फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Madhya Pradesh ›   Bhopal News ›   Resident doctors falling ill themselves: 88% suffer from burnout, stress driving up suicide cases—survey revea

खुद बीमार पड़ रहे रेजिडेंट डॉक्टर: 88% बर्नआउट के शिकार, तनाव से बढ़ रहे आत्महत्या के मामले, सर्वे में खुलासा

Sat, 27 Jun 2026 06:13 PM IST
Sandeep Kumar Tiwari न्यूज डेस्क,अमर उजाला, भोपाल
न्यूज डेस्क,अमर उजाला, भोपाल Published by: Sandeep Kumar Tiwari Updated Sat, 27 Jun 2026 06:13 PM IST
सार

फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया मेडिकल एसोसिएशन के सर्वे में खुलासा हुआ है कि देश के 88% रेजिडेंट डॉक्टर बर्नआउट का शिकार हैं। लंबी ड्यूटी, नींद की कमी और मानसिक तनाव के कारण हर दूसरा डॉक्टर रेजिडेंसी छोड़ने का विचार कर चुका है, जबकि 17% ने सेल्फ हार्म जैसे विचार आने की बात स्वीकार की। मध्य प्रदेश में भी ऐसे हालात के बीच डॉक्टरों की आत्महत्या के कई मामले सामने आ चुके हैं।

विज्ञापन
Resident doctors falling ill themselves: 88% suffer from burnout, stress driving up suicide cases—survey revea
सामने आए चौकाने वाले आंकड़े - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

देशभर के रेजिडेंट डॉक्टर अत्यधिक कार्यभार, 36-36 घंटे की लगातार ड्यूटी, नींद की कमी और मानसिक तनाव के बीच काम कर रहे हैं। फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया मेडिकल एसोसिएशन (फाइमा) के रिव्यू मेडिकल सिस्टम (आरएमएस 2.0) सर्वे में सामने आया है कि 87.5 फीसदी रेजिडेंट डॉक्टर बर्नआउट का शिकार हैं, जबकि 87.8 फीसदी डॉक्टर पर्याप्त नींद नहीं ले पा रहे हैं। सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि हर दूसरा डॉक्टर रेजिडेंसी छोड़ने के बारे में सोच चुका है, जबकि करीब 17 फीसदी डॉक्टरों ने काम के दबाव में खुद को नुकसान पहुंचाने (सेल्फ हार्म) जैसे विचार आने की बात स्वीकार की है। देश भर के 1,260 रेजिडेंट डॉक्टरों पर किए गए इस सर्वे में 61.8 फीसदी डॉक्टरों ने बताया कि वे एक बार में 36 घंटे से अधिक लगातार ड्यूटी करते हैं, जबकि 63.7 फीसदी डॉक्टरों को लंबी ड्यूटी के बाद जरूरी आराम भी नहीं मिलता। सर्वे के अनुसार 46.7 फीसदी डॉक्टर हर सप्ताह 80 घंटे से अधिक और 20.3 फीसदी डॉक्टर 100 घंटे से ज्यादा काम कर रहे हैं।
विज्ञापन


मध्य प्रदेश की स्थिति भी चिंताजनक
जूनियर डॉक्टर्स एसोसिएशन (जेडीए) मध्य प्रदेश के उपाध्यक्ष और एफएआईएमए के नेशनल सेक्रेटरी डॉ. यशवीर सिंह गुर्जर ने बताया कि सर्वे में मध्य प्रदेश के करीब 400 पीजी रेजिडेंट डॉक्टर शामिल हुए थे और राज्य के आंकड़े भी राष्ट्रीय स्तर के लगभग समान हैं। उन्होंने कहा कि यदि केवल क्लीनिकल विभागों की बात करें तो बर्नआउट और स्लीप डेप्रिवेशन के मामले 97 से 98 फीसदी तक पहुंच जाते हैं। उन्होंने कहा कि 36-36 घंटे की ड्यूटी को मेडिकल सिस्टम का कल्चर मान लिया गया है, जबकि यह पूरी तरह अमानवीय है। सर्वे में 17 फीसदी डॉक्टरों द्वारा सेल्फ हार्म के विचार स्वीकार करना बेहद गंभीर संकेत है और इस पर तत्काल सुधार की जरूरत है।
विज्ञापन


डॉक्टर बोले- 24 घंटे जागा व्यक्ति शराब के नशे जैसी स्थिति में
इंटर्न डॉ. सिद्धार्थ कुमार राय ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति 24 घंटे लगातार नहीं सोता तो उसकी कार्यक्षमता लगभग उस व्यक्ति जैसी हो जाती है जिसने शराब पी रखी हो। ऐसे में 36 घंटे लगातार ड्यूटी करने वाले डॉक्टर से मरीजों का इलाज कराना मरीजों की सुरक्षा के लिहाज से भी बड़ा जोखिम है।डॉ. अभिषेक अवस्थी ने कहा कि लंबी ड्यूटी, वरिष्ठों का दबाव, मरीजों के परिजनों का व्यवहार और लगातार काम के कारण डॉक्टर मानसिक रूप से थक जाते हैं, जिससे उनकी कार्यक्षमता प्रभावित होती है। इंटर्न डॉ. आयुष सिंह का कहना है कि लगातार काम करने वाले डॉक्टरों को बेहतर स्टाइपेंड, उचित मुआवजा और पर्याप्त आराम मिलना चाहिए, ताकि वे बेहतर मानसिक स्थिति में मरीजों का इलाज कर सकें। जनरल मेडिसिन विभाग के डॉ. आकाश ने कहा कि समस्या का स्थायी समाधान रेजिडेंट डॉक्टरों की संख्या बढ़ाने में है। प्रत्येक विभाग में मरीजों की संख्या के अनुसार रेजिडेंट सीटें बढ़ाई जाएं, तभी कार्यभार कम होगा।
विज्ञापन
विज्ञापन


सिर्फ डॉक्टर नहीं, मरीज भी प्रभावित
एफएआईएमए का कहना है कि स्टाफ की कमी, कम स्टाइपेंड, मानसिक स्वास्थ्य सहायता का अभाव, बॉन्ड की बाध्यता और बढ़ते कार्यभार का असर सिर्फ डॉक्टरों पर नहीं, बल्कि मेडिकल शिक्षा और मरीजों की सुरक्षा पर भी पड़ रहा है। एफएआईएमए का कहना है कि यदि रेजिडेंट डॉक्टरों की कार्यस्थितियों में जल्द सुधार नहीं हुआ, तो इसका सीधा असर देश की स्वास्थ्य व्यवस्था, मेडिकल शिक्षा और मरीजों की सुरक्षा पर पड़ेगा।

यह भी पढ़ें- मानसून की चाल धीमी, तीन दिन से नहीं बढ़ा सिस्टम, प्रदेश के 43 जिलों में आज बारिश का अलर्ट


भोपाल में सामने आए दर्दनाक मामले
1- एम्स भोपाल की असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. रश्मि वर्मा ने दिसंबर 2025 में एनेस्थीसिया का ओवरडोज लिया था। 25 दिन बाद जनवरी 2026 में उनकी मौत हो गई। जांच में विभाग के भीतर टॉक्सिक वर्क कल्चर और मानसिक प्रताड़ना के आरोप सामने आए, जिसके बाद विभागाध्यक्ष  को हटाया गया।

2- गांधी मेडिकल कॉलेज, भोपाल की पीजी छात्रा डॉ. बाला सरस्वती ने 2023 में आत्महत्या से पहले सुसाइड नोट में 36-36 घंटे ड्यूटी, छुट्टी नहीं मिलने और मानसिक प्रताड़ना का जिक्र किया था। घटना के बाद प्रदेशभर के जूनियर डॉक्टर हड़ताल पर चले गए थे।
3- गांधी मेडिकल कॉलेज की ही पीजी छात्रा डॉ. आकांक्षा मरकाम तथा फरवरी 2026 में प्रथम वर्ष की एक पीजी छात्रा की मौत के मामलों में भी अत्यधिक कार्यभार, तनाव और अवसाद की बातें सामने आईं।

यह भी पढ़ें-पटवारी बोले-10 साल में 85 पेपर लीक, 2 करोड़ से ज्यादा अभ्यर्थियों का भविष्य दांव पर


चिकित्सकों प्रमुख मांगें
- रेजिडेंट डॉक्टरों के ड्यूटी घंटों का राष्ट्रीय स्तर पर नियमन।
- 36 घंटे से अधिक लगातार ड्यूटी पर रोक।
- लंबी ड्यूटी के बाद अनिवार्य विश्राम।
- मेडिकल कॉलेजों में पर्याप्त रेजिडेंट डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों की भर्ती।
- गोपनीय मानसिक स्वास्थ्य सहायता और काउंसिलिंग।
- सभी राज्यों में समय पर समान स्टाइपेंड।
- प्रभावी शिकायत निवारण प्रणाली।
- बॉन्ड नियमों को तर्कसंगत बनाना।

 
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed