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MP News: दतिया भाजपा में जिलाध्यक्ष की कुर्सी पर 2028 का दांव, तिवारी-पिरोनिया के नाम पर मंथन
Sun, 09 Aug 2026 09:21 AM IST
Anand Pawar
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, छिंदवाड़ा/ भोपाल
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, छिंदवाड़ा/ भोपाल
Published by: Anand Pawar
Updated Sun, 09 Aug 2026 09:21 AM IST
सार
दतिया विधानसभा उपचुनाव में हार के बाद भाजपा ने जिला संगठन को भंग कर दिया है। अब संगठन में बदलाव की तैयारी के साथ नए जिलाध्यक्ष के लिए आशुतोष तिवारी और घनश्याम पिरोनिया के नाम चर्चा में हैं, लेकिन 2028 के टिकट और जातीय समीकरण को देखते हुए नामों पर मंथन जारी हैं।
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भाजपा का झंडा
- फोटो : ANI
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विस्तार
विधानसभा उपचुनाव में हार के बाद दतिया भाजपा संगठन में बदलाव की कवायद तेज हो गई है। जिला कार्यकारिणी भंग किए जाने के बाद नए जिलाध्यक्ष को लेकर पार्टी में मंथन चल रहा है। प्रमुख रूप से आशुतोष तिवारी और पूर्व विधायक व प्रदेश प्रवक्ता घनश्याम पिरोनिया के नाम चर्चा में हैं। दोनों ही 2028 के विधानसभा चुनाव में टिकट के दावेदार माने जा रहे हैं। ऐसे में जिलाध्यक्ष का फैसला संगठन में बदलाव के साथ 2028 के सियासी गणित के लिहाज से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। पार्टी के अंदर चर्चा है कि दतिया में अब नरोत्तम मिश्रा के समर्थकों को संगठन के महत्वपूर्ण पदों से दूर रखने की रणनीति है। उपचुनाव में हार के बाद जिला कार्यकारिणी भंग करना इसी बदलाव की शुरुआत माना जा रहा है। हालांकि अभी तक जिले के किसी पदाधिकारी को निलंबित या पार्टी से बाहर नहीं किया गया है। इससे संकेत है कि पार्टी सामूहिक रूप से संगठन में बदलाव कर रही है। नए जिलाध्यक्ष के चयन में भी नरोत्तम मिश्रा विरोधी खेमे के चेहरे को प्राथमिकता मिलने की चर्चा है।
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तिवारी के सामने जिलाध्यक्ष या 2028 की टिकट का सवाल
दतिया उपचुनाव में भाजपा प्रत्याशी रहे आशुतोष तिवारी को संगठन के करीबी और सक्रिय नेता के रूप में देखा जाता है। लेकिन उनके सामने 2028 की टिकट का सवाल भी है। यदि वह जिलाध्यक्ष बनते हैं तो अगले डेढ़ से दो साल संगठन खड़ा करने और नगरीय निकाय चुनाव की तैयारी और उसको लड़ने में निकल जाएंगे। इसके बाद विधानसभा चुनाव के लिए टिकट की प्रक्रिया शुरू हो जाएगी। ऐसे में जिलाध्यक्ष रहते हुए खुद टिकट के दावेदार बने रहना उनके लिए आसान नहीं होगा। संगठन जिलाध्यक्ष से चुनाव जिताने की भी उम्मीद करता है। ऐसे में तिवारी के सामने जिलाध्यक्ष का पद और 2028 की विधानसभा टिकट में से एक चुनने जैसी स्थिति बन सकती है।
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पिरोनिया के सामने भी यही चुनौती
पूर्व विधायक और प्रदेश प्रवक्ता घनश्याम पिरोनिया के नाम पर भी चर्चा है। वह भांडेर विधानसभा सीट से फिर टिकट के दावेदार हैं। ऐसे में जिलाध्यक्ष बनने पर उनके सामने भी 2028 की टिकट को लेकर यही चुनौती होगी। पार्टी ऐसे चेहरे की तलाश में है जो नरोत्तम मिश्रा के प्रभाव से अलग संगठन को आगे बढ़ाने के साथ सामाजिक समीकरण भी साध सके।
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ब्राह्मण-दलित समीकरण अहम
आशुतोष तिवारी के नाम के साथ नरोत्तम के बाद ब्राह्मण और व्यापारी वर्ग के समीकरण को साधने की संभावना देखी जा रही है। वहीं घनश्याम पिरोनिया के जरिए दलित वोट बैंक को साधने की कोशिश हो सकती है। उपचुनाव में कांग्रेस के घनश्याम सिंह की जीत के बाद भाजपा के लिए दलित और अन्य पिछड़े वर्गों का समीकरण महत्वपूर्ण हो गया है। पार्टी 2028 से पहले इन सामाजिक समीकरणों को मजबूत करना चाहती है। दूसरी ओर, जिला अध्यक्ष पद से रघुवीर कुशवाह को हटाए जाने के बाद कुशवाह समाज का समीकरण भी चुनौती है। रघुवीर कुशवाह कह चुके है कि चुनाव से पहले इस्तीफा देने के बावजूद उन पर कार्रवाई नहीं हुई। चुनाव में पूरी मेहनत से काम करने के बावजूद पार्टी की हार का ठीकरा अब उन पर फोड़ा जा रहा है।
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कुशवाह समाज को साधना भी जरूरी
बता दें दतिया में करीब 35 हजार कुशवाह मतदाता बताए जाते हैं। ऐसे में पार्टी इस समाज को नाराज नहीं करना चाहेगी। पिछले विधानसभा चुनाव में ग्रामीण क्षेत्र में कुशवाह समाज की नाराजगी को भी नरोत्तम मिश्रा की हार के कारणों में गिना गया था। इसके बाद ही रघुवीर कुशवाह को ग्रामीण मंडल अध्यक्ष से जिला अध्यक्ष बनाया गया था।
निकाय चुनाव से पहले संगठन खड़ा करना चुनौती
भाजपा ने पूरे जिले की संगठनात्मक संरचना भंग कर दी है। ऐसे में दतिया के साथ सेवढ़ा और भांडेर में भी संगठन अब सक्रिय नहीं है। अगले साल नगरीय निकाय चुनाव प्रस्तावित हैं। पार्टी नहीं चाहती कि संगठन में लंबे समय तक चलने वाली खींचतान का असर चुनाव पर पड़े। इसलिए जिलाध्यक्ष के चयन में जातीय समीकरण, गुटीय संतुलन, 2028 की टिकट और आगामी निकाय चुनाव, चारों पहलुओं को ध्यान में रखा जा रहा है।
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तिवारी के सामने जिलाध्यक्ष या 2028 की टिकट का सवाल
दतिया उपचुनाव में भाजपा प्रत्याशी रहे आशुतोष तिवारी को संगठन के करीबी और सक्रिय नेता के रूप में देखा जाता है। लेकिन उनके सामने 2028 की टिकट का सवाल भी है। यदि वह जिलाध्यक्ष बनते हैं तो अगले डेढ़ से दो साल संगठन खड़ा करने और नगरीय निकाय चुनाव की तैयारी और उसको लड़ने में निकल जाएंगे। इसके बाद विधानसभा चुनाव के लिए टिकट की प्रक्रिया शुरू हो जाएगी। ऐसे में जिलाध्यक्ष रहते हुए खुद टिकट के दावेदार बने रहना उनके लिए आसान नहीं होगा। संगठन जिलाध्यक्ष से चुनाव जिताने की भी उम्मीद करता है। ऐसे में तिवारी के सामने जिलाध्यक्ष का पद और 2028 की विधानसभा टिकट में से एक चुनने जैसी स्थिति बन सकती है।
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पिरोनिया के सामने भी यही चुनौती
पूर्व विधायक और प्रदेश प्रवक्ता घनश्याम पिरोनिया के नाम पर भी चर्चा है। वह भांडेर विधानसभा सीट से फिर टिकट के दावेदार हैं। ऐसे में जिलाध्यक्ष बनने पर उनके सामने भी 2028 की टिकट को लेकर यही चुनौती होगी। पार्टी ऐसे चेहरे की तलाश में है जो नरोत्तम मिश्रा के प्रभाव से अलग संगठन को आगे बढ़ाने के साथ सामाजिक समीकरण भी साध सके।
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ब्राह्मण-दलित समीकरण अहम
आशुतोष तिवारी के नाम के साथ नरोत्तम के बाद ब्राह्मण और व्यापारी वर्ग के समीकरण को साधने की संभावना देखी जा रही है। वहीं घनश्याम पिरोनिया के जरिए दलित वोट बैंक को साधने की कोशिश हो सकती है। उपचुनाव में कांग्रेस के घनश्याम सिंह की जीत के बाद भाजपा के लिए दलित और अन्य पिछड़े वर्गों का समीकरण महत्वपूर्ण हो गया है। पार्टी 2028 से पहले इन सामाजिक समीकरणों को मजबूत करना चाहती है। दूसरी ओर, जिला अध्यक्ष पद से रघुवीर कुशवाह को हटाए जाने के बाद कुशवाह समाज का समीकरण भी चुनौती है। रघुवीर कुशवाह कह चुके है कि चुनाव से पहले इस्तीफा देने के बावजूद उन पर कार्रवाई नहीं हुई। चुनाव में पूरी मेहनत से काम करने के बावजूद पार्टी की हार का ठीकरा अब उन पर फोड़ा जा रहा है।
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कुशवाह समाज को साधना भी जरूरी
बता दें दतिया में करीब 35 हजार कुशवाह मतदाता बताए जाते हैं। ऐसे में पार्टी इस समाज को नाराज नहीं करना चाहेगी। पिछले विधानसभा चुनाव में ग्रामीण क्षेत्र में कुशवाह समाज की नाराजगी को भी नरोत्तम मिश्रा की हार के कारणों में गिना गया था। इसके बाद ही रघुवीर कुशवाह को ग्रामीण मंडल अध्यक्ष से जिला अध्यक्ष बनाया गया था।
निकाय चुनाव से पहले संगठन खड़ा करना चुनौती
भाजपा ने पूरे जिले की संगठनात्मक संरचना भंग कर दी है। ऐसे में दतिया के साथ सेवढ़ा और भांडेर में भी संगठन अब सक्रिय नहीं है। अगले साल नगरीय निकाय चुनाव प्रस्तावित हैं। पार्टी नहीं चाहती कि संगठन में लंबे समय तक चलने वाली खींचतान का असर चुनाव पर पड़े। इसलिए जिलाध्यक्ष के चयन में जातीय समीकरण, गुटीय संतुलन, 2028 की टिकट और आगामी निकाय चुनाव, चारों पहलुओं को ध्यान में रखा जा रहा है।
