फाल्गुन की मस्ती और रंगों की बरसात के साथ सहरसा जिले में होली का पर्व हर्षोल्लास और उमंग के साथ मनाया गया। हर गली, हर नुक्कड़ और हर चौराहे पर रंगों की धूम थी। सुबह से ही बच्चों, युवाओं और बुजुर्गों की टोली रंग और पिचकारियों से एक-दूसरे को रंगते नजर आई। होली की मस्ती में डूबे लोगों की खुशी चेहरे से झलक रही थी। दोपहर तक रंगों का दौर चलता रहा, जिसके बाद स्नान और विश्राम के बाद फिर शाम में गुलाल और अबीर की होली शुरू हो गई जो देर रात तक चलती रहेगी। इस दौरान लोगों ने घरों में पकवानों का आनंद लिया, एक-दूसरे के घर जाकर मुंह मीठा किया और बड़ों का आशीर्वाद लिया। होली का यह पर्व केवल रंगों का नहीं बल्कि आपसी वैर भाव को भुलाकर गले मिलने और प्रेम का प्रतीक बन गया।
Holi 2025: बिहार में यहां होली-जुमा विवाद बेअसर, गुलाल संग मोहब्बत और भाईचारे का भी पर्व बना रंगों का त्योहार
Holi 2025: मुस्लिम राष्ट्रीय मंच के क्षेत्रीय संयोजक अधिवक्ता लुकमान अली ने होली को लेकर एक खूबसूरत संदेश दिया। उन्होंने कहा कि हिन्दुस्तानी मुसलमान जुमा की नमाज भी पढ़ेगा और होली भी मनाएगा। यह त्योहार सिर्फ रंगों का नहीं, बल्कि इंसानियत, भाईचारे और मोहब्बत का पर्व है।
इस वर्ष होली और जुमा एक साथ पड़ने के कारण पुलिस प्रशासन भी पूरी तरह चौकन्ना रहा। गली-मोहल्लों, चौक-चौराहों और मस्जिदों के आस-पास पुलिस की गश्ती टीम नजर आई। कनीय से लेकर वरीय पुलिस अधिकारी तक सड़कों पर तैनात रहे, जिससे हुड़दंगियों पर नियंत्रण रखा जा सके। बाइक सवारों की गतिविधियों पर खास नजर रखी गई, जिससे होली का उल्लास शांति पूर्ण बना रहा।
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बच्चों में दिखा सबसे ज्यादा उत्साह
बच्चों के बीच होली का उत्साह देखते ही बनता था। सफेद कपड़े, रंगीन पिचकारियां, सिर पर रंग-बिरंगी टोपियां और चेहरे पर विभिन्न प्रकार के मास्क, बच्चों ने होली को और भी रंगीन बना दिया। छोटे-छोटे बच्चे घर के बाहर रंग घोलकर पिचकारियों से राहगीरों को भिगोते नजर आए। कहीं स्पाइडरमैन तो कहीं शक्तिमान और नरेंद्र मोदी के मास्क पहने बच्चे होली का आकर्षण बने रहे।
परंपरा के रंग में रची-बसी रही होली
होली के मौके पर वर्षों पुरानी परंपराएं भी पूरी श्रद्धा से निभाई गईं। ठंडाई और भांग की विशेष व्यवस्था के साथ पकवानों और व्यंजनों की महक मोहल्लों में घुली रही। मटन और चिकन की दुकानों पर सुबह से ही भारी भीड़ देखी गई। जहां मटन की कीमत 700 से 800 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गई, फिर भी खरीददारों की भीड़ बनी रही।
होलिका दहन के साथ शुरू हुई त्योहार की धारा
होली से एक दिन पहले गुरुवार रात को होलिका दहन की परंपरा निभाई गई, जिसका धार्मिक और पौराणिक महत्व है। प्रह्लाद की भक्ति की विजय और बुराई के अंत की प्रतीक यह परंपरा वर्षों से चली आ रही है। नगरवासियों ने अग्नि के चारों ओर परिक्रमा कर अपने मन की बुराइयों को समाप्त करने का संकल्प लिया।
बनगांव में पांच प्रकार की होली बनी विशेष आकर्षण
बनगांव की होली अपनी विशिष्टता के लिए जानी जाती है। कला संस्कृति पदाधिकारी स्नेहा झा ने बताया कि बनगांव में पानी वाली, मिट्टी वाली, रंग वाली, गुलाल वाली और सुरों की होली खेली जाती है। साथ ही वहां त्रिदिवसीय शास्त्रीय संगीत समारोह की समृद्ध परंपरा है, जो कला संस्कृति और युवा विभाग तथा जिला प्रशासन के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित होता है। इस दौरान देश के विभिन्न हिस्सों से आए कलाकार अपनी सुरमयी प्रस्तुतियों से लोगों को भावविभोर करते हैं।
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मोहब्बत के रंग से नफरत को दी मात
मुस्लिम राष्ट्रीय मंच के क्षेत्रीय संयोजक अधिवक्ता लुकमान अली ने भी होली को लेकर एक खूबसूरत संदेश दिया। उन्होंने कहा कि हिन्दुस्तानी मुसलमान जुमा की नमाज भी पढ़ेगा और होली भी मनाएगा। यह त्योहार सिर्फ रंगों का नहीं, बल्कि इंसानियत, भाईचारे और मोहब्बत का पर्व है। उन्होंने कहा कि मजहब इंसानियत से बड़ा नहीं होता और होली के जरिए हम सभी को दिलों को जोड़ने की पहल करनी चाहिए।
उन्होंने बताया कि हिन्दुस्तान की साझा तहजीब में होली का ऐतिहासिक स्थान है। चाहे हजरत निजामुद्दीन औलिया हों या अजमेर शरीफ, सभी ने इस त्योहार को अपनाया। नवाब वाजिद अली शाह ने तो इसे ‘ईद-ए-गुलाबी’ का नाम दिया था, जहां लोग गले मिलते और मोहब्बत का पैगाम फैलाते थे।
रंगों में घुला भाईचारा, बना मिसाल
इस होली ने एक बार फिर साबित कर दिया कि सांप्रदायिक सौहार्द और सामाजिक एकता हमारी असली ताकत है। हर गली, हर मोहल्ला, हर मजहब के लोग मिलकर रंगों में डूबे और एक-दूसरे की खुशियों में शामिल हुए। नफरत की राजनीति को जवाब देते हुए इस बार मोहब्बत के रंग ने सबको रंग दिया।