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Singrauli: बारूद के ढेर पर बैगा परिवार! सिंगरौली में NCL की खदानों के बीच फंसी सांसें, जिम्मेदार बने तमाशबीन

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, सिंगरौली Published by: सिंगरौली ब्यूरो Updated Wed, 06 May 2026 08:30 AM IST
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सार

सिंगरौली में एनसीएल की जयंत परियोजना के बीच फंसे बैगा परिवार विस्थापन न होने के कारण बेहद खतरनाक हालात में जीवन जीने को मजबूर हैं। घरों के चारों ओर हो रही भारी ब्लास्टिंग और मशीनों की गड़गड़ाहट के बीच लोग रोज मौत के साए में रह रहे हैं।

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ब्लास्टिंग के साए में जी रहे बैगा परिवार - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

मध्य प्रदेश के सिंगरौली जिले से एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने इंसानियत को झकझोर कर रख दिया है। भारत सरकार की सार्वजनिक उपक्रम कंपनी नार्दर्न कोल फील्ड्स लिमिटेड (एनसीएल) की जयंत परियोजना क्षेत्र में रहने वाले बैगा समाज के दर्जनों परिवार आज भी नारकीय जीवन जीने को मजबूर हैं। हैरानी की बात यह है कि जिला प्रशासन और अनुसूचित जनजाति आयोग जैसे जिम्मेदार संस्थान भी इस गंभीर मामले पर चुप्पी साधे हुए हैं।


खदान के बीच फंसे बैगा परिवार, चारों ओर ब्लास्टिंग

जानकारी के अनुसार, एनसीएल की जयंत परियोजना के प्रभावित क्षेत्र में बैगा समाज के लोग वर्षों से निवास कर रहे हैं और यहीं से अपनी जीविका चला रहे हैं। लेकिन विस्थापन और पुनर्वास का मामला अब तक सुलझ नहीं सका है। इसके चलते एनसीएल प्रबंधन ने उनके घरों के चारों ओर खदान का विस्तार कर दिया है। स्थिति इतनी भयावह है कि इन परिवारों के घरों के आसपास भारी मशीनों की गड़गड़ाहट और बारूदी विस्फोट (ब्लास्टिंग) लगातार जारी है। परिवार के लोग हर पल जान जोखिम में डालकर जिंदगी और मौत के बीच जीने को मजबूर हैं।
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खैरात बांटकर जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ने का आरोप

स्थानीय लोगों का आरोप है कि एनसीएल प्रबंधन एक ओर क्षेत्र में विकास और उत्थान के बड़े-बड़े दावे करता है, वहीं दूसरी ओर खदान में फंसे बैगा परिवारों की हालत बेहद दयनीय बनी हुई है। इन परिवारों की सुरक्षा और पुनर्वास को लेकर प्रबंधन पूरी तरह लापरवाह नजर आ रहा है। लोगों का कहना है कि कंपनी द्वारा कभी-कभी राहत या सहायता के नाम पर खैरात बांटकर वाहवाही लूटने की कोशिश की जाती है, लेकिन स्थायी समाधान की दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया जा रहा।

जनप्रतिनिधियों और प्रशासन की उदासीनता

इस गंभीर मुद्दे पर स्थानीय जनप्रतिनिधियों की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। बताया जा रहा है कि अब तक किसी भी जनप्रतिनिधि ने इन परिवारों को न्याय दिलाने के लिए आगे आने की पहल नहीं की। स्थानीय लोगों का आरोप है कि प्रशासनिक अधिकारी भी एनसीएल प्रबंधन से सुविधाएं लेते रहे हैं, लेकिन प्रभावित परिवारों की परेशानियों को नजरअंदाज किया गया। इसका खामियाजा उन गरीब परिवारों को भुगतना पड़ रहा है, जो आज भी खदानों के बीच अपने पशुओं के साथ जोखिम भरी जिंदगी जी रहे हैं। सबसे चिंताजनक बात यह है कि अनुसूचित जनजाति आयोग के जिम्मेदार भी इस पूरे मामले से अनजान बने हुए हैं। जबकि यह मामला सीधे तौर पर आदिवासी समुदाय के अधिकारों और सुरक्षा से जुड़ा हुआ है। वहीं, अधिकारियों का कहना है कि लोगों को विस्थापित करने के बाद घर उपलब्ध करा दिए गए हैं, लेकिन लोग जगह खाली नहीं कर रहे हैं।
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