UP: रीढ़ की टीबी से गर्भावस्था में लकवाग्रस्त हो गए पैर, केजीएमयू में सामने आया दुर्लभ मामला; जानें वजह
लखनऊ के केजीएमयू में गर्भवती महिला में रीढ़ की टीबी से लकवा होने का दुर्लभ मामला सामने आया। 22 सप्ताह की गर्भवती महिला के पैरों ने काम करना बंद कर दिया था। सर्जरी और टीबी रोधी इलाज से मां और शिशु दोनों स्वस्थ हैं। विशेषज्ञों ने समय पर जांच की अहमियत बताई।
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किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय (केजीएमयू) में जीनी का एक दुर्लभ मामला सामने आयामले में गर्भवती महिला को रीढ़ की हड्डी में टीबी की समस्या थी। इस वजह से वह पक्षाघात (लकवा) की अवस्था में आ गई। समय रहते महिला का इलाज हो गया। अब वह और उसका बच्चा, दोनों स्वस्थ हैं। यह मामला लखनऊ निवासी 23 वर्षीय महिला का है, जो 22 सप्ताह की गर्भवती थी। गर्भावस्था के दौरान महिला पैरों में लगातार कमजोरी की शिकायत कर रही थी।
उसे चलने-फिरने में कठिनाई हो रही थी और पिछले पैरों में दर्द के साथ ही स्पर्श और तापमान के प्रति संवेदनशीलता भी समाप्त हो गई थी। शुरुआत में घरवालों ने इसे गर्भावस्था के दौरान होने वाली समस्याओं के रूप में देखा, लेकिन स्थिति गंभीर होती गई। जब उसके पैरों में गंभीर लकवा (स्पास्टिक पैराप्लेजिया) हो गया तो घरवाले परेशान होकर केजीएमयू के स्त्री एवं प्रसूति रोग विभाग में आए।
यहां जांच में रीढ़ की हड्डी में संक्रमण का संकेत मिला। एमआरआई स्कैन में संक्रमण और रीढ़ की हड्डी पर दवाव का पता चला, जो स्पाइनल टीबी के जैसा ही था। इसके बाद महिला का इलाज शुरू किया गया।
सर्जरी कर निकाली प्रभावित हड्डी
महिला के इलाज के लिए प्रसूति विशेषज्ञ के साथ ही न्यूरोसर्जन, एनेस्थेसियोलॉजिस्ट और रेडियोलॉजिस्ट की एक टीम बनाई गई। रीढ़ की हड्डी पर पड़ने वाले दबाव को कम करने के लिए डीकंप्रेशन सर्जरी की गई। इसमें रोड़ की हड्डी के पिछले हिस्से यानी लेमिना (कशेरुका की हड्डी का एक हिस्सा) को हटाने के लिए सर्जरी (लैमिनेक्टॉमी) की गई।
इस दौरान महिला के साथ ही पेट में पल रहे शिशु की सुरक्षा भी ध्यान रखा गया। सर्जरी के बाद महिला को तपेदिक रोधी दवाएं दी गई। ऑपरेशन के बाद, रोगी की तंत्रिका संबंधी स्थिति में तेजी से सुधार हुआ और अस्पताल में भर्ती रहने के दौरान धूण का स्वास्थ्य भी सामान्य बना रहा। इस केस को जर्नल ऑफ ऑस्टेट्रिक एनेस्थीसिया एंड क्रिटिकल केयर में प्रकाशित किया गया है। इसे डॉ. श्रेया रस्तोगी, डॉ. रवि प्रकाश और डॉ. बृजेश पी. ने पेश किया।
टीबी संक्रमित गर्भवती महिलाओं में हर पांचवीं भारतीय
देश में गर्भवती महिलाओं में टीबी का बोझ काफी अधिक है। प्रजनन आयु की महिलाओं में यह मृत्यु के शीर्ष तीन कारणों में से एक है। गर्भवती महिलाओं में टीबी के वैश्विक बोल का 21% हिस्सा भारत में है। सामान्य तौर पर फेफड़ों की टीबी के मामले मिलते हैं, लेकिन अन्य अंगों में टीबी के मामले भी तेजी से आ रहे हैं।
जोनल टास्क फोर्स राष्ट्रीय क्षय उन्मूलन कार्यक्रम (नॉर्थ जोन) के अध्यक्ष प्रो. सूर्यकांत ने बताया कि 6 हर अंग में हो सकती है टीबी की बीमारी टीबी की बीमारी बाल और नाखून छोड़कर शरीर के हर अंग में फैल सकती है। ऐसे में घर-परिवार में किसी को टीबी हुआ है तो कोई गंभीर समस्या होने पर टीबी जांच भी करानी चाहिए। टीबी का इलाज पूरी तरह से संभाष है। राष्ट्रीय स्तर पर इसके लिए निशुल्क इलाज का कार्यक्रम चलाया जा रहा है।