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Uttarakhand: दिवाली के 11वें दिन यहां मनता है रोशनी का त्योहार, जानें क्या है इगास और कैसे मनाते हैं उत्सव

Wed, 26 Oct 2022 12:34 AM IST
अलका त्यागी अमर उजाला नेटवर्क, देहरादून
अमर उजाला नेटवर्क, देहरादून Published by: अलका त्यागी Updated Wed, 26 Oct 2022 12:34 AM IST
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Uttarakhand Igas Festival Recognition and How its celebrate after 11 days of diwali
इगास - फोटो : अमर उजाला फाइल फोटो

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने मंगलवार को ट्वीटर पर गढ़वाली में इगास-बग्वाल की राजकीय छुट्टी की जानकारी साझा की। दिवाली के 11वें दिन यानी एकादशी को उत्तराखंड में इगास यानी बूढ़ी दिवाली मनाने का रिवाज है। यह दूसरा मौका होगा जब उत्तराखंड में लोकपर्व इगास को लेकर अवकाश घोषित किया गया। इससे पूर्व पिछले वर्ष भी मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने इगास पर राजकीय अवकाश की घोषणा की थी। तो चलिए जानते हैं ये इगास पर्व क्या है और इसकी क्या मान्यता है।



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उत्तराखंड के गढ़वाल में  सदियों से दिवाली को बग्वाल के रूप में मनाया जाता है। कुमाऊं के क्षेत्र में इसे बूढ़ी दीपावली कहा जाता है। इस पर्व के दिन सुबह मीठे पकवान बनाए जाते हैं। रात में स्थानीय देवी-देवताओं की पूजा अर्चना के बाद भैला जलाकर उसे घुमाया जाता है और ढोल नगाड़ों के साथ आग के चारों ओर लोक नृत्य किया जाता है। 

Uttarakhand Igas Festival Recognition and How its celebrate after 11 days of diwali
इगास - फोटो : अमर उजाला फाइल फोटो

मान्यता है कि जब भगवान राम 14 वर्ष बाद लंका विजय कर अयोध्या पहुंचे तो लोगों ने दिए जलाकर उनका स्वागत किया और उसे दीपावली के त्योहार के रूप में मनाया। कहा जाता है कि गढ़वाल क्षेत्र में लोगों को इसकी जानकारी 11 दिन बाद मिली। इसलिए यहां पर दिवाली के 11 दिन बाद यह इगास मनाई जाती है।

Uttarakhand Igas Festival Recognition and How its celebrate after 11 days of diwali
इगास - फोटो : अमर उजाला फाइल फोटो

वहीं, सबसे प्रचलित मान्यता के अनुसार गढ़वाल के वीर भड़ माधो सिंह भंडारी टिहरी के राजा महीपति शाह की सेना के सेनापति थे। करीब 400 साल पहले राजा ने माधो सिंह को सेना लेकर तिब्बत से युद्ध करने के लिए भेजा। इसी बीच बग्वाल (दिवाली) का त्यौहार भी था, परंतु इस त्योहार तक कोई भी सैनिक वापस न आ सका। सबने सोचा माधो सिंह और उनके सैनिक युद्ध में शहीद हो गए, इसलिए किसी ने भी दिवाली (बग्वाल) नहीं मनाई। लेकिन दीपावली के ठीक 11वें दिन माधो सिंह भंडारी अपने सैनिकों के साथ तिब्बत से दवापाघाट युद्ध जीत वापस लौट आए। इसी खुशी में दिवाली मनाई गई।

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Uttarakhand Igas Festival Recognition and How its celebrate after 11 days of diwali
इगास - फोटो : अमर उजाला फाइल फोटो

खास बात ये है कि यह पर्व भैलो खेलकर मनाया जाता है। तिल, भंगजीरे, हिसर और चीड़ की सूखी लकड़ी के छोटे-छोटे गठ्ठर बनाकर इन्हें विशेष रस्सी से बांधकर भैलो तैयार किया जाता है। बग्वाल के दिन पूजा अर्चना कर भैलो का तिलक किया जाता है। फिर ग्रामीण एक स्थान पर एकत्रित होकर भैलो खेलते हैं। भैलो पर आग लगाकर इसे चारों ओर घुमाया जाता है।

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Uttarakhand Igas Festival Recognition and How its celebrate after 11 days of diwali
इगास - फोटो : अमर उजाला फाइल फोटो

कई ग्रामीण भैलो से करतब भी दिखाते हैं।  पारंपरिक लोकनृत्य चांछड़ी और झुमेलों के साथ भैलो रे भैलो, काखड़ी को रैलू, उज्यालू आलो अंधेरो भगलू आदि लोकगीतों के साथ मांगल व देवी-देवताओं की जागर गाई जाती हैं।

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