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कब्जों की जकड़ में केरवा डैम: पानी के स्रोत पर बड़ा संकट, कैचमेंट एरिया में बन रहे बंगले-रिसॉर्ट,बढ़ रहा कब्जा
न्यूज डेस्क,अमर उजाला भोपाल
Published by: संदीप तिवारी
Updated Sat, 31 Jan 2026 04:55 PM IST
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सार
केरवा डैम के कैचमेंट एरिया में अवैध कब्जे, बंगले, रिसॉर्ट और प्लॉटिंग से जलस्रोत पर गंभीर संकट है। सीवेज मिलने का खतरा बढ़ा है और बड़ी आबादी के पेयजल पर असर पड़ सकता है। मामले में एनजीटी में याचिका दायर है।
डैम के पास बना घर
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
झीलों की नगरी भोपाल का अहम जलस्रोत केरवा डैम गंभीर खतरे में है। डैम को भरने वाली केरवा नदी और आसपास के नालों पर लगातार हो रहे कब्जों ने इसके अस्तित्व पर सवाल खड़े कर दिए हैं। कैचमेंट एरिया में बंगले, फार्महाउस और रिसॉर्ट खड़े हो चुके हैं, वहीं कई जगह अवैध प्लॉटिंग धड़ल्ले से जारी है। सबसे गंभीर बात यह है कि इन निर्माणों में रसूखदार नेता और अधिकारी भी शामिल बताए जा रहे हैं। मेंडोरा-मेंडोरी से समसगढ़ तक किए गए जमीनी सर्वे में सामने आया कि नदी के दोनों किनारों पर पक्के निर्माण हो चुके हैं। कहीं पुलिया बनाकर जमीन बेची जा रही है तो कहीं जंगल से निकलने वाले नालों और केरवा नदी का प्राकृतिक बहाव ही मोड़ दिया गया है। हालात ऐसे ही रहे तो आने वाले समय में केरवा डैम का कैचमेंट एरिया पूरी तरह खत्म हो सकता है।
पर्यावरणविद् का सीधा आरोप
पर्यावरणविद् रशीद नूर ने कहा कि केरवा डैम राजधानी की बड़ी आबादी को पीने का पानी देता है और यह क्षेत्र भोपाल के खूबसूरत जंगल व पर्यटन क्षेत्र से भी जुड़ा है। उन्होंने आरोप लगाया कि पीछे के इलाके में नियमविरुद्ध तरीके से करोड़ों के बंगले बन गए हैं। सड़कें नहीं हैं, लेकिन चार-चार करोड़ के मकान खड़े हैं। उन्होंने कहा कि मास्टर प्लान-2005 में जिस भूमि को बॉटनिकल गार्डन के लिए आरक्षित किया गया है, वहां बड़े निर्माण और अवैध कॉलोनियों का कारोबार शुरू हो चुका है। पंचायत से अनुमति लेकर मकान बनाए जा रहे हैं, जिनका सीवेज अंततः डैम में जाएगा। रशीद नूर ने इसे पानी को जहरीला करने की बड़ी साजिश बताया और कहा कि जिस तरह बड़े तालाब और शाहपुरा झील में सीवेज मिला, वही हाल केरवा डैम का भी किया जा रहा है।
नियमों की आड़ में खुला खेल
मास्टर प्लान-2005 के अनुसार डैम और नदी के आसपास सीमित उपयोग की अनुमति है। लो-डेंसिटी क्षेत्र में 10 हजार वर्गफीट जमीन पर सिर्फ 600 वर्गफीट निर्माण की छूट है। लेकिन इसी नियम की आड़ में टीएंडसीपी और पंचायत से फार्महाउस की अनुमति लेकर बड़े पैमाने पर प्लॉटिंग और निर्माण किए जा रहे हैं, जो नियमों की भावना के खिलाफ है।
नदी किनारे पक्के मकान, नालों पर कब्जा
जांच में सामने आया कि केरवा नदी से सटाकर पक्के मकान और बाउंड्रीवॉल बन चुकी हैं। कुछ जगह फिल्म प्रोडक्शन हाउस और फार्म प्रोजेक्ट के नाम पर निर्माण हुआ है। नालों पर कब्जे से पानी का प्राकृतिक बहाव बाधित हो रहा है, जिससे डैम तक पानी पहुंचना मुश्किल होता जा रहा है।
यह भी पढ़ें-MP के उत्तरी हिस्से में छाया कोहरा,फरवरी की शुरुआत आंधी-बारिश से, 3 दिन अलर्ट,फिर बढ़ेगी ठंड
एनजीटी तक पहुंचा मामला
पर्यावरणविदों ने केरवा डैम को बचाने के लिए नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) में याचिका दायर की है। उनका कहना है कि सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन के अनुसार नदी, डैम और तालाब से 50 मीटर के दायरे में निर्माण प्रतिबंधित है, लेकिन यहां खुलेआम नियमों की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं।
यह भी पढ़ें-भोपाल में वोटर आए सामने, वैध नाम कटे, कांग्रेस का आरोप-लोकतंत्र से छेड़छाड़
हादसों का डर, पेयजल पर खतरा
अवैध निर्माण के लिए दिनभर डंपरों की आवाजाही से स्थानीय लोगों में हादसों का डर बना रहता है। लोगों का कहना है कि अगर यही हाल रहा तो सीवेज और गंदा पानी सीधे डैम में जाएगा। इससे कोलार क्षेत्र के ढाई लाख से ज्यादा लोगों के पीने के पानी पर संकट खड़ा हो जाएगा।
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पर्यावरणविद् का सीधा आरोप
पर्यावरणविद् रशीद नूर ने कहा कि केरवा डैम राजधानी की बड़ी आबादी को पीने का पानी देता है और यह क्षेत्र भोपाल के खूबसूरत जंगल व पर्यटन क्षेत्र से भी जुड़ा है। उन्होंने आरोप लगाया कि पीछे के इलाके में नियमविरुद्ध तरीके से करोड़ों के बंगले बन गए हैं। सड़कें नहीं हैं, लेकिन चार-चार करोड़ के मकान खड़े हैं। उन्होंने कहा कि मास्टर प्लान-2005 में जिस भूमि को बॉटनिकल गार्डन के लिए आरक्षित किया गया है, वहां बड़े निर्माण और अवैध कॉलोनियों का कारोबार शुरू हो चुका है। पंचायत से अनुमति लेकर मकान बनाए जा रहे हैं, जिनका सीवेज अंततः डैम में जाएगा। रशीद नूर ने इसे पानी को जहरीला करने की बड़ी साजिश बताया और कहा कि जिस तरह बड़े तालाब और शाहपुरा झील में सीवेज मिला, वही हाल केरवा डैम का भी किया जा रहा है।
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नियमों की आड़ में खुला खेल
मास्टर प्लान-2005 के अनुसार डैम और नदी के आसपास सीमित उपयोग की अनुमति है। लो-डेंसिटी क्षेत्र में 10 हजार वर्गफीट जमीन पर सिर्फ 600 वर्गफीट निर्माण की छूट है। लेकिन इसी नियम की आड़ में टीएंडसीपी और पंचायत से फार्महाउस की अनुमति लेकर बड़े पैमाने पर प्लॉटिंग और निर्माण किए जा रहे हैं, जो नियमों की भावना के खिलाफ है।
नदी किनारे पक्के मकान, नालों पर कब्जा
जांच में सामने आया कि केरवा नदी से सटाकर पक्के मकान और बाउंड्रीवॉल बन चुकी हैं। कुछ जगह फिल्म प्रोडक्शन हाउस और फार्म प्रोजेक्ट के नाम पर निर्माण हुआ है। नालों पर कब्जे से पानी का प्राकृतिक बहाव बाधित हो रहा है, जिससे डैम तक पानी पहुंचना मुश्किल होता जा रहा है।
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एनजीटी तक पहुंचा मामला
पर्यावरणविदों ने केरवा डैम को बचाने के लिए नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) में याचिका दायर की है। उनका कहना है कि सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन के अनुसार नदी, डैम और तालाब से 50 मीटर के दायरे में निर्माण प्रतिबंधित है, लेकिन यहां खुलेआम नियमों की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं।
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हादसों का डर, पेयजल पर खतरा
अवैध निर्माण के लिए दिनभर डंपरों की आवाजाही से स्थानीय लोगों में हादसों का डर बना रहता है। लोगों का कहना है कि अगर यही हाल रहा तो सीवेज और गंदा पानी सीधे डैम में जाएगा। इससे कोलार क्षेत्र के ढाई लाख से ज्यादा लोगों के पीने के पानी पर संकट खड़ा हो जाएगा।

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