाए रखने में मदद मिलेगी।
 
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