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Jabalpur News: वन अधिकारियों की सुरक्षा और शिकारियों के डेटा पर हाईकोर्ट गंभीर, केंद्र से जवाब तलब

Sun, 02 Aug 2026 08:00 AM IST
जबलपुर ब्यूरो न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जबलपुर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जबलपुर Published by: जबलपुर ब्यूरो Updated Sun, 02 Aug 2026 08:00 AM IST
सार

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने वन अधिकारियों की सुरक्षा, हथियारों के उपयोग और शिकारियों की सीडीआर व लाइव लोकेशन उपलब्ध कराने के मुद्दे पर केंद्रीय गृह मंत्रालय को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है।

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Weapons have been provided, but the Forest Department is restricted from using them.
जबलपुर हाईकोर्ट।

विस्तार

जबलपुर हाईकोर्ट में संज्ञान याचिका की सुनवाई के दौरान वन क्षेत्रों में सक्रिय शिकारियों और शरारती तत्वों की लोकेशन तथा मोबाइल डेटा उपलब्ध नहीं कराए जाने और कार्रवाई के दौरान वन अधिकारियों व कर्मचारियों की सुरक्षा का मुद्दा उठाया गया। याचिका की सुनवाई के दौरान कोर्ट मित्र की ओर से हाईकोर्ट को बताया गया कि वन अधिकारियों और कर्मचारियों को हथियार तो दिए जाते हैं, लेकिन उनके इस्तेमाल पर इतनी पाबंदियां हैं कि जरूरत पड़ने पर भी वे उनका उपयोग करने से डरते हैं।

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हाईकोर्ट के जस्टिस आनंद पाठक और जस्टिस बी.पी. शर्मा की युगलपीठ ने उठाए गए मुद्दों को गंभीरता से लेते हुए केंद्रीय गृह मंत्रालय को अनावेदक बनाते हुए नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।

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धार जिले में बाओबाब के पेड़ काटने, उनकी बिक्री और परिवहन से संबंधित प्रकाशित खबर का संज्ञान लेते हुए हाईकोर्ट ने इस मामले की सुनवाई जनहित याचिका के रूप में करने के आदेश दिए थे। याचिका की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने राज्य जैव विविधता बोर्ड को निर्देश दिया कि प्रदेश में स्थित बाओबाब के पेड़ों की तस्वीरों सहित स्टेटस रिपोर्ट प्रस्तुत की जाए।

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कोर्ट मित्र अधिवक्ता अंशुमान सिंह ने युगलपीठ को बताया कि जांच के दौरान केंद्र सरकार के वन विभाग ने वन्यजीव संरक्षण अधिनियम के तहत वाइल्ड लाइफ क्राइम कंट्रोल ब्यूरो को मोबाइल स्टेटिक डेटा के उपयोग की अनुमति नहीं दी है, जबकि अन्य जांच एजेंसियां मोबाइल स्टेटिक डेटा का उपयोग कर सकती हैं।

खंडवा में हुई घटना का हुआ जिक्र
कोर्ट मित्र अधिवक्ता ने पिछली सुनवाई के दौरान खंडवा में हुई घटना का उल्लेख करते हुए बताया कि वन विभाग के अधिकारी और कर्मचारी अतिक्रमण हटाने गए थे। इस दौरान अतिक्रमणकारियों ने उन पर धारदार हथियारों से हमला कर दिया, जिसमें लगभग 40 कर्मचारी गंभीर रूप से घायल हो गए। उन्होंने हथियारों का इस्तेमाल इसलिए नहीं किया, क्योंकि उन्हें आशंका थी कि पुलिस उनके खिलाफ मामला दर्ज कर सकती है।

उन्होंने मांग की कि वन विभाग के अधिकारियों और कर्मचारियों को सीआरपीसी की धारा 197 के तहत सुरक्षा प्रदान की जाए। यदि वे गैरकानूनी गतिविधियों को रोकने के लिए हथियार का इस्तेमाल करते हैं, तो उचित जांच के बाद ही उनके खिलाफ कोई दंडात्मक कार्रवाई की जाए। उन्होंने बताया कि असम और ओडिशा ने इस संबंध में संशोधन भी किए हैं।

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वन अपराधों पर प्रभावी रोक लगाने के लिए वन अधिकारियों और कर्मचारियों को शिकारियों या बदमाशों की सीडीआर और मोबाइल टावर की लाइव लोकेशन उपलब्ध नहीं कराई जाती। जांच के दौरान भी उन्हें यह जानकारी नहीं मिलती। ऐसी सुविधा उपलब्ध होने से जांच अधिक प्रभावी हो सकती है और जंगलों व वन्यजीवों की सुरक्षा के लिए बेहतर रोकथाम के उपाय किए जा सकते हैं।

सभी हितधारकों को एक साझा मंच पर आना चाहिए
सरकार की ओर से बताया गया कि सीडीआर और टावर की लाइव लोकेशन का विषय केंद्र सरकार के अधिकार क्षेत्र से संबंधित है। युगलपीठ ने अपने आदेश में कहा कि पर्यावरण, वन और वन्यजीवों के संरक्षण के लिए सभी हितधारकों को एक साझा मंच पर आना चाहिए। केंद्र और राज्य सरकार दोनों को उठाए गए मुद्दों पर सकारात्मक और ठोस समाधान निकालना चाहिए। सुनवाई के बाद युगलपीठ ने केंद्रीय गृह मंत्रालय को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है।

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