बरकतउल्ला विश्वविद्यालय के नाम पर सियासी संग्राम: कांग्रेस, भाजपा, छात्र संगठन और हिंदू संगठन आमने-सामने
बरकतउल्ला विश्वविद्यालय का नाम बदलकर वाग्देवी भोजपाल विश्वविद्यालय किए जाने के प्रस्ताव पर विवाद गहरा गया है। कांग्रेस और छात्र संगठन इसे स्वतंत्रता सेनानी बरकतउल्ला भोपाली का अपमान बता रहे हैं, जबकि भाजपा और हिंदू संगठन इसे भोपाल की सांस्कृतिक विरासत से जुड़ा फैसला बता रहे हैं।
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
बरकतउल्ला विश्वविद्यालय का नाम बदलकर वाग्देवी भोजपाल विश्वविद्यालय किए जाने के प्रस्ताव ने प्रदेश की राजनीति गरमा दी है। विश्वविद्यालय की कार्यपरिषद द्वारा नाम परिवर्तन का प्रस्ताव पारित किए जाने के बाद कांग्रेस, भाजपा, छात्र संगठनों और हिंदू संगठनों के बीच तीखी बयानबाजी शुरू हो गई है। एक ओर भाजपा और हिंदू संगठन इसे भोपाल की सांस्कृतिक विरासत से जुड़ा फैसला बता रहे हैं, वहीं कांग्रेस और छात्र संगठन इसे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी बरकतउल्ला भोपाली का अपमान और वास्तविक मुद्दों से ध्यान भटकाने की राजनीति बता रहे हैं।
कांग्रेस ने बताया नाम बदलने की राजनीति
मध्यप्रदेश कांग्रेस कमेटी के प्रवक्ता विवेक त्रिपाठी ने नाम परिवर्तन का विरोध करते हुए कहा कि भाजपा सरकार शिक्षा, रोजगार और युवाओं से जुड़े मुद्दों पर विफल रही है, इसलिए नाम बदलने की राजनीति कर रही है। उन्होंने कहा कि बरकतउल्ला भोपाली स्वतंत्रता संग्राम के महान सेनानी थे, जिन्होंने विदेशों में रहकर भारत की आजादी के लिए संघर्ष किया। उनके योगदान को भुलाने का प्रयास दुर्भाग्यपूर्ण है। त्रिपाठी ने आरोप लगाया कि सरकार छात्रों के मुद्दों, शिक्षा माफियाओं के भ्रष्टाचार, व्यापमं और नीट जैसे विवादों से ध्यान हटाने के लिए भावनात्मक मुद्दे खड़े कर रही है। उनका कहना है कि यदि सरकार किसी देवी या ऐतिहासिक व्यक्तित्व के नाम पर संस्थान बनाना चाहती है तो नया विश्वविद्यालय स्थापित करे, न कि पुराने संस्थानों के नाम बदले।
भाजपा बोली- जनभावनाओं के अनुरूप फैसला
भाजपा प्रदेश प्रवक्ता अजय सिंह यादव ने कांग्रेस के आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि लंबे समय से बुद्धिजीवियों, प्रबुद्धजनों और आम नागरिकों की मांग रही है कि भोपाल विश्वविद्यालय का नाम राजा भोज और विद्या की देवी वाग्देवी से जोड़ा जाए। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय की कार्यपरिषद ने भी जनभावनाओं को ध्यान में रखकर प्रस्ताव पारित किया है। यादव ने कहा कि कांग्रेस तुष्टिकरण की राजनीति के कारण भोपाल की सांस्कृतिक विरासत और सनातन परंपरा का भी विरोध कर रही है। भाजपा सरकार सदैव जनभावनाओं के अनुरूप निर्णय लेती है और यह फैसला भी उसी दिशा में उठाया गया कदम है।
हिंदू संगठनों ने किया स्वागत
श्री हिंदू उत्सव समिति और संस्कृति बचाओ मंच ने प्रस्ताव का स्वागत करते हुए मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और विश्वविद्यालय प्रशासन का आभार व्यक्त किया है। संगठन के अध्यक्ष चंद्रशेखर तिवारी ने कहा कि वर्षों से विश्वविद्यालय का नाम बदलने की मांग की जा रही थी। तिवारी ने मांग की कि प्रदेश में मुगलकाल या आक्रांताओं से जुड़े नामों को भी बदला जाए। उन्होंने जहांगीराबाद, शाहजहानाबाद और अब्दुल्लागंज जैसे इलाकों के नाम बदलकर राष्ट्रभक्तों और क्रांतिकारियों के नाम पर रखने की मांग की। साथ ही हबीबगंज रेलवे स्टेशन का नाम रानी कमलापति किए जाने का हवाला देते हुए हबीबगंज थाने का नाम भी रानी कमलापति थाना करने की मांग उठाई।
यह भी पढ़ें-पानी का संकट चौथे दिन भी बरकरार, VIP इलाकों में पहुंचे टैंकर, जनता परेशान
छात्र संगठन एआईडीएसओ ने भी जताया विरोध
छात्र संगठन एआईडीएसओ ने भी नाम परिवर्तन का विरोध किया है। संगठन की भोपाल जिला अध्यक्ष सोनम शर्मा ने कहा कि बरकतउल्ला विश्वविद्यालय का नाम स्वतंत्रता आंदोलन के क्रांतिकारी बरकतउल्ला भोपाली की स्मृति से जुड़ा है। उनका नाम हटाना स्वतंत्रता सेनानियों और क्रांतिकारियों का अपमान है। संगठन ने कहा कि विश्वविद्यालय में स्टाफ की कमी, परीक्षा परिणामों में देरी, प्रशासनिक अनियमितताओं और शैक्षणिक समस्याओं जैसे मुद्दे ज्यादा महत्वपूर्ण हैं। सरकार को इन समस्याओं का समाधान करना चाहिए, न कि नाम बदलने जैसे राजनीतिक फैसलों पर ध्यान देना चाहिए।
नाम परिवर्तन के पक्ष में क्या हैं तर्क
नाम परिवर्तन के समर्थकों का कहना है कि राजा भोज का भोपाल, मालवा और मध्यप्रदेश की सांस्कृतिक पहचान में बड़ा योगदान रहा है। भोपाल का प्राचीन नाम भोजपाल माना जाता है और विद्या की देवी वाग्देवी का संबंध राजा भोज द्वारा स्थापित भोजशाला की ज्ञान परंपरा से जोड़ा जाता है। ऐसे में विश्वविद्यालय का नाम वाग्देवी भोजपाल विश्वविद्यालय करना क्षेत्र की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत को सम्मान देने वाला कदम होगा।
यह भी पढ़ें-मानसून की दस्तक से पहले मौसम मेहरबान, 39 जिलों में आंधी-बारिश का अलर्ट, होगी ओलावृष्टि
अब सरकार के अंतिम फैसले पर नजर
कार्यपरिषद से प्रस्ताव पारित होने के बाद अब अंतिम निर्णय शासन स्तर पर होना है। हालांकि प्रस्ताव ने फिलहाल शिक्षा से ज्यादा राजनीतिक और वैचारिक बहस को जन्म दे दिया है। आने वाले दिनों में यह मुद्दा प्रदेश की राजनीति में और अधिक चर्चा का विषय बन सकता है।

कमेंट
कमेंट X