हिंदी सिनेमा में इधर कुछ बरसों से कहानी लापता है। लोग पूछ रहे हैं, कहानी तुम कहां हो? आमिर खान की ऑस्कर तक जा पहुंची फिल्म ‘लापता लेडीज’ किसी विदेशी शॉर्ट फिल्म की कॉपी निकली है। साउथ की फिल्मों के रीमेक पर रीमेक बन रहे हैं पर लोग उन्हें देखने ही नहीं जा रहे। और, देशभक्ति की नई लिखी जा रही कहानियों में भी लोगों को अब खासी दिलचस्पी बची नहीं है। लेकिन, एक जमाना हिंदी सिनेमा में ऐसा भी रहा है कि लोग पोस्टर पर ‘रिटेन बाई सलीम जावेद’ देखते ही फिल्म देखने का मन बना लिया करते थे, फिर फिल्म में कौन हीरो है, कौन डायरेक्टर है, इसकी ज्यादा तफ्तीश नहीं होती थी...
Salim Javed First Film: आज ही के दिन रिलीज हुई सलीम-जावेद की लिखी पहली फिल्म, क्रेडिट में नाम तक नहीं दिया गया
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कहानी गुल्लू और जादू की मुलाकात की
हिंदी सिनमा की दिग्गज लेखक जोड़ी सलीम-जावेद के नाम का डंका भले हिंदी सिनेमा में फिल्म ‘जंजीर’ से बजा हो, लेकिन दोनों की साथ लिखी पहली फिल्म ‘अधिकार’ से ही इस जोड़ी के जलवे की बुनियाद पड़ चुकी थी। 28 अप्रैल को साल 1971 में रिलीज हुई फिल्म ‘अधिकार’ के सितारे हैं, अशोक कुमार, देब मुखर्जी, नंदा, हेलेन और प्राण। बताते हैं कि बाद में उनकी धर्मपत्नी बनीं हेलेन से इसी फिल्म के दौरान सलीम खान की पहली मुलाकात हुई। तब सलीम खान को लोग गुल्लू कहकर बुलाते थे। यही उनका प्यार से बुलाए जाने वाला नाम था। और, जावेद अख्तर के बारे में तो तो लोग जानते ही हैं। उनका नाम बचपन में घर वालों ने जादू रखा था। शबाना आजमी अब भी उन्हें प्यार से जादू ही कहकर बुलाती हैं। तो ये कहानी है गुल्लू और जादू की पहली मुलाकात की।
घोस्ट राइटर के तौर पर मिली फिल्म
साल 1971 में रिलीज हुई फिल्म ‘अधिकार’ की कहानी आर एस वर्मा की है। इस नन्हीं सी कहानी पर सलीम-जावेद को पूरी पटकथा लिखनी थी और दोनों का जोश ऐसा कि सिर्फ 12 दिन में ही दोनों ने मिलकर इसे पूरा कर दिया। ये और बात है कि फिल्म में दोनों का नाम तो नहीं गया लेकिन ये ही पहली फिल्म है जिसे गुल्लू यानी सलीम खान और जादू यानी जावेद अख्तर ने मिलकर एक साथ लिखा। यानी कि आप कह सकते हैं कि सलीम-जावेद की एक साथ लिखी ये पहली फिल्म रही। हिंदी सिनेमा में घोस्ट राइटिंग की परंपरा शुरू से ही चलती आ रही है, लिखता कोई और है नाम किसी और का होता है। तो मान सकते हैं कि फिल्म ‘अधिकार’ में जावेद अख्तर और सलीम खान ने घोस्ट राइटिंग से अपना करियर शुरू किया था।
कमालिस्तान के गोदाम में सोए जावेद
जावेद अख्तर के पिता जां निसार अख्तर भी देश के नामचीन शायर रहे हैं। गुरुदत्त के साथ रहकर सिनेमा सीखने का सपना लिए जावेद अख्तर जब बंबई पहुंचे थे, तो उनके वालिद यानी जां निसार अख्तर मुंबई का बड़ा नाम था। लेकिन, थे वह कम्युनिस्ट होना और इसके चलते उनके खिलाफ पुलिस दिन रात लगी रहती थी। जावेद अख्तर कुछ दिन तो रहे अपने वालिद के यहां लेकिन दूसरी मां से उनकी बनी नहीं और एक दिन वह यूं ही बिना बताए घर से निकल लिए। निर्माता निर्देशक कमाल अमरोही के यहां जावेद अख्तर को बंबई में पहली नौकरी मिली। रहने को कोई जगह थी नहीं तो वह वहीं कमालिस्तान स्टूडियो के गोदाम में सो जाया करते थे।
फिल्मफेयर के लिए तैयार हुईं तकरीरें
जावेद खुद बताते हैं कि उन दिनों उनके पास गिनती के तीन जोड़ी कपड़े हुआ करते थे और उन्हीं को अदल बदल कर वह पहना करते। कई बार तो वहीं लॉन्ड्री की दुकान पर भी उन्होंने खड़े खड़े अपने कपड़े बदल लिए। कमाल अमरोही की गोदाम में उन्हें फिल्मफेयर की वो ट्रॉफियां भी पड़ी मिलीं जो मीना कुमारी को उनके बेहतरीन अभिनय के लिए दी गईं थी। गुरबत के दिनों में जावेद को उन ट्रॉफियों से बड़ा हौसला मिलता और वह उन्हें सीने से लगाकर फर्श पर सोया करते। कहते हैं कि इन ट्रॉफियों को हाथ में लेकर जावेद तमाम तरह की तकरीरें भी किया करते थे, जाहिर सी बात है कि ये तकरीरें बाद में कई बार जावेद अख्तर को फिल्मफेयर के मंच पर असली तकरीरें देने के काम आईं।