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Independence Day: भोपाल का जुमेराती डाकघर बना आजादी की पहली निशानी, नवाब के फैसले के खिलाफ यहीं से उठी आवाज

Fri, 14 Aug 2026 03:29 PM IST
Sandeep Kumar Tiwari न्यूज डेस्क,अमर उजाला, भोपाल
न्यूज डेस्क,अमर उजाला, भोपाल Published by: Sandeep Kumar Tiwari Updated Fri, 14 Aug 2026 03:29 PM IST
सार

15 अगस्त 1947 को देश आजाद हुआ, लेकिन भोपाल रियासत भारत में शामिल नहीं हुई थी। नवाब हमीदुल्लाह खान भोपाल को स्वतंत्र रखना चाहते थे। इसी दौर में जुमेराती के पुराने डाकघर पर आजादी समर्थकों ने तिरंगा फहराया, जो भोपाल में स्वतंत्र भारत की भावना की पहली बड़ी निशानी बनी।

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Independence Day: Bhopal's Jumerati Post Office became the first symbol of independence; it was from here that
जुमेराती का पुराना डाकघर - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

15 अगस्त 1947 को पूरा देश आजादी का जश्न मना रहा था, लेकिन भोपाल की तस्वीर अलग थी। देश अंग्रेजी शासन से मुक्त हो चुका था, मगर भोपाल रियासत अभी भारतीय संघ का हिस्सा नहीं बनी थी। नवाब हमीदुल्लाह खान भोपाल को स्वतंत्र रियासत बनाए रखने के पक्ष में थे। ऐसे दौर में जुमेराती का पुराना डाकघर उस आजादी की भावना का गवाह बना, जहां समर्थकों ने तिरंगा फहराकर भोपाल में स्वतंत्र भारत की पहली निशानी दर्ज की। खास बात यह है कि जिस इमारत ने उस दौर की हलचल देखी, वहां आज भी डाकघर संचालित हो रहा है। नवाबी दौर से डाक के काम से जुड़ी रही यह इमारत अंग्रेजों के समय भी डाकघर के रूप में इस्तेमाल होती थी। आज बदलते भोपाल के बीच खड़ी यह इमारत उस समय की याद दिलाती है, जब देश आजाद हो चुका था, लेकिन भोपाल को भारत का हिस्सा बनने के लिए करीब दो साल और संघर्ष करना पड़ा।
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देश आजाद, भोपाल की रियासत अलग
15 अगस्त 1947 को भारत स्वतंत्र हुआ। रियासतों को भारत या पाकिस्तान में शामिल होने का विकल्प दिया गया था। भोपाल के शासक नवाब हमीदुल्लाह खान तत्काल भारत में विलय के पक्ष में नहीं थे। वह भोपाल की अलग पहचान और स्वतंत्र अस्तित्व बनाए रखना चाहते थे। इसी कारण आजादी के दिन भोपाल में भारतीय तिरंगा आधिकारिक रूप से नहीं फहराया गया। लेकिन शहर में भारत के साथ विलय की मांग जोर पकड़ने लगी। आंदोलनकारियों ने रियासत के फैसले का विरोध शुरू कर दिया। शंकर दयाल शर्मा, रतन कुमार गुप्ता समेत कई नेताओं ने विलय आंदोलन को आगे बढ़ाया। विरोध प्रदर्शनों पर कार्रवाई हुई, गिरफ्तारियां हुईं और कई स्थानों पर तनाव की स्थिति भी बनी।
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जुमेराती डाकघर इसलिए बन गया इतिहास का गवाह
जुमेराती का पुराना डाकघर इस पूरे घटनाक्रम की सबसे खास यादों में शामिल है। 15 अगस्त 1947 को जब भोपाल रियासत की सत्ता भारतीय तिरंगे को आधिकारिक रूप से स्वीकार नहीं कर रही थी, तब इसी डाकघर पर आजादी समर्थकों द्वारा तिरंगा फहराया गया। इस लिहाज से यह इमारत सिर्फ डाक पहुंचाने वाली जगह नहीं रही, बल्कि भोपाल में आजादी की भावना और भारत में विलय की इच्छा की एक ऐतिहासिक निशानी बन गई। आज भी यहां डाकघर संचालित हो रहा है। आधुनिक भोपाल की भीड़ और नई इमारतों के बीच मौजूद यह पुराना डाकघर उस दौर की कहानी सुनाता है, जब देश आजाद हो चुका था, मगर भोपाल के लोगों को भारतीय तिरंगे के नीचे आने के लिए एक लंबा संघर्ष करना पड़ा था।
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मार्च 1948 में नवाब ने स्वतंत्र रहने का ऐलान किया
विलय की मांग के बीच मार्च 1948 में नवाब हमीदुल्लाह खान ने भोपाल के स्वतंत्र रहने की घोषणा कर दी। इसके बाद मई 1948 में उन्होंने भोपाल सरकार का मंत्रिमंडल बनाया और चतुरनारायण मालवीय को प्रधानमंत्री नियुक्त किया।इस फैसले के बाद भोपाल में विलीनीकरण आंदोलन और तेज हो गया। लोगों की मांग थी कि भोपाल को भी भारत का हिस्सा बनाया जाए। आंदोलनकारियों और प्रशासन के बीच टकराव की स्थिति बनी रही।

दिल्ली से आया दबाव, सरदार पटेल ने साफ कर दिया रुख
भोपाल के विलय का मामला केंद्र सरकार तक पहुंचा। तत्कालीन गृहमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल ने भी नवाब पर भोपाल को भारतीय संघ में शामिल करने का दबाव बनाया। राजनीतिक दबाव के साथ शहर में चल रहे आंदोलन ने भी नवाब सरकार के सामने मुश्किलें बढ़ा दीं।

29 जनवरी 1949 को नवाब ने अपना मंत्रिमंडल बर्खास्त कर सत्ता के सभी अधिकार फिर अपने हाथ में ले लिए। इसके बाद आंदोलन और तेज हो गया। करीब तीन महीने तक भोपाल में विलीनीकरण के लिए लगातार प्रदर्शन और विरोध चलता रहा।

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30 अप्रैल को हस्ताक्षर, 1 जून को भारत में विलय
लगातार बढ़ते जनदबाव और केंद्र के दबाव के बाद नवाब हमीदुल्लाह खान ने 30 अप्रैल 1949 को विलीनीकरण के दस्तावेज पर हस्ताक्षर किए। इसके बाद 1 जून 1949 को भोपाल रियासत औपचारिक रूप से भारतीय संघ का हिस्सा बन गई। यही वजह है कि 1 जून भोपाल के इतिहास में बेहद महत्वपूर्ण तारीख मानी जाती है। देश को आजादी 15 अगस्त 1947 को मिली थी, लेकिन भोपाल को भारतीय संघ में शामिल होने के लिए करीब दो साल का संघर्ष करना पड़ा।


 
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