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MP News: 400 साल पुराना जल मॉडल फिर होगा जिंदा, बुरहानपुर में कुंडी भंडारा की वैज्ञानिक मैपिंग
Sat, 08 Aug 2026 09:12 PM IST
Anand Pawar
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, छिंदवाड़ा/ भोपाल
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, छिंदवाड़ा/ भोपाल
Published by: Anand Pawar
Updated Sat, 08 Aug 2026 09:12 PM IST
सार
मध्य प्रदेश में करीब 400 साल पुरानी कुंडी भंडारा जल प्रणाली को फिर से उपयोगी बनाने की तैयारी शुरू हो गई है। मैनिट के विशेषज्ञ आधुनिक तकनीक से भूमिगत सुरंगों और जलधाराओं का सर्वे करेंगे, ताकि पता चल सके कि इस ऐतिहासिक जल नेटवर्क को कितना पुनर्जीवित किया जा सकता है।
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बुरहानपुर कुंडी कुंभारा की टनल, नगरीय प्रशासन विभाग के आयुक्त संकेत भोंडवें
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
मध्य प्रदेश अब करीब चार सदियों पुराने उस जल प्रबंधन मॉडल को फिर से जिंदा करने की तैयारी में है, जिसने कभी पूरे बुरहानपुर शहर की प्यास बुझाई थी। मुगलकाल में विकसित कुंडी भंडारा भूमिगत जल प्रणाली को वैज्ञानिक तरीके से पुनर्जीवित करने के लिए राज्य सरकार ने कवायद शुरू कर दी है। इसके तहत भूमिगत सुरंगों और जलधाराओं की स्थिति पता लगाने के लिए अत्याधुनिक तकनीक का इस्तेमाल किया जाएगा। करीब 400 साल पुरानी यह जल प्रणाली आज भी जमीन के नीचे मौजूद है। इसका निर्माण करीब 1615 में मुगल शासक जहांगीर के शासनकाल में तत्कालीन मुगल गवर्नर अब्दुर्रहीम खान-ए-खाना के दौर में कराया गया था। फारसी ‘कनात’ प्रणाली पर आधारित कुंडी भंडारे में 100 से ज्यादा ऊर्ध्वाधर कुएं और करीब छह किलोमीटर लंबी भूमिगत गैलरियां बताई जाती हैं। सतपुड़ा की पहाड़ियों से रिसने वाला भूजल इन भूमिगत रास्तों के जरिए गुरुत्वाकर्षण के सहारे बुरहानपुर तक पहुंचता था। खास बात यह थी कि पानी पहुंचाने के लिए न पंप की जरूरत थी और न बिजली की।
बुरहानपुर नगर निगम कमिश्नर संदीप श्रीवास्तव ने बताया कि सतपुड़ा पहाड़ियों की तराई में उस समय भूमिगत जल भंडारण की व्यवस्था विकसित की गई थी। इसमें पहाड़ियों से पानी रिसकर जमा होता है। इस पानी की गुणवत्ता मिनरल वाटर के समान बताई जाती है। इस भूमिगत जल भंडार से करीब 6 किलोमीटर दूर शाही किले तक सुरंग बनाई गई है। उस समय पानी को ग्रेविटी के जरिए सुरंग से शाही किले तक पहुंचाया जाता था और वहां से शहर के अलग-अलग हिस्सों में वितरित किया जाता था।
उन्होंने बताया कि सुरंग के ऊपर पूरे रास्ते में 105 कुंडियां बनी हुई हैं। ये करीब डेढ़ मीटर चौड़ी हैं, जिनके जरिए सुरंग में प्रकाश और हवा पहुंचती थी। यह भूमिगत सुरंग जमीन से करीब 60 से 70 मीटर नीचे है। फिलहाल पूरी जल प्रणाली के संरक्षण का काम चल रहा है। इसके लिए डीपीआर तैयार की जा रही है। डीपीआर के आधार पर राज्य सरकार से संरक्षण के लिए बजट मांगा जाएगा। वहीं, नगरीय विकास आयुक्त संकेत भोंडवे ने बताया कि इस भूमिगत जल प्रणाली का MANIT की टीम सर्वे कर रही है। यह प्रणाली राज्य पुरातत्व विभाग के संरक्षण में है, जबकि इसके रखरखाव की जिम्मेदारी नगर निगम बुरहानपुर की है। उन्होंने कहा कि जल प्रणाली के संरक्षण और इसे सुरक्षित रखने के लिए जरूरी काम किए जाएंगे।
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अब आधुनिक तकनीक से तलाशेंगे जमीन के नीचे का पूरा नेटवर्क
कुंडी भंडारे को दोबारा उपयोगी बनाने के लिए मौलाना आजाद राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (मैनिट), भोपाल के विशेषज्ञों की मदद ली जा रही है। जल संसाधन विशेषज्ञों की टीम मैग्नेटिक सर्वे और अन्य नॉन-डिस्ट्रक्टिव तकनीकों के माध्यम से जमीन के नीचे छिपी जलधाराओं और सुरंगों की मैपिंग करेगी। इस अध्ययन में यह पता लगाने की कोशिश होगी कि सदियों पुरानी भूमिगत प्रणाली में कहां सुरंगें सुरक्षित हैं, कहां संरचनात्मक नुकसान हुआ है, कौन से हिस्से बंद या धंस चुके हैं और पानी का प्रवाह किन हिस्सों में अब भी जारी है। इसके बाद पूरे नेटवर्क के पुनर्जीवन के लिए विस्तृत योजना तैयार की जाएगी।
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चार सदियों की उपेक्षा के बावजूद पानी का प्रवाह बरकरार
बुरहानपुर के इतिहास के जानकार कमरुद्दीन फलक का कहना है कि कुंडी भंडारा लंबे समय से उपेक्षा, अतिक्रमण और कई स्थानों पर सुरंगों के क्षतिग्रस्त होने की समस्या से जूझ रहा है। इसके बावजूद हाल के निरीक्षण में भूमिगत नेटवर्क के कुछ हिस्सों में अब भी पानी का प्रवाह जारी मिला है। यह बुरहानपुर ही नहीं, बल्कि पूरे विश्व के लिए महत्वपूर्ण जल विरासत है। इस तरह की ऐतिहासिक भूमिगत जल प्रणाली का आज भी जीवित स्थिति में होना इसे खास बनाता है। कुंडी भंडारे की दो कुंडियां धंस गई हैं, जिन्हें ठीक करने की जरूरत है। इसके संरक्षण से न केवल इस ऐतिहासिक धरोहर को सुरक्षित किया जा सकेगा, बल्कि बुरहानपुर में पर्यटन को भी बढ़ावा मिलने की उम्मीद है। हाल ही में बुरहानुपर की विशेषज्ञ टीम ने भी इसका निरीक्षण किया है। उम्मीद है कि वैज्ञानिक अध्ययन के जरिए भूमिगत जल प्रणाली की मौजूदा स्थिति और संरचना को बेहतर तरीके से समझकर इसके बड़े हिस्से को दोबारा सक्रिय किया जा सकेगा।
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बुरहानपुर के लिए फिर बन सकता है वैकल्पिक जल स्रोत
विशेषज्ञों के अध्ययन का उद्देश्य सिर्फ ऐतिहासिक संरचना को संरक्षित करना नहीं, बल्कि यह पता लगाना भी है कि इसे सुरक्षित तरीके से दोबारा जल आपूर्ति के उपयोग में कैसे लाया जा सकता है। यदि भूमिगत नेटवर्क का बड़ा हिस्सा पुनर्जीवित करने योग्य पाया जाता है तो चार सौ साल पुरानी यह प्रणाली आज के बुरहानपुर के लिए भी उपयोगी साबित हो सकती है। इससे पारंपरिक जल संरक्षण और आधुनिक वैज्ञानिक तकनीक को जोड़कर सतत जल प्रबंधन का मॉडल तैयार किया जा सकता है।
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बुरहानपुर नगर निगम कमिश्नर संदीप श्रीवास्तव ने बताया कि सतपुड़ा पहाड़ियों की तराई में उस समय भूमिगत जल भंडारण की व्यवस्था विकसित की गई थी। इसमें पहाड़ियों से पानी रिसकर जमा होता है। इस पानी की गुणवत्ता मिनरल वाटर के समान बताई जाती है। इस भूमिगत जल भंडार से करीब 6 किलोमीटर दूर शाही किले तक सुरंग बनाई गई है। उस समय पानी को ग्रेविटी के जरिए सुरंग से शाही किले तक पहुंचाया जाता था और वहां से शहर के अलग-अलग हिस्सों में वितरित किया जाता था।
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उन्होंने बताया कि सुरंग के ऊपर पूरे रास्ते में 105 कुंडियां बनी हुई हैं। ये करीब डेढ़ मीटर चौड़ी हैं, जिनके जरिए सुरंग में प्रकाश और हवा पहुंचती थी। यह भूमिगत सुरंग जमीन से करीब 60 से 70 मीटर नीचे है। फिलहाल पूरी जल प्रणाली के संरक्षण का काम चल रहा है। इसके लिए डीपीआर तैयार की जा रही है। डीपीआर के आधार पर राज्य सरकार से संरक्षण के लिए बजट मांगा जाएगा। वहीं, नगरीय विकास आयुक्त संकेत भोंडवे ने बताया कि इस भूमिगत जल प्रणाली का MANIT की टीम सर्वे कर रही है। यह प्रणाली राज्य पुरातत्व विभाग के संरक्षण में है, जबकि इसके रखरखाव की जिम्मेदारी नगर निगम बुरहानपुर की है। उन्होंने कहा कि जल प्रणाली के संरक्षण और इसे सुरक्षित रखने के लिए जरूरी काम किए जाएंगे।
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अब आधुनिक तकनीक से तलाशेंगे जमीन के नीचे का पूरा नेटवर्क
कुंडी भंडारे को दोबारा उपयोगी बनाने के लिए मौलाना आजाद राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (मैनिट), भोपाल के विशेषज्ञों की मदद ली जा रही है। जल संसाधन विशेषज्ञों की टीम मैग्नेटिक सर्वे और अन्य नॉन-डिस्ट्रक्टिव तकनीकों के माध्यम से जमीन के नीचे छिपी जलधाराओं और सुरंगों की मैपिंग करेगी। इस अध्ययन में यह पता लगाने की कोशिश होगी कि सदियों पुरानी भूमिगत प्रणाली में कहां सुरंगें सुरक्षित हैं, कहां संरचनात्मक नुकसान हुआ है, कौन से हिस्से बंद या धंस चुके हैं और पानी का प्रवाह किन हिस्सों में अब भी जारी है। इसके बाद पूरे नेटवर्क के पुनर्जीवन के लिए विस्तृत योजना तैयार की जाएगी।
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चार सदियों की उपेक्षा के बावजूद पानी का प्रवाह बरकरार
बुरहानपुर के इतिहास के जानकार कमरुद्दीन फलक का कहना है कि कुंडी भंडारा लंबे समय से उपेक्षा, अतिक्रमण और कई स्थानों पर सुरंगों के क्षतिग्रस्त होने की समस्या से जूझ रहा है। इसके बावजूद हाल के निरीक्षण में भूमिगत नेटवर्क के कुछ हिस्सों में अब भी पानी का प्रवाह जारी मिला है। यह बुरहानपुर ही नहीं, बल्कि पूरे विश्व के लिए महत्वपूर्ण जल विरासत है। इस तरह की ऐतिहासिक भूमिगत जल प्रणाली का आज भी जीवित स्थिति में होना इसे खास बनाता है। कुंडी भंडारे की दो कुंडियां धंस गई हैं, जिन्हें ठीक करने की जरूरत है। इसके संरक्षण से न केवल इस ऐतिहासिक धरोहर को सुरक्षित किया जा सकेगा, बल्कि बुरहानपुर में पर्यटन को भी बढ़ावा मिलने की उम्मीद है। हाल ही में बुरहानुपर की विशेषज्ञ टीम ने भी इसका निरीक्षण किया है। उम्मीद है कि वैज्ञानिक अध्ययन के जरिए भूमिगत जल प्रणाली की मौजूदा स्थिति और संरचना को बेहतर तरीके से समझकर इसके बड़े हिस्से को दोबारा सक्रिय किया जा सकेगा।
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बुरहानपुर के लिए फिर बन सकता है वैकल्पिक जल स्रोत
विशेषज्ञों के अध्ययन का उद्देश्य सिर्फ ऐतिहासिक संरचना को संरक्षित करना नहीं, बल्कि यह पता लगाना भी है कि इसे सुरक्षित तरीके से दोबारा जल आपूर्ति के उपयोग में कैसे लाया जा सकता है। यदि भूमिगत नेटवर्क का बड़ा हिस्सा पुनर्जीवित करने योग्य पाया जाता है तो चार सौ साल पुरानी यह प्रणाली आज के बुरहानपुर के लिए भी उपयोगी साबित हो सकती है। इससे पारंपरिक जल संरक्षण और आधुनिक वैज्ञानिक तकनीक को जोड़कर सतत जल प्रबंधन का मॉडल तैयार किया जा सकता है।
