महज चार साल की उम्र में मां का आंचल छूटा। कुछ समझ पाते इससे पहले ही पिता का साया भी सर से उठ गया। नौकरी लगने के बाद भांजे-भांजी को पढ़ा सकें इसलिए कबड्डी खेलना शुरू किया। रातभर स्टेडियम में गली में कुर्सी रखकर, डंडा गाड़कर उन्हें खिलाड़ी समझकर अभ्यास करने पर सुने लोगों के तंज लेकिन जिद और जुनून इतना कि हर मुश्किल पार कर भारतीय कबड्डी टीम का नेतृत्व हासिल कर देश को गोल्ड मेडल दिलाया। यह कहानी है रोहतक के चमारियां गांव निवासी सैग में भारतीय कबड्डी टीम के कप्तान दीपक निवास हुड्डा की।
कभी डंडे गाड़कर करते थे अभ्यास, अब हैं भारतीय टीम के कप्तान, पढ़ें दीपक हुड्डा की प्रेरक कहानी
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
ऑलरांडर खिलाड़ी दीपक हुड्डा शुक्रवार को विशेष संवाद के लिए अमर उजाला कार्यालय पहुंचे, जहां उन्होंने अपने जीवन के संघर्ष, कामयाबी और अनुभवों को साझा किया। दीपक ने बताया कि जब वह चार साल के थे तो मां का निधन हो गया। पिता मामूली किसान थे, दिनभर खेतों में मेहनत मजदूरी कर जैसे-तैसे परिवार का पेट पालते थे। परिवार में पिता के अलावा एक शादीशुदा बहन अपने दो बच्चों के साथ रहती थी। जैसे तैसे जिंदगी चल ही रही थी कि 12वीं कक्षा में सिर से पिता का साया उठ गया। जिससे घर में कमाने वाला कोई नहीं रहा। बहन के बच्चों को पढ़ाने के लिए उन्होंने अपनी पढ़ाई छोड़ी और अच्छी नौकरी के लिए कबड्डी खेलना शुरू किया।
नौकरी के लिए दिन-रात अभ्यास और संघर्ष से उनका जुनून देश के लिए खेलने में बदल गया और उनकी जिद ने इस मुकाम तक पहुंचाया कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत को पांच गोल्ड और एक ब्रांज मेडल दिलाने में अहम योगदान दिया। उन्होंने बताया कि उनकी कामयाबी में सबसे पहले गुरु कोच जगमाल सिंह और इसके बाद कोच बलवान सिंह, कोच असन कुमार और जयबीर शर्मा का सहयोग रहा है।
रात को अकेले करते थे अभ्यास
दीपक रात में सभी खिलाड़ियों का अभ्यास खत्म होने के बाद गली स्टेडियम में अकेले ही खेलते थे। लोग कहते थे कि पागल हो गया क्या लेकिन वह कभी उनकी बातों से मायूस नहीं हुआ। रात को स्टेडियम में या गली में या फिर कच्चे मैदान में कुर्सी रखकर, डंडा गाड़कर या फिर कोई और टारगेट रखकर उसी को इंसान समझकर अभ्यास करते थे। दोपहर में भी सीढ़ियों पर उतरना चढ़ना अपनी गति बढ़ाने के लिए अभ्यास करते थे। दीपक ने बताया कि शुरुआती प्रतियोगिताओं में बहुत बार होता था कि एक भी प्वाइंट नहीं मिला, जिससे वह दिनभर निराश रहता था लेकिन रात को अपनी कमियों पर मंथन करके उनको सुधारने के लिए अभ्यास को अधिक टाइम देता था।
दीपक ने बताया कि जब उन्होंने कबड्डी खेलना शुरू किया तो वह सुबह शाम अभ्यास करता था और घर चलाने के लिए दिन में स्कूल में अध्यापन का कार्य और उसके बाद खेतों में कार्य करता था। उन्होंने खुद दो एकड़ में कपास की खेती की। दीपक की शुरू से ही पढ़ाई में रुचि थी। उनके पसंदीदा विषय गणित और अंग्रेजी थे। दसवीं कक्षा में उन्होंने मेरिट प्राप्त की। गणित में 94 अंक प्राप्त किए। उन्हें इसी कारण साइकिल भी इनाम में मिली, लेकिन समय की मार ऐसी पड़ी की 12वीं कक्षा में पिता के देहांत के बाद पढ़ाई छोड़नी पड़ी, लेकिन फिर भी उन्होंने डिस्टेंस से पढ़ाई जारी रखी और अब एमडीयू से एमए तक की पढ़ाई कर चुके हैं। दीपक के गांव में खेल का कुछ खास माहौल नहीं था। वह सुबह तीन बजे उठकर ट्रेनिंग करते और सात बजे स्कूल जाते फिर कुछ समय खेत में देते। उन्होंने 29 किमी की दूरी तय कर सोनीपत के रिंडाना गांव जाकर कोच जगमाल सिंह नरवाल के पास अभ्यास शुरू किया। सप्ताह में दो या तीन दिन वहां प्रैक्टिस करके आते थे।
झारखंड से खेला पहला नेशनल, बने बेस्ट प्लेयर, पहले प्रो लीग में दूसरे सबसे महंगे खिलाड़ी बने
दीपक ने बताया कि जनवरी 2014 में उन्होंने पहला सीनियर नेशनल झारखंड से खेला, जिससे ही उन्हें पहचान मिली। झारखंड में कबड्डी कम होने के कारण वहां तीन चार हरियाणा के ही थे। टीम बाहर हुई लेकिन फिर भी वह नेशनल का बेस्ट प्लेयर बना, तीन मैच में ही सबसे अच्छे प्रदर्शन ने उन्हें यह मुकाम दिलाया। इसी की बदौलत वह नेशनल कैंप में चुने गए और 2014 में ही पहले प्रो-लीग में 12 लाख 60 हजार में खरीदे गए, जिसने उनको एक नई पहचान दी। वह नेशनल में राजस्थान की तरफ से भी खेले हैं।
ये है उपलब्धियां
- फरवरी 2016 सैग स्वर्ण पदक।
- अक्तूबर 2016 विश्वकप में स्वर्ण पदक।
- 2017 ईरान में एशियन चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक।
- 2018 दुबई मास्टर कप में स्वर्ण पदक।
- 2018 एशियन गेम्स में कांस्य पदक।
- 2019 में साउथ एशियन गेम्स में बतौर कप्तान स्वर्ण पदक।